मिस्र में उपजे सवालों से भविष्य को जूझना होगा

मिस्र में मुबारक शासन को प्रतिदिन 310 मिलियन अमेरिकी डालर का नुकसान हो रहा है, शनिवार की सुबह   तहरीर चौक के पास गोलियां भी चली हैं, इस बीच 29 जनवरी की एक खबर आ रही है कि उपराष्ट्रपति सुलेमान पर हमला हुआ था, जिसमें उसके दो बाडीगार्ड्स मारे गये थे। स्टेट मीडिया अभी भी इस खबर पर खामोश है। 12 दिन से तहरीन चौक पर जन सैलाब उमड़ा हुआ है, घेराबंदी जारी है। इन खबरों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं, और इन सवालों से भविष्य को भी जूझना होगा। यह घेरावंदी योजनाबद्ध है या महज किसी घटना विशेष से लोगों की स्वस्फूर्त प्रतिक्रिया ? मिस्र में इस्लामिक ब्रदरहुड भी अगुआईयों की कतार में शामिल है, महज ये संयोग है   या इस्लाम का विस्तार ? ‘ट्यूनिशिया में पहले ही तख्ता पलट हो चुका है, यमन में भी कुछ इसी तर्ज पर इस्लामिक नारे उछल रहे हैं।

मुबारक घोषित रूप से अमेरिका परस्त हैं। अमेरिका ने अभी हाल ही में अफगान को समेटा है और ईराक को भी। हालांकि इसके पहले उसे इस्लाम के कुछ जख्म भी खाने पड़े थे। क्या यह इस्लाम का एक नये रुप में अवतार नहीं है? क्योंकि मुबारक के खिलाफ मिस्री सेंटिमेंट अघोषित रूप से अमेरिका के खिलाफ भी है, हालांकि इस तरह के नारे अभी नहीं उछले हैं। हो सकता है कि एक निश्चित स्ट्रेटेजी के तहत पहले मिस्र वाले अमेरिकी एजेंट से निपटना चाहते हैं। इस तरह की घेराबंदी एक दो दिनों के परिणाम नहीं होते, अथक योजना और अथक परिश्रम की जरूरत पड़ती है। जल सैलाब को हांक मारना आसान नहीं होता। अलबरादेई का सही समय पर मिस्र में प्रवेश महज इत्तफाक नहीं हो सकता, एक निश्चित घटनाओं की रूपरेखा लंबे समय से तैयार की जाती रही होगी।      अरब लीग के अगुआ उमर मूसा प्रदर्शनकारियों में शामिल हो गया है और इस दिन को मुबारक के लिए विदाई का दिन कहा गया है। अमर मूसा राष्ट्रपति के रूप में आने वालों में शामिल है।

कहा जा रहा है कि शुक्रवार को मुबारक समर्थकों का एक समूह खूनी अंदाज में तहरीर चौक की ओर चला आ रहा था, उन्हें रोकने के लिए सैनिकों को गोलियां चलानी पड़ी। यानि सैनिक पूरी तरह से मिस्र में संभावित खूनखराबों को रोकना ही अपनी ड्यूटी मान रहे हैं. मुबारक के कमांड से पूरी तरह से निकल चुके हैं, और एक तरह से इस घेराबंदी को प्रोटेक्ट ही कर रहे हैं।

मिस्र में पिछले कुछ दिनों से जारी हिंसा के लिए मुबारक ने मुस्लिम ब्रदरहुड को ही दोषी ठहराया है। मिस्र की इस क्रांति में एक पत्रकार मोहम्मद महमूद का भी खून बहा है। एक सप्ताह पहले उसे गोली लगी थी। अपनी बालकोनी से प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच जारी हिंसा की वह तस्वीर ले रहा था। उसी समय उसे गोली लगी थी। मिस्री क्रांति में मरने वाला मुहम्मद पहला पत्रकार है। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि पिछले एक सप्ताह में पत्रकारों पर 101 हमले हुये हैं। यहां प्रेस स्वतंत्रता पर लगातार हमला हो रहा है। वर्दी पहने कुछ लोगों ने होटलों में घुसकर पत्रकारों के सामान हड़प लिये और मारापीटा भी। राज्य शासित अल-अहराम फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित अखबार अल-ताववुन में काम करने वाला पत्रकार अहमद मोहम्मद महमदू मिस्र में मारा जाने वाला पहला पत्रकार है।     

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक मिस्र में तेजी से बदलाव लाने की बात कर रहे हैं। यानि राष्ट्रपति बराक के नेतृत्व में अमेरिका भी यह मान चुका है कि मिस्र बदलाव की ओर कदम बढ़ा चुका है और अब इसे रोक पाना संभव नहीं है। अभी पूरे प्रकरण में राष्ट्रपति बराक को तौलना थोड़ी जल्दबाजी होगी, लेकिन जो खबरें अमेरिका से बराक के विरोध में आ रही है वे इसी ओर इशारा कर रहीं है कि बराक को कांफिडेंस में लेकर ही मिस्र में तुफान खड़ा किया गया है। बराक के नेतृत्व में इराक से अमेरिकी सेना को वापस किया गया है, और अफगान से भी। इससे यही लगता है कि इस्लामिक वर्ल्ड को लेकर बराक का दिमाग पूरी तरह से साफ है।

जर्मन चालंसल एंजेला मार्केल ने कहा है कि मिस्र में बदलाव होगा, लेकिन जरूरत है शांतिपूर्ण बदलाव की। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डैविड कैमरोन ने कहा है कि मिस्र में तबतक स्थायित्व नहीं आ सकता जबतक कि सुधार न हो। वैसे मुबारक यही कह रहे हैं कि भागने के बजाय वह मिस्री धरती पर मरना पसंद करेंगे।  

सरकार समर्थित पत्रकार और अधिकारी पिछले कुछ दिनों से लगातार विदेशी पत्रकारों पर इजारायली जासूस होने का आरोप लगा रहे हैं, और उनके खिलाफ एक माहौल तैयार कर रहे हैं। इसे मुबारक प्रशासन की स्ट्रेटेजी का एक हिस्सा माना जा रहा है। विदेशी पत्रकारों के खिलाफ यह अफवाह लोगों को भड़का भी रहा है। यही वजह से है कि आम लोग भी विदेशी पत्रकारों के खिलाफ हो रहे हैं. पश्चिमी और अरब वर्ल्ड के कुछ प्रमुख मीडिया संगठनों के खिलाफ गुस्सा ज्यादा है। काहिरा में अल-जजीरा के दफ्तर पर भी हमला हुआ है। अल जजीरा के साथ-साथ बीबीसी, अल-अरबिया, एबीसी न्यूज, वाशिंगटन पोस्ट, फाक्स न्यूज और सीएनएन ने भी कहा है कि मिस्र में काम कर रहे उनके लोगों पर हमला हुआ है। मुस्लिम ब्रदरहुड के हवाले से कहा गया है कि उसके वेबसाईट के दफ्तर पर सुरक्षाबलों ने धावा मारा और पत्रकारों, तकनीशियनों और प्रबंधकों को पकड़ कर ले गये। जाते जाते दफ्तर को को क्षत विक्षत कर गये।

मिस्र के साथ आईडेंटी क्राइसिस नहीं है, व्यापक इतिहास और सभ्यता को अपने में समेटे हुये है। मूसा का एक्सोडस मिस्र से ही हुआ था, एक बहुत बड़ी आबादी के साथ। क्या वर्तमान वर्तमान मिस्र में उमर मूसा का अचानक सामने आना महज एक संयोग है, या फिर इतिहास का प्रतिशोध?? आने वाली तवारिखें इन प्रश्नों को स्पष्ट करेंगी। फिलहात तो यही लग रहा है कि मिस्र करवट मार चुका है।

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