Category Archives: लिटरेचर लव

सच का सच (कविता)

-डॉ. व्यथितानंद घूम रहा था भीड़ में अकेला थी माथे पर एक पोटली जिसमें भरा पड़ा था- झमेला ही झमेला। देखा बायें-दायें घूमा, ऊपर-नीचे गया मंदिर-मस्जिद चर्च-गुरुद्वारा ढूंढा भारवाहक मिले गुरु दर गुरु नहीं मिला कोई चेला।

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इस्लाम की बेहतरीन समझ देता “अंडरस्टैंडिंग इस्लाम”

दुनिया में इस्लाम को देखने और समझने के दो नजरिये मौजूद हैं, एक इस्लामिक और दूसरा गैर इस्लामिक। इस्लाम के दायरे में जीवन व्यतीत करने करने वाला व्यक्ति पूरी तरह से कुरान और पैगंबर मोहम्मद में यकीन करता है और … विस्तार से पढ़ें

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आठवीं घंटी का विद्यार्थी हूँ (कविता)

…..अखौरी प्रभात क्योंकि स्कूल का अनुशासन 7 वीं तक है मेरे जीवन के विद्यालय में न हाजिरी कटने का भय न फ्लेड – फाईन का संशय न फेल होने पर मेंशन न ऊँचे प्राप्तांक का टेंशन अफसरों की फटकार नहीं … विस्तार से पढ़ें

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नब्बे के हुये नामवर

जब आइना झूठ बोलेगी तो नामवर पैदा होगा आलोक नंदन नई दिल्ली  । नब्बे बहार देखने के बाद हिन्दी साहित्य के  सुविख्यात समालोचक नामवर सिंह ने अपने जीवन के शतकीय पाली की ओर कदम बढ़ा दिया है। जीवन के प्रति … विस्तार से पढ़ें

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ब्रह्म नहीं कुछ (कविता)

आदि शक्ति हो या अन्धेश्वर मन की तार तरंग तुम्हारी भक्ति भाव से पूज ले बन्दे ब्रम्ह नहीं कुछ हम ब्रम्हेश्वर काला पीला हरा बैंगनी नहीं किसी का रंग कोई भी अनहद नाद जगे जब मन का मान सभी कुछ … विस्तार से पढ़ें

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‘सार्थक’ पहल के साथ जेएलएफ में राजकमल प्रकाशन

गुलाबी शहर में साल की शुरूआत में ही आयोजित होने वाला सबसे बड़ा साहित्य महोत्सव- जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में राजकमल प्रकाशन अपने नए और ख़ास प्रयोगों के साथ अपनी उपस्थित दर्ज़ करने जा रहा है। सार्थक- राजकमल प्रकाशन का उपक्रम, … विस्तार से पढ़ें

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मुझे है यक़ीं , तेरे प्यार पे (कविता)

उत्तम पाल. मुझे है यक़ीं , तेरे प्यार पे , ये दिल है अब तो , खुमार पे। तुझे भूलना मुमक़िन नहीं , मेरा इश्क़ है , इंतज़ार पे। तुम ग़ैर हो , मुझे है पता , मुझे फ़क्र है … विस्तार से पढ़ें

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दारू की तलब

आलोक नंदन रात के बारह बज रहे थे। बोतल खाली हो चुकी थी, लेकिन प्यास अभी पूरी तरह से बुझी नहीं थी। खाली बोतल को हाथ में लेकर वरिष्ठ टीवी पत्रकार ने एक आंख से उसके अंदर झांकते हुये अंदर … विस्तार से पढ़ें

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बेटी (कविता)

ऐ श्रृष्टि रचाने वाले, दुनिया को बसाने वाले। बस इतना तू बता दे मुझको, ऐ इंसान बनानेवाले। मैं ही जननी हूँ फ़िर भी, मुझसे ही नफरत क्यूँ है? बेटी हूँ कल की माँ भी, फ़िर मुझपे हुकूमत क्यूँ है? ऐ … विस्तार से पढ़ें

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लुप्त (हिन्दी काव्य)

शिव कुमार झा ‘टिल्लू’ दड़क गए शिखर मेरु के हिलकोरें सागर की लुप्त हुईं रवि आभा जब मलिन दिखा- नीरज पंखुड़ियाँ लुप्त हुईं वात्सल्य स्नेह में भी छल है संतति नियति का क्या कहना प्रेम विवश दमड़ी के आगे कुम्हिलात … विस्तार से पढ़ें

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