केसरी या कालीचरण!

पूर्णिया से भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या 80 के दशक में बनी एक संवेदनशील फिल्म प्रतिघात एवं उसके मुख्य खलनायक कालीचरण की याद लोगों के जेहन में ताजा कर देती है। पूरी फिल्म एक आपराधिक छवि वाले नेता द्वारा महिला पर किए गए अत्याचार एवं शोषण पर आधारित है। फिल्म एक प्रताड़ित महिला की विवशता की कहानी है। कहीं से न्याय न मिलने पर फिल्म के आखिर में उस महिला द्वारा कालीचरण की फरसे से सार्वजनिक रूप से हत्या कर दी जाती है।

स्कूल संचालिका रुपम पाठक ने उसी तर्ज पर भाजपा विधायक राजकिशोर केसरी की चाकू मारकर विधायक आवास पर भरे जनता दरबार में हत्या कर दी। जहां एक ओर रुपम पाठक एक महिला है वहीं दूसरी ओर एक स्कूल संचालिका भी है इसलिए उनके विचारशून्य होने की कल्पना कहीं से भी नहीं की जा सकती। रुपम पाठक ने बीते वर्ष अप्रैल में केसरी और उनके सहयोगियों पर दुराचार का आरोप लगाया था जिसके संबंध में यह कहा जा रहा है कि वे बाद में इस बयान से मुकर गई थी। हालांकि बाद में फिर से उन्होंने इस मामले को प्रोटेस्ट पिटिशन डालकर दोहराया भी था।  

सर्वोच्च न्यायालय ने महिला शोषण और बलात्कार के बहुत से मामलों में स्पष्ट निर्णय देते हुए कहा है कि एक महिला कभी भी अपने चरित्र पर बलात्कार और शारीरिक शोषण जैसे इल्जाम सिर्फ दूसरों को फसाने के लिए नहीं लगाएगी। रुपम पाठक ने विधायक एवं उनके एक सहयोगी पर पिछले तीन सालों से दुराचार का आरोप लगाया था। उसके बाद पुलिस अधीक्षक के पास लिखित आवेदन भी दिया।

रुपम पाठक का बाद में 164 का बयान जो न्यायिक दंडाधिकारी के सामने दिया जाता है को बदलना, चौथी बार लगातार पूर्णिया के विधायक बने केसरी की मजबूत राजनीतिक प्रभाव एवं उसकी दबंगता का परिणाम हो सकते हैं। 2006 में रुपम पाठक के स्कूल का उदघाटन राजकिशोर केसरी ने किया था जो यह बयां कर रहा है कि उन दोनों के आपसी ताल्लुकात थे। गौरतलब है कि विधायक का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है जिसके तहत रिश्वतखोरी, हत्या का प्रयास, बलात्कार, चोरी, दंगा भड़काना आदि प्रमुख रुप से शामिल हैं।

इस पूरे प्रकरण में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का बयान पक्षपातपूर्ण, बचकाना एवं गैर जिम्मेदाराना ही नहीं, हास्यास्पद भी है। उनका कहना है कि साजिश के तहत विधायक की हत्या हुई है और हमलावर महिला से दुराचार के आरोप मनगढ़ंत हैं, उसने झूठा आरोप लगाया था। साथ ही वह विधायक को ब्लैकमेल कर रही थी (प्रश्न उठता है कि क्या कह कर ब्लैकमेल कर रही थी) तथा किसी के दबाव में आकर उसने इस घटना को अंजाम दिया है। सुशील मोदी के बयान का आंकलन यदि गम्भीरता से किया जाए तो यह न्याय की प्रक्रिया चलाने से पहले ही न्याय की परिधि को निर्धारित करने वाला काम है। वास्तव में यह वक्तव्य राज्य के उपमुख्यमंत्री का नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के एक संकीर्ण नेता का मालूम पड़ता है ,जिसके उपर पार्टी विधायकों की वकालत करने की जिम्मेवारी है। यह जिम्मेवारी उस समय और बढ़ जाती है जब विधायक, 1974 की राजनीति से जुड़े हुए हों।

एक स्त्री द्वारा किसी दबंग पुरुष विधायक की सरेआम हत्या वह भी चाकू घोंप कर किसी घृणित कहानी को ही बयान करती है। अबला के चरित्र का मूल्यांकन आंचल में दूध और आंखों में पानी से किया गया है। आखिर वह कौन सी परिस्थितियां होती हैं जब अबला सबला बन जाती है। पुलिसिया तहकीकात में किसी भी हत्या के पीछे जोर (ताकत),जोरु (स्त्री) एवं जमीन होने का दावा किया जाता है। विधायक की हत्या की गुत्थी सुलझाने में प्रशासन कौन सी तकनीक अपनाएगा ?

रुपम पाठक द्वारा विधायक की हत्या उसके शोषण और अत्याचार की पराकाष्ठा रही होगी । चौतरफा न्याय की गुहार के बाद भी जब कोई रास्ता नहीं दिखता तब बात हत्या या आत्महत्या तक आती है। चाकू से विधायक की हत्या का विचार उस स्त्री के लिये अपना जीवन दांव पर लगाने के बराबर ही था ।पुरुष और महिला की शारीरिक शक्ति की कोई तुलना नहीं है। चाकू अपने बचाव एवं आक्रमण का भी सशक्त साधन नहीं है । यदि यह साजिश है तो उस महिला के हाथों में पिस्तौल होती चाकू नहीं, ताकि प्रहार के बाद वह अपना बचाव कर सके। यहां चाकू के प्रहार से विधायक की मौत तो हो जाती है लेकिन विधायक आवास पर मौजूद भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा उस महिला की बुरी तरह पिटाई कर दी जाती है। पिटाई से महिला को बुरी तरह जख्मी करके विधायक के गुर्गों ने सुशासन की ही धज्जियां उड़ाई हैं।

लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान का बयान कि यदि पूर्व में इस घटना पर ध्यान दिया जाता तो विधायक की हत्या नहीं होती। गंभीर विषय यह है कि पूर्व में इस पर ध्यान जाता कैसे यह तो एक साधारण सी स्कूल संचालिका एवं दबंग विधायक का मामला था। सामर्थ्यवान को दोष नहीं होता, फिर चार बार लगातार जीत कराने वाले विधायक के सामने एक महिला की क्या औकात?

यदि पूरे मामले को गहराई से देखा जाये तो इसमें कई बातें आती हैं। रुपम पाठक को पता था कि वह एक खौफनाक काम को अंजाम देने जा रही है और इस काम को अंजाम देने के पहले अच्छी तरह से सोचा होगा या फिर एक मानसिक आवेग में आकर उसने यह कदम उठाया होगा। इस मानसिक स्थिति में वह क्यों आई?  कहीं विधायक राज किशोर केसरी के लंबे हाथ उसके परिवार वालों को तो नहीं नाप रहे थे? कहा जाता है कि जानवर भी तभी किसी शिकारी पर हमला करता है जब उसे भागने का कोई रास्ता नहीं मिलता, या फिर अपने बच्चों को बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाता है। रुपम पाठक भी कहीं ऐसे ही किसी चक्रव्यूह में तो नहीं फंसी हुई थी, जो बिहार में सुशासन के हो-हल्ला के बीच गंभीर न्यायिक जांच की मांग करता है।            

बहरहाल, भयमुक्त, अपराधमुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश की जिम्मेवारी उठाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहली लड़ाई बाहुबलियों से होनी चाहिए। संपत्ति का ब्योरा मांगने से ज्यादा जरुरी उनके चरित्र के ब्योरे को सार्वजनिक करना है ताकि इस तरह की घटना दोहराई न जाए एवं जनप्रतिनिधियों का नुकसान प्रदेश को न हो।

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3 Responses to केसरी या कालीचरण!

  1. हरिशंकर गोस्वामी says:

    मैं आपकी बात का समर्थन करता हूँ. कोई भी महिला जब अपने बच्चों पर कुदृष्टि देखती है तो काली बन जाती है. कुछ इसी तरह की खबर आज आई-नेक्स्ट में भी आयी है. मुझे तो हैरत साले नामर्द मीडिया वालों पर होता है जो सरकार के गुणगान में पड़े हुए हैं. यहाँ हर रोज अपहरण, हत्या और भ्रष्टाचार के कीर्तिमान बनते जा रहे हैं और सरकार घोषणाओं का कीर्तिमान बनाने में लगी हुयी है. मिस्टर क्लीन को अपने आजू-बाजू के लोगों को देखने की आवश्यकता है दामन तो बड़े भाई का भी गन्दा नहीं नहीं था, उनको भी उनके चमचे-बेलचे लोगों ने ही पार लगाया है. कहीं छोटे भाई का दामन दागदार न हो जाए समय रहते चेत जाएँ तो अच्छा नहीं तो ये उनके साथ-साथ हमारा भी दुर्भाग्य होगा.

  2. birendra yadav says:

    badhiya hai.
    badhai.
    birendra

  3. ranjan ravie says:

    The woman is a symbol of the real indian woman.She should be rewarded.I salute the real heroes and I APPRECIATE you for covering this story,where all journalists are trying to cover it up.
    nice job.

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