काफिला-ए-हिजाज इस्लाम के विस्तार से जुड़ी एक रुमानी प्रेम कहानी

(पुस्तक-विवेचना)
आलोक नंदन

“काफिला-ए-हिजाज” जनाब नसीम हिजाजी द्वारा लिखित एक तारीखी नाविल है, जिसमें एक इराकी युवक हस्सान और एक ईरानी सामंत कबाद की बेटी माहबानों के रुमानी प्रेम कहानी को इस्लाम के आगाज और विस्तार के साथ बहुत ही खूबसूरती से पिरोया गया है। हस्सान माहबानों का बड़ा भाई जहांदाद का दोस्त है, और जहांदाद के कहने पर ईरानी फौज में शामिल होकर उसके साथ रुमियों के खिलाफ जंग लड़ने जाता है। एक लंबे अंतराल के बाद वह कबाद के लिए उसके बेटे जहांदाद की मौत का पैगाम लेकर लौटता है। उसकी मुलाकात सबसे पहले कबाद के वफादार नौकर काउत्स से होती है फिर माहबानों से। माहबानो उससे पूछती है, “जहांदाद कहां है? वह घर क्यों नहीं आया ??”

हस्सान कहता है, “जहांदाद हमेशा अपनी बहन के कहकहों का जिक्र किया करता था, लेकिन यह मेरी बदकिस्मती है कि मैं इस घर में कोई खुशी की खबर लेकर नहीं आया।”

माहबानो सकते की हालत में हस्सान की तरफ देखती है और फिर कहती है, “तुम हमें यह बताने आये हो कि वह वापस नहीं आएगा।”

दुख भरे शब्द में हस्सान जवाब देता है, “काश मेरी कोई तदबीर उसे वापस ला सकती।”

अपनी सिसकियों पर काबू पाते हुये माहबानों कहती है, “यदि तुम यह कह सकते कि वह जिंदा है और रुमियों के किसी कैदखाने में पड़ा हुआ है तो मेरे आंसू कहकहों में तब्दील हो सकते हैं।”

“काश मैं यह कह सकता।” “तुम्हे यकीन है कि वह हमेशा के लिए हमसे रुखसत हो चुका है। ”

मैं आखिरी सांस तक उसके साथ था। यहा ईरान के इतिहास का वह दौर था जब खुसरू परवेज की फतूहात के सैलाब की लहरें कुसतुनुतुनिया की दीवारों से टकरा रही थीं और रूम का कैसर अपने महल के दरीचों से बासफोरस के मशरिकी किनारों पर ईरानी सेना के खेमे देख सकता था। फिर अचानक रूम और ईरान की जंग का एक नया दौर शुरु हुआ। हरकुल ने बरसों की शिकस्त का हिसाब चुकाने के लिए जवाबी हमले शुरु कर दिये। परवेज ने इस अचानक पेशकदमी को रोकने के लिए नई सेना की जरूरत महसूस की और ईरानी जमींदारों ने अपने किसानों और चरवाहों पर सेना में भर्ती के लिए दरवाजे खोल दिये। इसी दौर में हस्सान ईरान की फौज का एक हिस्सा बना था। सेना में भर्ती होने के बाद तीन महीने एक सरहदी मुख्यालय में सैनिक तर्बियत हासिल की और फिर उसे सवारों के कुछ दस्तों के साथ शिमाली ईरान की एक चौकी में भेज दिया गया। इस चौकी का चीफ मुहाफिज जहांदाद था। फिर सिपाहियाना जिंदगी की आजमाइशों, जंग की परेशानियों और कैद व बंद के दुखों व मुसीबतों में एक दूसरे के साथी थे। और अब करीब नौ साल बाद वह जहांदाद के घर में उसकी मौत की खबर सुनाने आता है।

माहबानो हस्सान को अपने पिता कबाद से मिलाती है। कबाद उससे कहता है, “एक बाप के लिए जहांदाद जैसे बेटी की मौत का यकीन कर लेना आसान नहीं। अरमियाह में हमारे लश्कर की शिकस्त के बाद वह लापता हो गया था। कुछ यह भी कहते हैं कि वह घायल था और एक सवार उसे अपने घोड़े पर डालकर भाग गया था। अब यदि तुम उसकी मौत की खबर लेकर आये हो तो मेरा पहला सवाल यह है कि तुम इतने समय कहां थे।

हस्सान जवाब देता है, “मैं रुमियों की कैद में था और जहांदाद अपनी मौत तक मेरे साथ था।” अरमियाह की जंग का विस्तार से वर्णन करने के बाद हस्सान कबाद को बताता है कि उसका खानदान कबाद की जमीनों पर काश्तकारी करता है और उसके बाप का नाम उतबा है। यहां जुनूब की तरफ जागीर की आखिरी बस्ती उसी की है। उसे विदा करते हुये कबाद इशारों में उसे उसके घर के वर्तमान स्थिति के बारे में कहता है, “जब एक हारे हुये लश्कर का सिपाही घर पहुंचता है तो उसे कभी-कभी नये हालातों का सामान करना पड़ता है। मैं तुमसे यह वायदा लेना चाहता हूं कि यदि तुम्हे किसी भी मदद की जरूरत पड़े तो अपने दोस्ते के घर का दरवाजा खटखटने में किसी तरह की झिझक महसूस नहीं करोगे।”

हस्सान जब अपने घर पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि उसके पिता और उसके एक भाई की हत्या हो चुके हैं। नये सामंत तोरज ने उसके छोटे भाई सुहैल को गुलाम बना लिया है। बहन को नये हुक्मरान हुरमज के पास भेज दिया था, और अपने आप को हुरमज को सुपुर्द करने के बजाय उसने उसके छत से छलांग लगाना बेहतर समझा। हस्सान उसी समय तोरज की तलाश में निकल पड़ता है और रात होने से पहले ही तोरज को मार डालता है। अपने भाई सुहैल को भी वहां से निकाल लाता है और फिर घायल अवस्था में कबाद के घर में शरण लेता है।

माहबानों हस्सान की तरफ आकर्षित होती है, और हस्सान भी उसे चाहने लगता है। वह माहबानों से कहता है, “मैं एक गरीब, बेबस और बेवतन इंसान हूं। और मेरे मुस्तकबिल के सारे रास्ते एक भयानक रेगिस्तान की गहराइयों में गुम होकर रह गये हैं। लेकिन यदि मैं दुनिया का सबसे बड़ा हाकिम होता और मदायन और कुसतुनतुनिया जैसे रौनक भरे शहरों में मेरे लिए सोने और चांदी के महल तामीर किए जाते तब भी इस बस्ती में गुजरे हुये लम्हात की याद मुझे हमेशा बेचैन रखती।”

माहबानो लरजती हुई आवाज में कहती है, “आपको मालूम है यदि इस समय आपके मुकाबले में कोई शहंशाह खड़ा होता और मुझसे यह पूछता कि तुम्हारे लिए सोने और चांदी के महल बेहतर हैं या तुम एक गरीब या नादार आदमी के साथ रेगिस्तान की खाक छानना पसंद करती हो और फिर मुझे इस बात की आजादी होती कि मैं जो चाहूं पसंद कर लूं और जो चाहूं ठुकरा दूं तो मैं किसी हिचक के बिना आपका हाथ पकड़ लेती। ”

हस्सान कहता है, “माहबानो, मेरा ख्याल है कि मैं अपने दिल को धोखा दे रहा हूं, लेकिन यदि मुझ जैसे बेबस इंसान की मोहब्बत का इनाम भी मोहब्बत हो सकता है तो मैं तुम्हे यकीन दिला सकता हूं कि इस दुनिया का कोई पहाड़, रेगिस्तान या समुंद्र हमारे बीच रोक नहीं बन सकेगा।”

जहांदाद का छोटा भाई जरबख्त मदायन से अपने घर आता है। वह एक सैनिक ओहदे पर है। उसकी हस्सान से होती है और हस्सान को अपने बड़े भाई का दर्जा देता है। वह इलाके के हुक्मरान हुरमज के नाम मदायन से सेनापति का एक खत लेकर आता है और हस्सान को यकीन दिलाता है कि अब हुरमज उसके परिवार की तरफ टेढ़ी आंख से नहीं देखेगा। वैसे भी हुरमज का इलाका अरब की सरहद से मिलता है और वहां एक इंकलाब आ चुका है जिसके असरात फरात की उपजाऊ जमीन तक पहुंच सकते हैं और वह इस हकीकत से बेखबर नहीं हो सकता कि अरब रूमी सल्लतनत की सरहदों पर कुछ कामयाब हमले कर चुके हैं हस्सान कहता है, “जब तक हुरमज का आलीशान महल मेरे घर की तरह विरान नहीं हो जाता मुझे चैन नहीं आएगा। ”

अपने सुहैल को कबाद के पास छोड़कर वह अपने मामूजान से मिलने बहरीन रवाना जाता है। रास्ते में उसकी मुलाकात एक ईसाई राहिब से होता है, और हस्सान उसे बताता है कि किस तरह से उसके वालिद और भाई को कत्ल किया है, और कैसे उसकी बहन ने आत्महत्या की है। राहिब उससे कहता है, “इंसानियत को एक नई रोशनी की जरूरत है और भेड़ियों की यह दुनिया किसी ऐसे निजाम की मोहताज है जो हर मजलूम को पनाह दे सकता हो।”

हस्सान कहता है, “यदि आप मुझे ईसाइयित की तब्लीग करना चाहते हैं तो आपको मायूसी होगी। मैं कई साल रूमियों की कैद में रह चुका हूं और यह देख चुका हूं कि कैसर के गुलाम किसरा गुलामों से ज्यादा खुशकिस्मत नहीं है।”

राहिब जबाब देता है, “जब मैंने नई रोशनी का जिक्र किया था तो मेरी मुराद कोई ऐसा दीन नहीं था जिसके उसूल और कानून कैसर की ख्वाहिशों के तहत हों। मुझे मालूम है कि वह कानून जिसका सबसे पहला मकदस बादशाहों की हुकूमत की हिफाजत हो इस दुनिया को अम्न और इंसाफ नहीं दे सकता। मैं आकाओं और गुलामों की दुनियां में अपनी उम्र के साठ साल गुजराने के बाद यह समझ चुका हूं कि जब तक इस दुनिया में एक इन्सान पर दूसरे इन्सान की बालादस्ती खत्म नहीं होती हम इसी तरह जुल्म और वहशत के अंधेरे में भटकते रहेंगे। शहंशाहियत कैसर के महलों से जाहिर हो या किसरा के तख्त की शोभा से, वह बहरहाल एक लानत ही है। अम्न और इंसाफ के तकाजे केवल उस कानून की बालादस्ती से पूरे हो सकते हैं जो ताकतवर और कमजोर, छोटे और बड़े , अमीर और गरीब का फर्क मिटा सकता हो। ”

बातों के क्रम में राहिब बहरीन पर इस्लामिक क्रांति के प्रभाव का जिक्र करते हुये कहता है, “रोशनी देखने के लिए केवल आंखे खोलने की जरूरत होती है। मुझे यकीन है कि बहरीन में तुम उनलोगों की तलाश कर सकोगे जो तुम्हे सलामती का रास्ता दिखा सकते हैं। ये लोग उस दीन के अलमबरदार जिसने आका और गुलाम, कमजोर और ताकतवर, अरबी और गैर अरबी का फर्क मिटा दिया है। तुम अपने हाल से मायूस हो और वे तुम्हें जुल्म के खिलाफ सीना सिपर होना सिखाएंगे। यहां तुम अकेले हो और वहां तुम देखोगे कि एक अजीम काफिला तुम्हारा इंतजार कर रहा है। फिर इस काफिले के साथ सफर करते हुये तुम्हें यह महसूस होगा कि तुम्हारे सिर पर खुदा का हाथ है। मैं उस दिन के बारे में बात कर रहा हूं जो इस दुनिया के मजलूम व मजबूर इंसानों का आखिरी सहारा है। तुम भाग्यशाली हो कि तुम जवान हो और उस काफिले के साथ सफर कर सकते हो जिसकी मंजिलें फरात और दजला से कहीं आगे है।”

जनाब नसीम हिजाजी हस्सान के किरदार के माध्यम से इस्लाम के तात्कालिक स्थिति को चमात्कारिक ढंग से संवाद शैली में रखते हैं। राहिब के साथ संवाद को आगे बढ़ाते हुये हस्सान कहता है, “रूमी जहाज से फरार होने के बाद मैंने अपने वतन के रास्ते में जिन लोगों के साथ मुलाकातें की थीं, उनकी जबानी अरब के कुछ हालात मालूम हुये थे। लेकिन जब वह शाम की सीमा पर मुसलमानों के हमले का जिक्र करते थे, तो मुझे यकीन नहीं आता था। एक रात मैं एक राहिब के पास ठहरा था और उसने मुझे यह बताया था वह नबी जिसने अरबों में एक नई जान फूंक दी थी वफात पा चुका है और कई कबाइल उसके दीन से निकल गये हैं। उनकी एकता मुसलमानों को चारों तरफ से समेटकर यसरब की वादी में पनाह लेने पर मजबूर कर देगी। फिर जब बागी कबाइल चारों तरफ से यसरब पर हमला करेंगे तो ये लोग एक दिन के लिए भी इनका मुकाबला नहीं कर सकेंगे। शाम (सीरिया) के रेगिस्तान से गुजरते समय मुझे अबु तमीम और यमामा वालों की बगावत की सूचना मिली थी। फिर कुछ मंजिले तय करने के बाद एक बदवी ने मुझे बताया कि अबु तमीम शिकस्त खा चुके हैं। लेकिन यमामा में बागी कबाइल का एक बहुत बड़ा लश्कर मौजूद है। बहरीन ने भी बगावत कर दी है। इन हालात में कोई चमत्कार ही मुसलमानों को तबाही से बचा सकता है।”

राहिब कहता है, “बेटा, बहरीन पहुंचकर तुम कई चमत्कार देखोगे। यमन के इर्दगिर्द बागियों के झंडे झुक चुके हैं। यमामा में चालिस हजार बागियों का लश्कर तबाह व बर्बाद हो चुका है। मैसलेमा जिसने नुबूवत का दावा किया था कत्ल हो चुका है। बगरीन में जो मुसलमान अभी तक अपने दीन पर कायम हैं उनकी संख्या बागियों के मुकाबले में बहुत कम है। लेकिन जो लश्कर यमामा पहुंच चुका है उससे हमें यह उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वह बहरीन के मुसलमानों को अपने हाल पर छोड़ कर चला जाएगा। फिर बहरीन के वे कबाइल जिन्होंने इस्लाम के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किया है अरब के दूसरे बागी कबाइल से ज्यादा ताकतवर नहीं हैं। ”

हस्सान राहिब से पूछता है, “आप एक ईसाई होने के बावजूद मुसलमानों की हिमायत कर रहे हैं ? उनके हिमायती हैं?”

राहिब जवाब देता है, “मैं ईसाई होने के बावजूद एक हकीकत पसंद इंसान हूं और इस्लाम इस दौर की सबसे बड़ी हकीकत है। जब सूरज अपनी पूरी ताबनाकी के साथ निकल चुका हो तो हम आंखे बंद करके यह दावा नहीं कर सकते कि अभी सुबह नहीं हुई है। मेरी तमाम दुआएं अल्लाह के उन नेक बंदों के साथ हैं जो इस धरती पर इंसाफ और बराबरी के झंडे गाड़ रहे हैं। मक्का और मदीना यहां से बहुत दूर है और मेरी कमजोर टांगे कुछ कदम से ज्यादा मेरा बोझ नहीं उठा सकती। लेकिन तुम जवान हो, तुम अपने रास्ते के पहाड़, रेगिस्तान और दरिया पार कर सकते हो। तुम जंग के मैदान में अल्लाह के उन बंदों का साथ दे सकते हो जिनकी निगाहों की हैबत से शेरों के दिल दहल जाते हैं।”

हस्सान कहता है, “मुझे मालूम नहीं कि अरब में इस्लाम का मुस्तकबिल क्या है ? लेकिन यदि इंसाफ व बराबरी के अलमबरदारों का कोई काफिला इराक की तरफ रवाना हुआ तो मैं यह सोचे बिना कि उसके साथ चल पड़ूंगा कि ईरान की अजीम सल्लतनत से जंग की सूरत में उसकी कामयाबी की संभावनाएं क्या है ?”

राहिब से विदा लेने के बाद हस्सान बहरीन में अपने मामू कैस बिन अकरम के पहुंचता है, जहां बहरीन के शासक नोमान बिन मुन्जर का दायां हाथ और और उन कबाइल का रहनुमा जो मुसलमानों को बहरीन से निकालने की कसम खा चुके हैं हतम बिन जबीआ दावत की तैयारी चल रही होती है। एक आदमी उसे बताता है कि इलाके के रईस उसके मामू के साथ मुलाकात करने के लिए आये हुये हैं। हतम उसके मामू और दूसरे सरदारों को मुसलमानों के खिलाफ जंग में हिस्सा लेने के लिए तैयार करने के लिए यहां आये हुये हैं। हस्सान उससे कहता है, “मैंने बनु तमीम, मैसेलमा और दूसरे बागियों के खिलाफ मुसलमानों की फतह की जो खबरें सुनी हैं यदि वे ठीक हैं तो बहरीन वालों के लिए उनके खिलाफ जंग करना खुदकशी करने जैसा होगा और मुझे यकीन है कि मेरे मामू और उनके कबीले के लोग तबाही के रास्ते पर चलने वालों का साथ नहीं देंगे।”

वह आदमी कहता है, “ हमारा सबसे पहला मकसद मुकामी मुसलमानों को डरा धमकाकर दबाना है। इसके बाद यदि हिजाज से मुसलमानों के किसी लश्कर ने हमपर हमला किया तो ईरान की अजीम सलतनत हमारी पुश्त पर होगी। ईरान किसी भी हालत में यह बर्दाश्त नहीं करेगा कि लाल सागर से फारस की खाड़ी तक सारा अरब मुसलमानों के कब्जे में आ जाए। बहरीन के ताजा हालात से परेशान होकर मुकामी मुसलमान जवासी के करीब जमा हो चुके हैं और उनके गिर्द हतम बिना जबीआ के लश्कर का घेरा धीरे-धीरे तंग होता जा रहा है। यदि हतम ने उन्हें किसी ताखीर के बिना हरा दिया तो यह फतह पूरे अरब पर प्रभाव डाल देगी और वे कबाइल जो मुसलमानों की पिछली फतूहात की वजह से बददिल हो चुके हैं दोबारा उठ खड़े होंगे।

“हस्सान सवाल करता है, “बहरीन में मुसलमानों का रहनुमा कौन है?”

वह आदमी बताता है, “उनके रहनुमा का नाम उला बिन हजरमी है। वह कुछ साल पहले मुसलमानों के नबी का एलची बनकर आया था और उसकी तब्लीग से कई कबीले मुसलमान हो गये थे। लेकिन मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)” की वफात के बाद बहरीन के बदलते हुये हालात ने उनको वापस जाने पर मजबूर कर दिया था। अब उसकी जगह बनु अब्दुल कैस का एक प्रभावशाली सरदार जारोद बिन मअली ले चुका है और उसका सारा कबीला अपने दीन पर कायम है, लेकिन वह आदमी जिसे हतम और उसके साथी सबसे खतरनाक समझते हैं मुसना बिन हारिसा शीबानी है। यदि वह मुसलमानों का साथ नहीं देता तो अब तक हम उसे खत्म कर चुके होते।

कुछ देर बाद हस्सान की मुलाकात मामूजान से होती है और मामूजान उसे मुसलमानों के खिलाफ तैयार की जाने वाली फौज का सालार के रूप में उसे मेहमानों के सामने प्रस्तुत करते हैं।

हस्सान कहता है, “एक अरब किसरा के लिए जान की बाजी लगाकर भी अपने खानदान को ईरानियों के जुल्म और सितम से नहीं बचा सकता।”

वहां मौजूद सभी लोग हस्सान के मुंह से ऐसी बातें सुनकर पशोपेश की स्थिति में पड़ जाते हैं, ठीक उसी वक्त उनकी परेशानियों में इजाफा करने के लिए सफेद घोड़े पर बेफिक्र अंदाज में सवार मुसना अपने चार साथियों के साथ वहां आता है। तीरअंदाजों के सफ के सामने कोई दस कदम दूर वह अपने घोड़े को रोकता है और अस्लाम आलैकुम कह कह कूद पड़ता है। जवाब न पाकर वह जोर से कहता है, “कैस, मैं तुम्हारे लिए और तुम्हारे मेहमानों के लिए सलामती का पैगाम लाया हूं।” तीरअंदाजों की सफ से आगे निकल कर कैस कहता है, “मुसना हमें तुम्हारी तरफ से सलामती के पैगाम की जरूरत नहीं। तुम जिस रास्ते आये हो उसी रास्ते से वापस चले जाओ।”

मुसना बेबाकी से जवाब देता है, “ मैं अपनी मर्जी से आया हूं और अपनी मर्जी से ही वापस जाऊंगा। तुम बहरीन के रेगिस्तानों और पहाड़ों का कोई रास्ता मेरे लिए पसंद नहीं कर सकते। मैं यहां इसलिए नहीं आया कि मैं तुम्हारी जंगी तैयारियों से कोई बड़ा खतरा महसूस करता हूं। बल्कि मेरे यहां आने की वजह यह है कि मुझे बहरीन की खाक पर बहरीन के बाशिंदों का का खून बहाना पसंद नहीं । तुम यमन की बागियों का हाल सुन चुके हो। तुम बनु तमीम और यमामा वालों का हश्र भी देख चुके हो। मैं तुम्हें यह बताने आया हूं कि जो काफिला हिजाज से निकला है उसकी मंजिलें अरब की सीमाओं से कहीं आगे है। इस्लाम के फरजंद गैर अरब के संग लाख चट्टानों को पामाल करने के लिए उठे हैं। अरब के कुछ कांटे उन्हें परेशान नहीं कर सकते। तुमने उस दिन से बगावत की जिसने अरब के लोगों को अपमान व गुमराही के गहाराइयों से निकाल कर इंसानियत की महानता व अजमतों से आशना कर दिया है। तुम हिदायत की रोशनी से आंखें बंद कर सकते हो लेकिन वह भयानक रात वापस नहीं ला सकते जिसके दामन में हमारे बुजुर्गों के लिए जुल्म और जिहालत के सिवा कुछ नहीं है।

हतम बिन जबीआ कैस की तरफ देखने के बाद आगे बढ़ता है और कहता है, “ यदि तुम आज यहां न आते तो दो दिन बाद जवासी के मैदान में हमारी मुलाकात होती। अब मैं तुम्हारा वापस जाना पसंद नहीं करूंगा। हम चाहते हैं कि मुसलमान खून खराबा किए बिना हथियार डाल दें। लेकिन तुम उन्हें आखिरी दम तक लड़ाने की कोशिश करोगे इसलिए उनकी भलाई इसी में है कि तुम्हें जंग में हिस्सा लेने से रोक दिया जाए। इस समय तुम कम से कम डेढ़ सौ आदिमयों के तीरों के निशाने पर हो। भागने की कोशिश बेकार है। मैं तुम्हें हथियार फेंकने का हुक्म देता हूं और वायदा करता हूं कि तुम्हें केवल जंग के खात्में तक कैद में रखा जाएगा।”

मुसना हिकारत से हतम की तरफ देखते हुये कहता है, “मैं कैस के घर को जंग का मैदान बनाने की नीयत नहीं आया । लेकिन तुम अम्न और इंसानियत का मतलब नहीं समझ सकते तो मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि मैं भागने की कोशिश नहीं करूंगा। हम पांच है लेकिन हमारे हथियार हासिल करने से पहले तुम्हें कम से कम अपने बीस आदिमयों लाशें उठानी होंगी। फिर तुम्हें यह भी नहीं समझना चाहिए कि जंग खत्म हो जाएगी। हमारे खून की कुछ बूंदे गिराने के बाद कैस के सारे खानदान का लहू इस जमीन की प्यास नहीं बुझा सकेगा।”

अचानक हस्सान भागकर आगे आता है और तीरअंदाजों के सामने मुसना की ढाल बनकर खड़ा हो जाता है। फिर वह मुसना और उसके साथियों की तरफ देखता है और बुलंद आवाज में बोलता है, “आप पांच नहीं बल्कि अब छह है।” इस तरह से हस्सान इस्लाम के रास्ते पर चल पड़ता है।

माहबानो का क्या हुआ ? परिस्थितियों के लपेटे में आकर कैसे जरबख्त के दिमाग में यह बात बैठ जाती है कि हस्सान ही उसके बाप का कातिल है ? और वह कैसे सुहैल को उसके भाई हस्सान और इस्लाम के खिलाफ जंग के मैदान में भेजने के लिए तैयार करता है। ईरानी सल्लतन की सियासी स्थिति से मजबूर होकर कैसे जरबख्त को अपने बेहतरीन दिन कैदखाने में बीताने पड़ते हैं ? आगे किन परिस्थितियों में हस्सान और माहबानो मिलते हैं? मुसना की फौज में शामिल होने के बाद हस्सान कैसे एक के बाद महाज पर लड़ता जाता है? इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए इस नाविल से होकर गुजरना बेहतर होगा।

जनाब नसीम हिजाजी एक सधे हुये फनकार की तरह तारीखी नावेल “काफिला-ए-हिजाज” का ताना बाना बुनते जाते हैं। नम्र मोहब्बत और जमीनी स्तर पर इस्लाम के विस्तार में शामिल चरित्रों वह इस तरह से प्रस्तुत करते हैं कि इस नावेल को पढ़ते समय घटनाएं और तमाम चरित्र जेहन में उतरते चले जाते हैं। चरित्रों के माध्यम से एतिहासिक घटनाओं को पूरी तरह से खोलकर रख देते हैं। जंगी सूरतों को पूरे सिद्दत से उकेरते हैं, और पढ़ने वालों के आंखों के सामने फौजों ही हलचल स्पष्ट हो जाती है।

इस नावेल में मौजूद तमाम चरित्रों के संवाद भी कसे हुये हैं। इस्लाम और उसके व्यवहारिक रूप को समझने में यह नावेल निसंदेह सहायक सिद्ध होगा। इस नावेल का हिंदी में अनुवाद किया है सालिक धामपुरी ने। अनुवाद काफी सहज है। इस नावेल को प्रकाशित किया है अन्जुम बुक डिपो, मटिया महल, जामा मजिस्द(दिल्ली) ने।

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2 Responses to काफिला-ए-हिजाज इस्लाम के विस्तार से जुड़ी एक रुमानी प्रेम कहानी

  1. thanks for sharing such information great article thanks
    Website design

  2. आलोक नंदन जी सादर प्रणाम

    अभी मैंने लेख खोला ही है और शीर्षक ही पढ़ा है। तभी ये टिप्पणी कर रहा हूं। मेरी जानकारी के मुताबिकरुमानी का अर्थ ही प्रेम से संबंधित या प्रेम आधारित (वाली/वाला) होता है। सो अगर यूं लिख दिया कि रुमानी कहानी तो इसका ही अर्थ हो जाएगा प्रेम कहानीए इस लिए रुमानी प्रेम कहानी लिखने की जरुरत ही नहीं बचती। वरना इसका अर्थ हो जाएगा, प्रेम प्रेम कहानी। हो सकता है मैं गलत भी होयूं। कृप्या शंका दूर करने की कृपा करें।

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