नीतीशम् नमामि का दौर

चंदन कुमार मिश्रा, पटना
छात्राओं को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने पर दस हजार रूपये देने के राजनीतिक फायदे  
1) बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के कर्मचारियों को सुनहरा अवसर मिले जिससे वे नंबर बढ़ाने के नाम पर खूब पैसा ऐंठ सकते हैं । इसका सबूत खोजना बहुत कठिन है, क्योंकि कौन इतना मूर्ख है जिसका नंबर बढ़ रहा हो और दस हजार रूपये मिलेंगे वो आपसे यह बात कहेगा । कर्मचारियों की बात तो छोड़ ही दें । उनका तो पेशा है और पेशे के साथ बेईमानी करना घोर अपराध है । 
 2) हर स्कूल को अपना नाम बचाना हो और जहां परीक्षा केंद्र हो, उसके गार्डों को चैन से रहना हो तो परीक्षा को कदाचारयुक्त बनाने में सहयोग देना और उसके लिए भी घूस लेना तो पड़ेगा ही। 
 3)जब इन दो महान कार्यों को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया जाए तो सरकार का रिकार्ड बनेगा कि इस सरकार के शासन में परीक्षा-परिणाम बहुत बेहतर रहे । इसके लिए बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को और उसके सचिव, अध्यक्ष आदि को सरकार की तरफ़ से सुविधा और सम्मान मिलना भी लाजमी है। 
 4) देश और विदेश में यह प्रसिद्धि मिलेगी की बिहार सरकार ने बहुत प्रशंसनीय कार्य किए हैं। सरकार की यह एक बड़ी शैक्षिक उपलब्धि मानी जायेगी । लड़कियों की ओर ध्यान देने और महिला सशक्तिकरण में सहयोग देने के लिए हो सकता है अधिकारियों, विधायकों या मंत्रियों य फिर मुख्यमंत्री को किसी चैनल आदि की तरफ से कोई अवार्ड या विश्वविद्यालय की तरफ से मानद डिग्री भी मिल जाये। डिग्रियां भी घूस की तरह होती हैं । देनेवाले इतने समझदार होते हैं कि कलाकार को एक्टिंग के लिए देते हैं तो दूसरी तरफ़ विद्वान कहलाने वालों की इच्छा पालनेवालों को डिग्रियाँ देते हैं। इसे कहते हैं राजनीति । सबसे बड़ा आश्चर्य होता है कि देनेवाले राजनीतिशास्त्र पढते नहीं, बल्कि राजनीति के प्रैक्टिकल अनुभवी महात्मा होते हैं । 
  
5) सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि होती है कि अगली बार फिर सत्ता मिलने का चांस बढ़ जाता है । अगर हर साल बीस हजार छात्राएं भी प्रथम श्रेणी प्राप्त कर लेती हैं तो उनके रिश्तेदार,दोस्त या पारिवारिक सदस्यों को लेकर दो-तीन लाख वोट तो सरकार की तरफ जाने का चांस बन जाता है । 
 6) अगर अन्य द्वितीय श्रेणी या तृतीय श्रेणी की छात्राओं ने भी सोचना शुरु कर दिया तो उन्हें कम-से-कम पांच और तीन हजार रूपये चाहिए ही । उन्हें भी फिर बाद में पैसे देने के वायदे का मुद्दा अगले चुनाव में काम 
आ सकता है । यानि सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से घूस देकर वोट खरीदने का काम किया। मैं यह नहीं कह रहा कि सरकार कोई रचनात्मक और अच्छा काम करे तो उसे इसी दृष्टि से देखा जाए पर सच को सच की तरह देखने की कोशिश की जानी चाहिए । 
 IT-Trainers नियुक्ति की कुछ बातें  
 2010 में बिहार सरकार द्वारा 600 सीनियर सेकेंड्री स्कूलों में IT-Trainer की नियुक्ति की घोषणा की गयी थी । वैसे अधिकांश लोगों को यह बात मालूम ही नहीं । जिस बिहार राज्य में 50 सीटों के लिए अगर लेडी सुपरवाइजर की नियुक्ति के लिए 2000-3000 महिलाओं को मेरिट-लिस्ट में शामिल किया जाता हो, वहां 2010 में Educomp Solutions Ltd.  को दिये गये ICT@Schools प्रोजेक्ट के सिर्फ 600 पदों के लिए 2011 में भी पदों का खाली रह जाना कुछ सोचने पर मजबूर कर देता है । इस काम के लिये बिहार सरकार द्वारा 51.14 करोड़ रूपये दिये जाने की बात कही गयी है । एक स्कूल पर लगभग साढे आठ लाख रूपये पड़ते हैं । पर इस पद पर कार्य करनेवाले को 5300 रूपये सैलरी देने की बात कही गयी । क्या बिहार सरकार के पास 600 पदों के लिए नियुक्ति करने लायक कोई विभाग नहीं ? उच्च शिक्षा विभाग को शायद बनाया  ही गया है निम्न शिक्षा बनाने के लिए। यहां देखें इस नियुक्ति के बारे में । 

http://www.educomp.com/News/NewsImage.aspx?id=235 

 एक महत्वपूर्ण चिंतनीय मुद्दा:  
 सरकार जानती है कि बीसीए की डिग्री के लिए कितने खर्च की जरूरत होती है पर ऐसा क्यों है कि एक लेडी सुपरवाइजर की तनख्वाह 12000 रूपये रखी जाती है और एक शिक्षक की 5300 यानि 5000 रूपये ही रखी जाती है । किसी भी विश्वविद्यालय से सामान्य स्नातक ( विज्ञान, कला या वाणिज्य ) के लिए सिर्फ पढने का कुल खर्च 10-15000 से ज्यादा नहीं । पर बीसीए की पढाई में पटना में ही सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय  से लगभग 80-90 हजार रूपये फिर कम्प्यूटर का खर्च अलग से होता है । इसी के आस-पास सभी अन्य 
विश्वविद्यालयों की फीस है । बिहार राज्य के विश्वविद्यालय के किसी कालेज में भी कम्प्यूटर का खर्च लेकर 40-50000 रूपये से कम नहीं । फिर ऐसा क्यों हो रहा है ? क्या जवाब है सरकार के पास । क्या यह कम्प्यूटर शिक्षा के साथ अच्छा व्यवहार है ? 
 शिक्षक नियुक्ति का सच  
काफी जोर-शोर से एक लाख से ज्यादा बहाली करने का श्रेय सरकार को दिया गया। इतने व्यापक स्तर पर नियुक्ति सरकार द्वारा की गयी । लेकिन क्या ये सच है इससे बेरोजगारी दूर हुई या गरीबी दूर हुई ? जिन लोगों के पास पचास हजार, एक लाख, दो लाख या इससे भी ज्यादा रूपये थे उन्हीं की नियुक्ति हुई। मुझे नहीं लगता है कि इसमें दस-बीस हजार से ज्यादा गरीब लोगों को नौकरी नसीब हुई हो । हां इस सरकार की विकास गाथा गाने वाले लोगों को यह जरूर जान लेना चाहिए कि अब मुखिया भी अपनी ताकत जान पाये कि वो भी लाखों रूपये सीधे ही लूट सकते हैं । फिर भी भ्रष्टाचार से मुक्त समाज बनाया जा रहा है । क्या दिखावा है ! गाय की आंखों पर हरे रंग के प्लास्टिक को चिपकाने से भूसा हरा नहीं हो जाता, हां वो हरा जरूर दिखने लगता है घास की तरह जिसमें बेचारी जनता या गाय फंस जाती है । वो खाती तो है भूसा ही पर यह मानकर कि वो हरी घास खा रही है । 
इस बहाली से जो आदमी खुद 10-20 या उससे ज्यादा कमा रहा था, अब उसने अपनी घर बैठी बीवी जिनका काम घर में बैठकर टीवी देखना, अगल-बगल दिन भर बतकही करना होता था, को भी नौकरी दिलवा दी जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ । यह अलग बात है कि जिस घर में कोई नौकरी नहीं थी, वे पैसे नहीं दे सके और अब भी बेरोजगार हैं । हां यह बात जरूर ध्यान देने योग्य है कि अब दस-बीस लाख वोटों का इंतजाम तो हो ही गया । कुछ लोग यह भी कहेंगे कि क्या गारंटी है कि सारे नियुक्ति वाले लोग इस पार्टी को ही वोट देंगे ? तो इस बार का चुनाव परिणाम देखा ही होगा और अगर ऐसे लोग हैं भी तो कितने । 
क्या इसे नोट से वोट खरीदने की लाजवाब तरकीब नहीं कहेंगे ? आखिर इंजीनियरी दिमाग है ! 
 सड़कों ने भी दिये वोट  
 सड़क ही वह मूल प्रगति चिन्ह है जिसे बिहार के अधिकांश लोगों ने शायद देखा है और वोट दिया है। हर तरफ़ सुना जा सकता है इससे पहले किसी ने इतने बड़े पैमाने पर इनका निर्माण नहीं किया । पटना बिहार की राजधानी है । बोरिंग 
रोड में जमुना अपार्टमेंट के बगल से जो रोड आनंदपुरी, नेहरु नगर को जाती है उसे पिछले दो साल से मैं देख रहा हूं । अधिकांश सड़कों को बनने के कुछ ही महीनों या एक-दो साल बाद कोई नहीं देखता । उनकी हालत पर कोई कुछ नहीं कहता । सड़कों से भूख नहीं मिटती, यह बताना नहीं पड़ेगा । लग सकता है कि मैं विपक्ष की तरफ़ से बोल रहा हूं तो ध्यान रखें मैं किसी पार्टी को कुछ नहीं समझता । जैसे देवताओं के शतनाम या सहस्रनाम हुआ करते हैं वैसे शब्दों को बदल कर और कुछ चेहरे बदल कर सभी पार्टियां एक ही देवता का नाम है । 
नीतीशम् नमामि का दौर है । सुनने को मिलता है कि लालू चालीसा लिखने वाले सत्येंद्र दूरदर्शी को बिहार पुलिस में नौकरी दी गयी थी । हो सकता है कि कोई सहृदय नागरिक नीतीशायण या नीतीशचरितमानस जैसे महाकाव्यों की भी रचना कर डालें ।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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