यशपाल के ‘झूठा सच’ को निगल गया कलकत्ता विश्वविद्यालय

कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा बी.ए. हिन्दी आर्नस में यशपाल के उपन्यास झूठा सच और मुक्तिबोध की कविताओं को शामिल न करने को लेकर पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज चिंतित और आक्रोशित है। इस संदर्भ में पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज की ओर से महासचिव डॉ. अशोक सिंह ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के वी.सी (एकेडमी) ध्रुवज्योति चटोपाध्याय को एक पत्र लिखा है, जिसमें Board of Studies के अध्यक्ष की सामंती मानसिकता को उजागर किया गया है। तेवर आनलाईन के पास इस पत्र की मूल प्रति मौजूद है, जिसे यहां हू-ब-हू पोस्ट किया जा रहा है।

 To

                Prof. Dhruvajyoti Chattopadhyay

                Pro. V. C (Academic)

                University of Calcutta

 विषय बी.ए. हिंदी आनर्स के पाठ्यक्रम से यशपाल के उपन्यास झूठा सच और मुक्तिबोध की  कविताओं को हटाने के प्रतिवाद में पत्र 

दरणीय महोदय,

               University of Calcutta के वेबसाइट पर बी.ए. हिंदी आनर्स का पाठ्यक्रम देखा। पाठ्यक्रम पर आयोजित वर्कशाप में मैं सुरेन्द्रनाथ सांध्य कॉलेज के प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित था। कॉलेज के प्रिंसिपल के नाम जो पत्र गया था उसमें रजिस्ट्रेशन फी का उल्लेख नहीं किया गया था। लेकिन वहाँ मौखिक रूप से Board of Studies की सदस्य डॉ. गीता दूबे ने 50  रुपये रजिस्ट्रेशन फी देने के लिया कहा। मैंने इसका प्रतिवाद करते हुए रजिस्ट्रेशन फी देने से मना कर दिया। आरम्भ से ही महसूस हुआ कि हिंदी का पाठ्यक्रम बनाने की जिम्मेदारी जिस Board of Studies को दी गयी थी उसके अध्यक्ष सामंती मानसिकता का परिचय दे रहे थे।

  विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम बनाने के लिए लोकतान्त्रिक तरीके से वर्कशाप आयोजित नहीं हुआ। मैंने स्वयं राही मासूम रज़ा के उपन्यास आधा गांव और शेखर जोशी की कहानी दाज्यू को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन University of Calcutta के वेब साइट पर नया पाठ्यक्रम देखा तो आश्चर्य हुआ। ‘सातवें प्रश्न पत्र’ खण्ड-1 के ‘उपन्यास’ के अंतर्गत तीन उपन्यासों – ‘कर्मभूमि’ (प्रेमचंद), ‘झूठा सच’ (यशपाल), और ‘मैला आँचल’ (रेणु) में यशपाल के उपन्यास झूठा सच को हटा दिया गया। जबकि वर्कशाप में झूठा सच को हटाने का किसी ने प्रस्ताव नहीं दिया था। राही मासूम रज़ा के उपन्यास आधा गांव को शामिल करने का प्रस्ताव दिया गया था। यशपाल हिंदी के ऐसे अकेले लेखक हैं जो शहीद-ए-आज़म भगतसिंह के साथ देश की आज़ादी की लड़ाई में क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल थे। झूठा सच देश के

 विभाजन की त्रासदी पर लिखा गया हिंदी का सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है| झूठा सच को पाठ्यक्रम से हटाने का मतलब है नयी पीढ़ी को देश के असली इतिहास से दूर रखने की साजिश।

हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने उपन्यास और लोकतंत्र में लिखा है- “आज भी जिसे विभाजन की त्रासदी की भयावहता को समझना होगा उसे यशपाल के झूठा सच, राही मासूम रज़ा के आधा गांव और भीष्म साहनी के तमस को पढ़ेगा (मैनेजर पाण्डेय संकलित निबंध- पृष्ठ 93, नेशनल बुक ट्रस्ट)|” आश्चर्य की बात यह है कि विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ को इसके बदले लगाया गया। यह कलावादी उपन्यास है। साथ ही कृष्णा सोबती की कहानी ‘ ऐ लड़की’ को ‘लघु उपन्यास’ बताते हुए शामिल किया गया| जबकि तथ्य यह है कि रवीन्द्र कालिया के संपादन में वर्तमान साहित्य के कहानी महाविशेषांक में ‘ऐ लड़की’ प्रकाशित हुई थी।

  यशपाल के झूठा सच को हटाना और राही मासूम रज़ा के उपन्यास आधा गांव को पाठ्यक्रम में शामिल न करना एक गंभीर खतरे का संकेत है। तीसरा प्रश्न पत्र – आधुनिक कविता के अंतर्गत मुक्तिबोध की कविताओं को हटाया गया है। मुक्तिबोध हिंदी के सबसे प्रखर मार्क्सवादी कवि हैं।देश के सबसे पुराने हिंदी विभाग कलकत्ता विश्वविद्यालय में इस तरह की घटना के बाद भी शिक्षा जगत की चुप्पी इस बात का संकेत है – हिंदी शिक्षा क्षेत्र में शिक्षा माफिया का कब्ज़ा है।

 कथा साहित्य में यशपाल के झूठा सच और कविता में मुक्तिबोध की कविताओं को हटाना मार्क्सवादी विचारधारा पर सीधा आक्रमण है। जबकी Board of Studies के सभी सदस्य तथाकथित मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े हुए हैं।

  एक दिलचस्प तथ्य है कि कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार M.A.  में आधुनिक पाठ्यक्रम बनानेवाले कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. जगदीश्वर प्रसाद चतुर्वेदी Board of Studies के सदस्य नहीं है।

  पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज ने राही मासूम रज़ा की 75वीं जयंती पर उनके  उपन्यास आधा गांव पर कलकत्ता विश्वविद्यालय के दरभंगा हॉल में संगोष्ठी आयोजित की थी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के तत्कालीन Pro. V.C. (Academic) प्रो. सुरंजन दास इस आयोजन में शामिल थे। आश्चर्य की बात है कि Board of Studies के सम्मानित सदस्य प्रो. चन्द्रकला पाण्डेय प्रो. अमरनाथ शर्मा, रेखा सिंह, प्रो. शम्भुनाथ, डॉ. गीता दूबे, डॉ. राजश्री शुक्ला राही मासूम रज़ा सप्ताह के अंतर्गत आयोजित इस कार्यक्रम में शामिल थे। पहली बार आधा गांव को जोधपुर विश्वविद्यालय में नामवर सिंह ने पाठ्यक्रम में शामिल करने की कोशिश की थी। लेकिन प्रतिक्रियावादी शक्तियों ने इसे पाठ्यक्रम में शामिल नहीं होने दिया। लेकिन कलकत्ता विश्वविद्यालय के Board of Studies में शामिल सभी लोग प्रगतिशील-जनवादी संगठनों से जुड़े हैं। तब आधा गांव को किस आधार पर शामिल नहीं किया गया ?

 पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज यह मानता है कि देश के विश्वविद्यालयों में जो लोग वेतन ले रहें हैं उसमें अर्जुन सेनगुप्ता कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार देश के 77% लोगों का कर भी शामिल है जिनकी दैनिक आमदनी 20 रुपये से ज्यादा नहीं है। विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का निर्माण देश के वर्तमान और भविष्य से जुड़ा हुआ है। हम अपने युवा नागरिकों को किस तरह का इतिहास पढ़ाना चाहतें है ?

  उपरोक्त सन्दर्भ में पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज कलकत्ता विश्वविद्यालय से निम्नलिखित मांग करता है-

  1. वर्तमान Board of Studies ने किस तरह पाठ्यक्रम बनाया है, इसकी जांच करनी होगी।
  2. वर्तमान गैर जिम्मेदार Board of studies को भंग करना होगा।
  3. यशपाल के उपन्यास झूठा सच और मुक्तिबोध की कविताओं को पाठ्यक्रम में फिर से शामिल करना होगा।
  4. लोकतान्त्रिक तरीके से दो दिन का वर्कशाप आयोजित कर नया पाठ्यक्रम बनाना होगा। बिना किसी लिखित सूचना के प्रतिनिधियों से रजिस्ट्रेशन फी नहीं लेना होगा।
  5. कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रो. जगदीश्वर प्रसाद चतुर्वेदी को छोड़कर पाठ्यक्रम बनाने की दूरदर्शिता किसी में नहीं है। उन्हें Board of Studies का अध्यक्ष बनाना होगा।
  6. Board of Studies में 75% सदस्य आनर्स पढ़ाने वाले फुल टाइम शिक्षकों को लेना होगा।

 हमें उम्मीद है कि विषय की गंभीरता को देखते हुए आप यथाशीघ्र आवश्यक निर्णय लेंगे। 

  आपका विश्वसनीय

 डॉ. अशोक सिंह

(महासचिव)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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