बिहार में कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव

मुकेश कुमार सिन्हा, पटना

कांग्रेस की जीत के लिये राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी सहित तमाम दिग्गज नेता बिहार का दौरा कर रहे हैं. लेकिन इसका कितना फायेदा मिलेगा यह कह पाना अभी मुश्किल है. राहुल, मनमोहन और सोनिया के सवालों से प्रदेश का सत्तारूढ़ गठबंधन तिलमिला गया है.एनडीए और राजद –लोजपा गठबंधन के लिये जनता को समझा कर अपने विश्वाश में बनाये रखना मुश्किल हो रहा है.बावजूद इसके कांग्रेस सत्ता तक पहुंच पायेगी इसकी संभावनाएं नहीं दिख रही है.

इसके कारण भी हैं.दरअसल प्रदेश कांग्रेस में पिछले कई वर्षों से कोई ऐसा नेतृत्व नहीं उभर सका है, जो पूरे सूबे में सर्वमान्य हों, अथवा अक्रामक तरिके से विरोधियों को जवाब दे सके या उन पर चुनावी वार कर सके. सच तो यह है कि ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं को एक मत से स्वीकार हों. मतलब कप्तान के बिना ही कांग्रेसी सेना चुनावी मैदान में है.चौधरी महबूब अली कैसर प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सिर्फ खानापुरी करते नजर आ रहे हैं. हालांकि कांग्रेसी उम्मीदवार अपनी जीत के लिये जी तोड़ चुनावी प्रचार में जुटे हैं.लेकिन कई जगहों पर दूसरी पार्टी से आये आयातित उम्मीदवारों के विरोघ में आक्रोश भी है. पार्टी द्वारा मनाने की कोशिशों के बावजूद कार्यकर्त्ताओं की नाराजगी है कि दूर ही नहीं हो रही है.

           अगर बात कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वि पार्टियों की की जाये तो दोनों ही विपक्षी गठबंधन कांग्रेस से भयभीत हैं हलांकि सार्वजनिक रूप से वे ऐसा स्वीकारते नहीं हैं. लेकिन उन्हें यह डर तो है ही कि कांग्रेस उनकी जीत का समीकरण कहीं भी बिगाड़ सकती है.एनडीए गठबंधन को इसकी चिंता कुछ दिनों पहले तक ज्यादा थी, लेकिन कांग्रेस की सुस्ती ने उसकी यह चिंता स्वत: ही दूर कर दी. जबकि राजद-लोजपा गठबंधन पहले कांग्रेस को लेकर गंभीर नहीं था, लेकिन अब वह चिंता में है. उसे डर है कि एंटीकंबिनेंसी का फायेदा कहीं कांग्रेस ही न ले जाये. इसके अतिरिक्त सत्तारूढ़ गठबंधन से छिटके सवर्ण और मुस्लिम वोट भी कहीं खिसक कर कांग्रेस के खाते में न चला जाये. ऐसा हो भी सकता था , लेकिन मुक्कमल तौर पर ऐसा हो नहीं सका.

         वोटरों के साथ भी कमोवेश संशय की स्थिति कांग्रेस को लेकर बनी हुई है. वोटरों की आम मानसिकता होती है कि उनका वोट बरबाद न जाये. इस मानसिकता का खामियाजा भी कहीं-कहीं कांग्रेस को भुगतना  पर सकता है. बावजूद इसके कांग्रेस के विजयी उम्मीदवारों की संख्या में उछाल से इनकार नहीं किया जा सकता है.

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to बिहार में कांग्रेस के पास नेताओं का अभाव

  1. ankita singh says:

    Netao ka bhi kahi abhav hota hai.Rajeev gandhi neta the jab ratoraat P.M ban gaye the. Rabri devi neta thi jab CM banai gayi thi.

  2. Pink Friday says:

    Thanks for some great points there. I am kind of new to the internet , so I printed this off to put in my file, any better way to go about keeping track of it then printing?

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