खोखली रचना (कहानी)

पता नहीं क्यों उसे लग रहा था कि वह अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा है। लड़कियों से नजदीकी के अपने हर पल को राजन याद कर रहा था। उसे लग रहा था कि जिंदगी में इन लड़कियों से चिपकना ही जीवन की सार्थकता और सहजता थी। बाकी सब कुछ बनावटी है, समाज के संस्कार, राजनीति का मुखौटा और कोर्ट-कचहरी का तामझाम। सब इंसान की खोखली रचना है, जिसे लोगों के सामने बहुत ही मजबूती से परोसा गया है।

राजन भूल नहीं पा रहा था कि कैसे रश्मि उससे चिपक जाती थी। वह बार-बार कहती थी, “आई लव यू, आई लव यू टू मच. मुझे बहुत प्यार करो, मुझे बहुत प्यार करो। ” ऐसा लगता था कि पारिवारिक संस्कार के जो बादल लंबे समय से उस पर छाये हुये थे, वे उड़ रहे हैं और अस्तित्व का सूरज निकल रहा है। उसे अभी भी याद है कि रश्मि की आगोश में वह प्यार की तलाश करता रह जाता, पर उस पल उसे खोज पाना बहुत मुश्किल था। उसके दिमाग पर ये प्रश्न छा जाते कि क्या इससे भी अलग जिंदगी में कुछ है। राजन के मुंह से खुद ही जवाब निकल जाता, “कुछ भी नहीं, कुछ भी तो नहीं, बाकी सबब इंसान की मजबूरी है।”  

पता नहीं कैसे श्वेता में उसके लिए चाहत जाग गई। वह श्वेता को नजदीक आने से रोक नहीं सका। फिर एक नई अहसास की शुरुआत हुई। राजन जब भी उसके शरीर के किसी अंग को छूता तो वह खिलखलाकर हंस देती थी। उसके मुंह से सहज रूप से निकल जाता था, “छि, क्या करते हो, बड़े बेशर्म हो तुम, कहां से सीखा यह सब।” राजन सोंच रहा था कि आज भी वह अदालत में सवालों का जवाब देता है और सवाल पूछता है। श्वेता के उन सवालों की सहजता अदालत में क्यों नहीं है। उसे ऐसा मालूम पड़ रहा था कि अदालत में उलझे लोग झूठे सवालों और झूठे जवाबों के अंबार में न्याय तलाशने की एक झूठी कोशिश में लगे हैं। फिर भी इसकी मजबूती को लोग स्वीकारते हैं। मोटी-मोटी कानून की किबातों को छापकर अदालत के निर्णय और बहस को रिकार्ड के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी रखा जाता है। श्वेता के उन अहसासों की व्यवस्थित तलाश बहुत मुश्किल थी।

राजन सोंच रहा था कि आज वह स्त्री अधिकार और उनके शोषण के खिलाफ लड़ने वाले वकील के रूप में प्रसिद्धि पा रहा है। कोर्ट में उसके बहस के अंदाज पर जज भी आश्चर्यचकित होते हैं। प्यार में धोखा, शारीरिक संबंध व लंबे समय तक चलने वाले नाजायज संबंधों पर खतरनाक तरीके से कानूनी बहस करता हुआ राजन बहुत से स्त्री अधिकारों और उनके शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने वाले संगठनों का कानूनी प्रतिनिधि बना हुआ था। वक्त के इस बदलाव को राजन आश्चर्यचकित होकर निहार रहा था। लंबे समय से उसे  अपनी व्यक्तिगत जिंदगी की तरफ देखने की फुर्सत भी नहीं मिली थी। मिलने वाले लोगों का तांता लगा रहता। राजन को सभा और संगठनों में व्याखान और चर्चा के लिए बुलाया जाता। उसमें अपने सारे कामों को बहुत ही व्यवस्थित रुप से निपटाने की एक उत्कृष्ट क्षमता उभर कर आ गई थी। बड़े ही परिपक्व अंदाज में वह हर तरह के व्यक्तियों को अलग-अलग तरीके से डील करता। कानून के अलावा राजन की राजनीतिक और सामाजिक समझ भी एक ऊंचाई छू रही थी।

राजन को प्रीती की याद आ रही थी। कितने प्यार से वह उसके होंठो को चूम कर कहती थी, “तुम्हारे इन होंठो को खाना मुझे बहुत अच्छा लगता है। अगर तुम्हारी शादी भी हो गई ना तो अपने इन होंठो को खिलाने के लिए मुझसे जरूर मिलना।” राजन अपने होंठो से जीवन, प्यार, समाज, राजनीति आदि विचारों को बड़ी गहराई से चित्रित करता था। शायद इसलिये आश्चर्य से सुनते हुये प्रीत को उसके होंठ भा गये थे । प्रीति भी उसके साथ कानून की पढ़ाई कर रही थी। आज वकालत में अपनी मजबूत पहचान बना चुका राजन प्रीति के उन शब्दों को याद कर रहा था कि तुम जिंदगी में कभी व्यवहारिक और व्यवस्थित नहीं हो सकते। प्रीति को ऐसा लगता था कि इस बेतरतीब लड़के को संभालना उसकी एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। राजन को लग रहा था कि इस व्यवस्थित वकील की तुलना में वह बेतरतीब लड़का ज्यादा खुश था।

राजन सोंच रहा था कि पता भी नहीं चला और कहानी कैसे आगे बढ़ गई। कितना विरोधाभाष है जिंदगी में। सहज दिखने वाली यह जिंदगी कितनी उलझनों से घिरी होती है। इन उलझनों को सुलझाते-सुलझाते इनसान कितना आगे निकल जाता है।

एक झटके में अपने इन उड़ते हुये ख्यालों को हटाकर राजन उठ खड़ा हुआ और जल्दी से उसने अपनी डायरी उठाई और आज पूरे दिन के अपने कार्यक्रमों पर नजर डाली। शाम छह बजे उसे महिला संगठन कि एक बड़ी सभा को संबोधित करना था, जिसके विषय डायरी में लिखे हुये थे, “प्यार में शारीरिक शोषण।”

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