बाल विवाह : छिनता बचपन

 

वर्डस्वर्थ ने कहा है, The child is the father of the man. व्यस्क की कार्यशक्ति उन अवसरों पर निर्भर करती है जो उसे बचपन में मिली है। साथ ही किसी भी देश की गुणवत्ता बच्चों के विकास पर ध्यान देने से बढ़ती है। भारत की जनसंख्या में 40% बच्चे हैं। यदि इन बच्चों का विवाह समय से पहले कर दिया जाये तो कच्चे घड़े पर पानी डालने जैसा ही होगा ।

 भारत में 47 फीसदी महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ है। एक ओर जहां भारत विश्व की चौथी उभरती अर्थव्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर दुनिया के 20 सबसे ज्यादा बाल विवाह होने वाले देशों में भारत का स्थान 11 वां है। अमेरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत को शक्ति के रुप में चित्रित किया है। भारत की तुलना चीन, अमेरिका , जापान जैसे विकसित देशों से की जाती है, वहीं बाल विवाह जैसे सामाजिक मुद्दों पर भारत अति पिछड़े अफ्रीकी देशों इथोपिया और लीबिया के साथ खड़ा नजर आता है। आर्थिक उन्नति के साथ यह सामाजिक पतन त्रासदी नहीं तो और क्या है ?

भारत के विभिन्न राज्यों में भी काफी असमानता है। बिहार में 69 फीसदी महिलायें 18 वर्ष के पूर्व व्याह दी जाती हैं , वहीं गोवा में यह 12.1 फीसदी है। राजस्थान में 65.2 , आंध्रप्रदेश में 54.8, पश्चिम बंगाल में 54, असम में 38.6, तमिलनाडू में 22.3 फीसदी बालविवाह होते हैं। बिहार में महिलाओं का सर्वाधिक बाल विवाह , गांधी जी की कर्मभूमि  पश्चिम चंपारण में 80 फीसदी है और न्यूनतम राजधानी पटना में 40 फीसदी है।

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा सत्य के प्रयोग , में लिखा है- “  यह लिखते हुये मन अकुलाता है कि तेरह साल की उम्र में मेरा विवाह हुआ था , आज मेरी आखों के सामने बारह तेरह वर्ष के बालक मौजूद हैं। उन्हें देखता हूँ और अपने विवाह का स्मरण करता हूँ, तो मुझे अपने उपर दया आती है और इन बालकों को मेरी स्थिति से बचने के लिये बधाई देने की इच्छा होती है। तेरहवें वर्ष में हुये अपने विवाह के समर्थन में मुझे एक भी नैतिक दलील सूझ नहीं सकती।   ”  स्वयं राष्ट्रपिता भी  इस अभिशाप से बच नहीं पाये थे। यदि आज वे होते तो शर्मसार हो गये होते कि आजादी के इतने वर्षों के बाद भी भारत इस समस्या से जूझ रहा है।

बाल विवाह का मूल कारण पितृसत्तात्मक सोच और लड़कियों के प्रति रूढ़ीवादिता है। सामाजिक दबाव , सांस्कृतिक व्यवहार , गरीबी , वैकल्पिक संसाधनों का अभाव तथा सामाजिक सुरक्षा की भावना उत्प्रेरक की भूमिका अदा करते हैं। नारी प्राचीन काल से ही भीरया रही है। समाज उसे गृहस्थी के मुख्य और सम्मिलित पक्षों को उसके ही पक्ष  में रखकर उसे ढोने के लिये मजबूर करता है। पढ़ने लिखने की उम्र में बच्चों को गृहस्थी के चक्रव्युह में डालना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करना है।

सरकार बाल विवाह को रोकने के लिये के प्रयासरत है। बलविवाह प्रतिषेध संशोधन अधिनियम 1978, में  विवाह की आयु लड़कियों के लिये 15 से 18 तथा लड़कों के लिये 18 से बढ़ाकर 21 कर दी गयी है। इससे पहले विवाह करना दंडनीय अपराध है।

बिहार सरकार भी बाल विवाह रोकने के लिये प्रयासरत है। बालविवाह प्रतिषेध  अधिनियम 2006, की धारा 19 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुये बिहार सरकार ने नियमावली 2010 बनाया है जो 11 मई 2010 संपूर्ण बिहार राज्य में लागू हो गया है। इसके तहत बालविवाह रोकना , सुरक्षा प्रदान करना तथा अपराधियों को सजा देने का प्रावधान है। धारा 9(1) के तहत , बालविवाह के पहले या बाद में कोई भी व्यक्ति इस घटना की सूचना बालविवाह प्रतिषेध पदाधिकारी, प्रखंड विकास पदाधिकारी, थाना या ग्राम पंचायत के सरपंच को मौखिक या लिखित या डाक से या इलेक्ट्रानिक माध्यम से दे सकता है।                  धारा 9(2) के तहत बालविवाह प्रतिषेध पदाधिकारी से भिन्न अधिकारी बालविवाह अनुष्ठान की सूचना प्राप्त करने पर ऐसी सूचना रिपोर्ट के साथ , बालविवाह प्रतिषेध पदाधिकारी , को देंगे, उसके बाद वह अधिनियम के उपबंधों के अधीन उपयुक्त कार्रवाई करेगा।

यह अधिनियम तभी सार्थक हो सकता है जब लोगों में जागरुकता आये । इस अभियान में जिला एवं पुलिस प्रशासन , बाल कल्याण समिति स्वयंसेवी संगठनों एवं जनसंचार के माध्यमों का योगदान अपेक्षित है।

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3 Responses to बाल विवाह : छिनता बचपन

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  2. radhey says:

    aap sahi kah rahi hai anita ji bachpan to sahi mi chin gaya hi

  3. Santosh sharma says:

    good article but i think that there is some need of reform in pronounciation,becoz the pronounciation of some word is belonging from limit region like akulana means vyakul hona..

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