विकास के नारों के सहारे सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने की होड़

हौच पौच की स्थिति है, चारों तरफ शोर शराबे हो रहे हैं, एक सुर में सभी नेता विकास-विकास चिल्ला रहे हैं…हर नेता दूसरे पर यही आरोप लगाता फिर रहा है कि वह विकास में सबसे बड़ा बाधक है, अब तक बिहार को ठगता आ रहा है। इसके साथ ही जीतने पर बिहार को चमकाने का दावा भी किया जा रहा है….कुल मिलाकर इस बार बिहार के चुनाव में मुख्य मुद्दा विकास को बनाया गया है, सभी दल इसी शब्द के सहारे सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ना चाह रहे हैं। वैसे यह भी सच है कि अलग-अलग विधानसभाओं के अपने मिजाज है, और ये मिजाज स्थानीयता से जुड़े हुए हैं।

गांवों, बाजारों, टोलों, देवी स्थलों व अहरा के किनारे बैठने वाली आबादी कुछ अलग किस्म के तानो- बानों से संचालित होकर वोटिंग की ओर कदम बढ़ा रही है, जबकि अपार्टमेंट्स, बंगले, किराये के मकानों आदि में रहने लोगों के वोटिंग विहैवियर को प्रभावित करने वाले कारक जुदा हैं। शहरों में नीतीश कुमार और सुशील मोदी के बड़े-बड़े होर्डिंग्स टंगे हुए हैं, जिनमें विकास के सपनों को तराश कर लोगों को आकर्षित किया जा रहा है। कांग्रेस भी होर्डिंग्स को लेकर आगे दौड़ रही है। पटना के लगभग सभी प्रमुख स्थानों को होर्डिंग्स से कवर कर लिया है। राजद और लोजपा इस मामले में पीछे है।   

शहरी आबादी नीतीश कुमार को कुछ मामलों में नंबर दे रही है, और आगे भी नीतीश कुमार को कंटिन्यू करने के पक्ष में है। पटना हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एडवोकेट राजेश दूबे कहते हें, “पिछले पांच वर्षों में माहौल सुधरा है। गली-चौराहों पर खड़े होकर आप जोर-जोर से किसी भी विषय पर बातें कर सकते हैं। पहले रात दस बजे के बाद रेलवे स्टेशन पर उतरते ही वहीं पर अगल-बगल के रिश्तेदारों के यहां शरण लेते थे। अब आप रात में बेधड़क कहीं भी आ-जा सकते हैं। नीतीश को एक मौका और देना चाहिये।” इसी तरह प्रमोद इस बात से खुश हैं कि पटना के शास्त्रीय नगर कन्या उच्च विद्यालय में पढ़ने वाली उनकी बेटी को साईकिल मिल गया। लालू राज के साथ नीतीश राज की तुलना करते हुये वह कहते हैं, “लालू ने सबकुछ को बुरी तरह से चौपट किया। कभी हमलोगों ने लालू के पक्ष में नारा लगाया था। उनके द्वारा आयोजित बड़ी-बड़ी रैलियों में शामिल हुये थे। पुनाईचक चौराहे पर एक बार भाषण देते हुये लालू ने कहा था कि अब राजा रानी के पेट से पैदा नहीं लेता। मुझे देखो, एक गरीब का बेटा आज मुख्यमंत्री बन गया है। बाद में लालू ने अपनी पत्नी को ही मुख्यमंत्री बनाया। यह यादवों के कल्चर के खिलाफ है।यादवों का गौरवशाली इतिहास यही कहता है कि नेता अपनी योग्यता से बनेगा न कि ऊपर से थोपा जाएगा। लालू की वापसी संभव नहीं है चाहे वे जितने हो-हल्ला मचा ले। लालू अपनी एथेंसिटी खो चुके हैं। जहां तक रामविलास पासवान की बात है तो इनकी विश्वसनीयता भी खत्म हो चुकी है।”

बिहार की लोगों की महत्वकांक्षा अब जाग चुकी है। पिछले पांच सालों में युवके के एक नये तबके को ग्लोबलाइजेशन का स्वाद लग चुका है। ये लोग कैफे में बैठकर नेट पर सर्फिंग और चैट करना ज्यादा पसंद करते हैं। गर्ल्स फ्रेंड्स और ब्याय फ्रेंड्स की बातें करते हैं। दुनियाभर की हवाओं ने इनके मस्तिष्क को झकझोरा है और ये लोग एक नये तरह के नशे के आदि हो गये हैं। वर्तमान माहौल इन्हें सूट कर रहा है, लेकिन साथ ही विकास को लेकर थोड़े सतर्क भी हैं। मैनेजमेंट का छात्र प्रीतम कहता है, “विकास का अर्थ है कि नवीनतम तकनीकी का इस्तेमाल करते हये आप प्राकृतिक संसाधनों कितना इस्तेमाल करते हैं। इस लिहाज से बिहार अभी कोसो दूर है। प्राकृतिक संसाधन के नाम पर आपके पास है ही क्या? सड़कें तो इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं, जो विकास को गति देती हैं। सड़कों के निर्माण को विकास नहीं कहा जा सकता, हां सड़के विकास की पहली शर्त जरूर हैं। अभी तक बिहार के विकास को लेकर कोई भी दल पूरी तरह से वैज्ञानिक योजना नहीं रख रहा है। बस, सब विकास-विकास चिल्ला रहे हैं। ”

गांवों की आबादी के अपने अलग राग हैं। आज भी गावों का सोशल और इकोनोमिकल लाइफ पूरी तरह से स्थिर है, कहीं कोई थरथर्राहट महसूस नहीं की जा रही है। हां, विभिन्न तरह के सेल फोन कंपनियों ने गावों की दीवारों पर जहां-तहां अपने प्रचार साट रखे हैं। लोगों के हाथों में मोबाईल फोन तो पहुंच गया है लेकिन बातें करने का तरीका वही पुराना है। विदेशी कंपनियों ने अपने बीच गावों के हाटों में ठेल दिये हैं, और उन बीजों को किसानों तक पहुंचाने के लिए उनके एजेंट इन्हीं ग्रामीणों के बीच में से कमीशन पर काम कर रहे हैं। लेकिन जहां तक गावों के वोट पैटर्न की बात है तो वे आज भी मूल रूप से जातीय समीकरण पर ही रन कर रहे हैं। विभिन्न दलों ने टिकट बंटवारे के दौरान इस समीकरण पर खासा ध्यान दिया है। भले ही गरीब गुरबों के बीच लालू अब मसीहा नहीं रहें, लेकिन कुछ पैठ तो है ही। नीतीश भी ग्रामीण आबादी पर खासा ध्यान दे रहे हैं, सोशल इंजीनियरिंग कर रहे हैं। अब उनका सोशल इंजीनियरिंग कितना सफल होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, फिलहाल नीतीश कुमार का पलड़ा भारी दिख रहा है।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to विकास के नारों के सहारे सत्ता की सीढ़ी पर चढ़ने की होड़

  1. Intriguing , I wonder what the statistics are on your first point there…

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