दुबई का रूख कर रही हैं मुंबई की बार बालाएं

तेवर आनलाईन, मुंबई
सत्ता पर काबिज होने के बाद औरंगजेब ने एक फरमान जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि नगर की सारी वेश्याएं या तो सुधर जाये या फिर उसका साम्राज्य छोड़ के चली जाये। औरंगजेब ने सामाजिक पतन का हवाला देकर वेश्यावृति पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। कुछ इसी अंदाज में मुंबई में भी बार बालाओं पर प्रतिबंध लगाया गया था। जिस तरह से औरंगजेब के दौर में भी वेश्यावृति अंदरखाते जारी रही थी और बड़ी संख्या में वेश्याओं ने औरंगजेब के सम्राज्य से इतर अन्य राज्यों की ओर रुख किया था, उसी तरह मुंबई में बार बालाओं पर प्रतिबंध के बाद वेश्यावृति न सिर्फ जारी है, बल्कि यहां की बार बालाएं अधिक कमाई की लालच में दुबई और खाड़ी देशों की ओर रुख कर रही हैं, और उन्हें बाहर भेजने के लिए एक पूरा तंत्र व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा है, जिसके धागे दूतावासों से लेकर मुंबई की छोटी-छोटी गलियों से जुड़ी हैं।

मुंबई में कभी बार में थिरकने वाली खूबसूरत बार बालाओं को दुबई में जाके मोटा माल कमाने के सपने दिखाकर बिचौलिये मोटा कमीशन खींचते हुये उन्हें बहुत बड़ी संख्या में यहां से रवाना कर रहे हैं। वहां से लौट के आने वाली बार बालाओं को अन्य बार बालाओं के सामने माडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, और वे दुबई की होटलों और शेखों की अय्याशी को बढ़चढ़ के सुना रही हैं, जिसके कारण अन्य बार बालाएं वहां जाने के लिए ललक रही हैं।

कभी मुंबई के एक बार में नाचने वाली पूजा अभी हाल ही में दुबई से लौटी है। उसका रहन सहन पूरी तरह से बदल चुका है। कलाई में कीमती घड़ी और सभी अंगुलियों में सोने की अंगुठियां है। अंधेरी वेस्ट स्थित आर्दश नगर के अपनी गली में वह हमेशा अन्य बार बालाओं से घिरी रहती है और उन्हें दुबई की कहानियां सुनाती रहती हैं। उसके चाहने वालों के फोन दुबई से लगातार उसके मोबाइल पर आते रहते हैं। फोन पर तो वह ठीक से बात कर लेती हैं, लेकिन मोबाइल फोन पर रोमन हिंदी में भेजे जाने वाले एसएमएस को वह नहीं पढ़ पाती है। अपनी मां और नानी की तरह उसे पढ़ना लिखना नहीं आता है। एसएमएस के कंटेंट को जानने के लिए उसे किसी और का सहारा लेना पड़ता है। पूजा की कहानी सुनने के बाद अन्य लड़कियां भी दुबई जाने का मन बना चुकी है, और इसके लिए पैसो का जुगाड़ कर रही है और बिचौलियों से संपर्क कर रही हैं।

पूजा इसके पहले भी चार-चार महीने के लिए दो मर्तबा दुबई जा चुकी है। उसका कहना है कि दुबई की कमाई की तुलना में मुंबई की कमाई कुछ भी नहीं है। बस शर्त यह है कि लड़की जरा स्टाइलिश और बिंदास हो। एक बार किसी अमीर शेख को पसंद आ गई तो फिर उसके वारे न्यारे हो जाएंगे। वैसे भी वहां के शेखों के बीच मुंबई की लड़कियों की बहुत मांग है। पैसा लुटाने में वे जरा भी कंजूसी नही करते हैं। उसने बताया कि वह वहां एक होटल में डांस करती थी, उसके साथ मुंबई की और लड़कियां भी थी। होटल प्रबंधन हर चार महीने पर लड़कियों को बदल देता था। अगली बार वह किसी और होटल में जाएगी।

पूजा का मातृ सत्तात्मक परिवार पूजा की इस कामयाबी से बहुत खुश है। पूजा के परिवार का कमान उसकी नानी के हाथ में है। उसकी मां ने दूसरी शादी की है, और उसका दूसरा पति उसके साथ ही उसके घर में रहता है। इस मातृ सत्तात्मक परिवार में कमाने की जिम्मेदारी औरतों पर ही है। बार बालाओं पर प्रतिबंध के बाद इस घर की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाने लगी थी। किसी तरह से बिचौलियों से मिलमिलाकर पूजा के घर वालों ने उसे दुबई भेजने की व्यवस्था करा दी, और अब वह अच्छी कमाई करके अपने परिवार को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। उसके छोटे-छोटे भाई और बहन अब स्कूल जा रहे हैं, लेकिन उनको स्कूल के लिए तैयार करने, स्कूल छोड़ने और स्कूल से ले आने की जिम्मेदारी पूजा के सौतेले पिता की है। इसके अलावा घर में खाना बनाने से लेकर वह कपड़ा धोने तक का काम करता है। पूजा की मां का अधिकतर समय अपने अगल बगल की ढल चुकी सहेलियों के साथ ताश खेलने और गुटका चबाने में व्यतीत होता है। उसकी हम उम्र सहेलियों को पूजा की मां की किस्मत से जलन भी होती है।

इसी तरह रेहाना भी पिछले 3 महीने से दुबई में है, लेकिन हर महीने वह अपने परिवार के खर्च के लिए एक मोटी रकम भेज देती है। इस बार रेहाना की छोटी बहन रेशमा भी दुबई जाने का मन चुकी है। अपने छोटे से कमरे में फिल्मी गानों के धुन पर वह दिन रात थिरकती रहती है ताकि दुबई जाने के बाद उसके कमर की लचक पर नोटों की बारिश हो। दुबई के संबंध में वह अक्सर पूजा से टिप्स लेते रहते है, और पूजा उसे मानसिक तौर पर दुबई में काम करने के लिए तैयार कर रही है। उसकी मां को रेशमा पर पूरा यकीन है कि दुबई में उसकी बेटी खूब नाम कमाएगी। इस संबंध में पूछे जाने पर वह बेधड़क कहती हैं, हमलोग की पूरी पीढ़ी बार में खप गई। मैं कभी बार में नाचती थी। बार बंद होने के बाद बहुत सारी लड़कियां मुंबई की सड़कों और गल्लियों में धंधा कर रही हैं। ऐसा नहीं है कि फरमान जारी होने के बाद मुंबई में बारों में ताला लटक गया है। आज भी सबकुछ चोरी छिपे चल रहा है। फर्क इतना है कि पहले लड़कियां बार में नाचने जाती थी और अब सीधे सो कर कमाई करने जाती हैं। इससे बेहतर है कि हम अपनी लड़कियों को दुबई भेजे। कम से कम वहां कमाई तो अच्छी हो जाती है।

किसी भी बार बाला के लिए बिचौलियों की मदद के वगैर दुबई या अन्य खाड़ी देशों में जाना संभव नहीं है। बिचौलियों का संबंध दुबई और खाड़ी देशों में चलने वाले होटलों व नाइट क्लबों से होता है। इन होटलों और नाइट क्लबों में मांग के मुताबिक ये लोग मुंबई की बार बालाओं से संपर्क करते हैं और वहां भेजने की एवज में होटलों और नाइट क्लबों के प्रबंधकों के साथ-साथ यहां की बार बालाओं से भी मोटी रकम कमीशन के तौर पर वसुलते हैं। बार बालाओं को वीजा दिलाने से लेकर उन्हें सकुशल वहां के होटलों और नाइट क्लबों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी इन बिचौलियों की होती है। इस धंधे में अव्वल दर्जे की इमानदारी बरती जाती है ताकि सेवा लेने वाले और सेवा देना वालों के बीच का संबंध किसी भी कीमत पर खराब न हो और दुबई या खाड़ी देशों से लौट कर आने वाली बार बालाएं न सिर्फ वहां फिर जाने के लिए तैयार रहे, बल्कि मुंबई में रहने वाली अन्य बार बालाओं को भी वहां जाने के लिए प्रेरित करती रहे।

चाणक्य ने अपनी पुस्तक ‘अर्थ शास्त्र’ में राज्य और राज्य से संबंधित करों की विशद व्याख्या की है। मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुये चाणक्य गणिकाओं (वेश्याओं) के संबंध में राज्य को व्यवहारिक सलाह देते हुये इनके धंधे पर पूर्ण पाबंदी लगाने के बजाय इन पर कर लगा कर राज्य के खजाने को समृद्ध करने बात करता है। देश के विभिन्न हिस्सों में आज वेश्याओं के लिए सेक्स वर्कर जैसे शब्दों का प्रचलन बौद्धिक हलकों में जोरो पर है, लेकिन मुंबई से बार बालाओं का दुबई और खाड़ी देशों में जिस तेजी से पलायन हो रहा है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि सामाजिक पतन का हवाला देकर इन पर प्रतिबंध तो लगा दिया गया लेकिन इनके पुर्नावास की कोई वैज्ञानिक व्यवस्था नहीं की गई। व्यवहारिक स्तर पर पूरे प्रकरण को देखने पर इसका एक भयावह पहलू सामने आता है। खूबसूरत बार बालाओं को तो दुबई या अन्य खाड़ी देशों में जाने का विकल्प मिल रहे हैं, लेकिन पैसों और पहुंच के अभाव में अन्य बार बालाओं को अपना पेट और घर चलाने के लिए शाम ढलते ही सड़कों पर उतर कर ग्राहक खोजना पड़ रहा है। मुंबई में बार बालाओं की वर्तमान स्थिति गहन सामाजिक आर्थिक संदर्भ की पड़ताल की मांग करती है।

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