पटना को मैंने करीब से देखा है (पार्ट-1)

(दिल्ली, जम्मू, पंजाब और मुंबई जैसे शहरों में  लंबे समय तक भटकने के दौरान पटना की बहुत याद आती रही। जिंदगी और खुली आंखों से देखे गये सपनों ने कहीं ठहरने की फुर्सत नहीं दी…जिधर खिंचा, चल दिया..अब पटना में कुछ सुकून से हूं…तो क्यों न इस शहर के बारे में ही लिखा जाये?……यह मेरा शहर है, मेरा, इतना तो मैं कह ही सकता हूं…दशकों से इस शहर से दूर रहने के बाद मैं यह जान गया हूं..कि मैं इसे दिवानगी के हद तक प्यार करता हूं… )

 

आंखों के सामने बिना एडिटिंग के दौड़ते विगत के दृश्य

आलोक नंदन

पटना को मैंने करीब से देखा है, यह कहना बेहतर होगा कि यहां की हर शय को मैंने जिया है…बेपरवाही के हद को पार करते हुये। यहां की कूचनभरी गलियां, बिखरी बलखाती सड़के,घासफुस…पेड़-पौधे…सुलझे-अनसुलझे और उलझे हुये लोग…पानियों की रफ्तार और आंसू गैस से त्रस्त हुजूम, सिनेमा हाल के टिकटघर पर ताबड़तोड़ घूंसेबाजी, हाथों में थ्री-फिफ्टिन (देसी कट्टा) लेकर गोलीबाजी करते लौंडे,   थाना, कचहरी और जेल….शायद सबकुछ। 20 साल में 15 साल लालू के खाते में गया और अगला पांच साल नीतीश के खाते में। क्या वाकई में पिछले दो दशक में इस शहर की अदा बदली है?

कहा जा सकता है कि दो दशक किसी भी  शहर को तब्दील करने के लिए काफी होता है, लेकिन बदलता है सिर्फ शहर का आवरण, मूल प्रजातियों और उनके चरित्र में कोई तब्दीली नहीं आती। हर शहर की अपनी आनुवांशिक विशेषताएं होती हैं। आज पटना में चारों तरफ होर्डिंग लगे हुये हैं, जिनपर रंग-बिरंगी रोशनी रात को शहर को और भी चमकीला करने की कोशिश करती है, लेकिन बार-बार के बिजली कट से इसका सौंदर्य अंधेरे में दफन होता मालूम होता है। दुनियां में सभ्यता के क्लाइमेक्स पर जितने भी शहर हैं -बर्लिन, रोम, संघाई, न्यूयार्क, न्यूजर्सी, लंदन, टोक्यो, मुंबई, दिल्ली आदि- सभी के सभी होर्डिंगों से अटे पड़े हैं। निसंदेह होर्डिंग शहरों को चमक प्रदान करता है, और वहां रहने वाले लोगों को यह अहसास दिलाता है कि तमाम सभ्यताओं के साथ रफ्तार की दौड़ में वे भी शामिल हैं।

मैं पिछले कुछ दिनों से पटना में हूं, और यहां की आबोहवा में यह महक महसूस कर रहा हूं कि पटनावासी, जिन्हें अब अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी अखबारों में भी अन्य महानगरों की तर्ज पर पटनाइट्स कहा जा रहा है, इस सुखद अहसास से भरे हुये हैं कि यह शहर तेजी से मैट्रो सिटी के रूप में डेवलप हो रहा है। टेक्निक्ल पढ़ाई को साधने के लिए कंधे पर बैग लटकाये छात्रों की फौज, कानों में मोबाईल फोन का स्पीकर लगाकर स्कूटी दौड़ाती हुई लड़कियां, तमाम प्रकार के इलेक्ट्रौनिक मीडिया के चमकते हुये दफ्तर, सड़कों पर दौड़ती हुई ओबी वैन, हाथों में माइक लेकर सवाल पूछती महिला रिपोर्टस पटना में बदलाव के पदचाप का आभास कराते हैं। यहां से निकलने वाले तमाम अखबारों के पन्ने टेक्निकल कालेजों के विज्ञापनों से अटे पड़े हैं, जिसके कारण इस आभास को जिंदा रखना और बढ़ावा देना अखबारी व्यवसाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

बदलाव निरपेक्ष नहीं होता। इसपर सापेक्षता के सिद्धांत लागू होते हैं। बदलाव के तौर तरीके और चरित्र को समझने के लिए बेहतर होगा कि मैं दो काल खंडो का इस्तेमाल करूं…राजनीतिक दृष्टिकोण से पहले कालखंड को लालू युग कहना बेहतर होगा, और दूसरे को मिक्स्ड प्रोग्रेस एरा (नीतीश और भाजपा)। इन्हीं दो काल-खंडों के साये में मैं पटना को एक बार फिर से अपने दिलो-दिमाग में जीवित करने की कोशिश कर रहा हूं। इस काल खंड से इतर विचार रखने वाले लोगों से मेरी कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन इतिहास लेखन के नियमों की कसौटी पर इस काल खंड को कसा जाये तो यह पूरी तरह से सटीक बैठेगा, इसमें आब्जेक्टिविटी है, राजकीय पन्नों पर भी पूरी तरह से दर्ज है, और इसकी गूंज को फिजां में महसूस किया जा सकता है, यानि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी यह लोगों के अंत:करण में कहीं गहरा धंसा हुआ है।

आंखें कैमरा हैं और माइंड स्टोरेज रूम। मनोवैज्ञानिकतौर पर यदि हम जेहन को विगत में ले जाते हैं, तो आंखों के सामने एक धुंधलापन छा जाता है, और फिर विगत के दृश्य बिना किसी एडिटिंग के आंखों के सामने चलने-फिरने लगते हैं, साउंड इफेक्ट के साथ। अब यह पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे एडिट करते हैं। मोपांसा, बालजाक, पुश्किन और चेखोव की लेखनी में और कुछ नहीं बस उनके जेहन की एडिटिंग है, शायद यही कारण है उनके पात्रों और दृश्यों में रियलिज्म की धमक है, और सीधे आपके अगल-बगल में चलते-फिरते और बतियाते नजर आते हैं।

जेहन को टटोलकर जब मैं विगत में गोते लगाता हूं तो मेरी कानों में पुनाईचक मुहल्ले में रहने वाले उबड़-खाबड़ दांतों वाले एक काले लड़के की आवाज सुनाई देती है। 1974-75 के आसपास पुनाईचक के पास एक टीन का बना बड़ा सा सरकारी कार्यालय हुआ करता था, जिसे आंदोलनकारियों ने फूंक दिया था, और फिर पुलिस की गोलियां आंदोलनकारियों की ओर धांय़-धांय करते हुये लपकने लगी थीं। एक सनसनाती हुई गोली उस लड़के के बगल में खड़े एक आदमी के सिर पर लगी थी, और उसके सिर के परखच्चे उड़ गये थे। शायद यह जेपी आंदोलन की सुगबुगाहट थी, जिसे आगे जाकर संपूर्ण क्रांति के उदघोष में तब्दील होना था, और इसी की कोख से लालू युग और मिक्स्ड प्रोग्रेस एरा का सूत्रपात होना था। उस घटना को बताते हुये उस लड़के की नसे फड़फड़ाने लगती थी, और आंखे चौड़ी हो जाती थी, मानो अभी-अभी उसके सामने गोली चली है, और वह उस व्यक्ति के सिर के परखच्चे उड़ते हुये देख रहा है।

जेपी आंदोलन के बाद भी पटना के बीचो बीच लंबे समय तक वह जला हुआ आफिस अपनी जगह पर विशालकाय काला मृत दानव की तरह शांत भाव से पड़ा रहा। पुनाईचक मुहल्ले के लोग उसका इस्तेमाल टट्टी करने के लिए करते थे, जिसके कारण उसमें से हमेशा दुर्गन्ध निकलती थी। पुनाईचक मूल रूप से यादवों का एक गांव था, और आज भी है, लेकिन अब ग्लोबलाइजेशन की हवा का असर विभिन्न तरह के होर्डिंगों और लोगों के हाथों में पड़े मोबाइल के रूप में यहां देखा जा सकता है।

सचिवालय के बगल में होने के कारण इस गांव में सभी नस्लों के लोग निवास करते थे, लेकिन “गंउवा वाला” के नाम से एक विभेदक रेखा स्पष्टरुप से खींची हुई थी। बाकी लोग किरायेपर रहते थे, जिनके कारण उन्हें किरायेदार या बाहरी कहा जाता था। यादवों का पूरी तरह से बोलबाला था, आपसी रंजिश की स्थिति में भी  किरायदारों से धक्कामुक्की होने पर वे गोलबंद हो जाते थे। वैसे यादवों के बीच बारीक गोलबंदी कृष्णौठ और मजरौठ को लेकर होती थी। वह लड़का भी यादव ही था, लेकिन किरायदार।

बिहार में जीते जी किसने अपने नाम पर स्कूल और कालेज खोलने की प्रथा की शुरुआत की यह नहीं पता, लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रामलखन सिंह यादव ने इस प्रथा को विस्तार दिया, और उसके बाद देखते ही देखते बिहार के इतिहास के पन्नों पर कब्जा करने की होड़ में कई और नाम शामिल होते चले गये। धीरे-धीरे उन्हें राज्य की ओर से भी मान्यता मिलती चली गई। रामलखन सिंह यादव कांग्रेस के नेता थे और यादवों पर उनकी दमदार पकड़ थी। वह लड़का रामलखन सिंह हाई स्कूल में ही पढ़ता था, और उस समय के सामान्य मारपीट व गोपगीरी (हाई लेवल की गुंडागर्दी) के चलन के विपरित वह हमेशा किताबों में ही खोया रहता था, लेकिन जब कभी जले हुये आफिस की जिक्र होती थी तो वह पूरी रवानगी से उस दिन के घटना को बताता चला जाता था। उसके माइंड के हार्ड डिस्क पर वह घठना पूरी गहराई से अंकित हो गई थी।

जला हुआ विशालकाय आफिस पीड्ब्लूडी के कैंपस में पड़ता था, और उस कैंपस में ही मुहल्ले की दीवार से सटे डोमों का एक कुटुंब रहता था। उस जले हुये आफिस को छोड़कर बेलीरोड से सटे मुख्य द्वार की ओर पांच-छह पक्के इंटों की बनीं दो मंजिले आफिसें थी, जो आपस में अंदर से ही सीढ़ियों से जुड़ीं हुई थीं। इनमें नई-नई ईंटों और रंगों की चमक थी, जिसके कारण जले हुये विशालकाय आफिस की बदसूरती में और इजाफा हो जाता था। इन ईंटे वाले आफिसों में दिन भर बड़े बाबू, छोटे बाबू और अन्य तरह के तमाम बाबुओं का आना जना लगा रहता था। करीब पांच हजार लोग यहां काम करते थे। मजबूत यूनियनबाजी के कारण छोटे ओहदे पर काम करने वाले लोगों का मौज था। ये लोग अपने साहबों के कमरे में चाय-पानी का पुख्ता बंदोबश्त कर देने के बाद जाड़ा के मौसम में मैदान में सूरज की मीठी-मीठी धूप खाते हुये झुंड में बिखर कर ट्वेनटी नाइन (ताश का एक खेल) खेलते थे। एक झुंड में चार लोग खेलते थे और प्रत्येक खिलाड़ी के पीठ पीछे करीब चार-पांच लोग होते थे। सभी का ध्यान फेंके जा रहे पत्तों की तरफ होता था, और गेम समाप्त होने के बाद इस बात को लेकर चर्चा छिड़ जाती थी कि किसके पास कौन से पत्ते थे, किसने सही पत्ते चले, किसने गलती की, और कैसे सही पत्ते चलके कोई खिलाड़ी गेम पर काबू पा सकता था। गर्मी के दिनों में इनकी बैठकी कैंपस के चारों ओर लगे लाल-लाल फूलों वाली छायादार दरखतों के नीचे होती थी, बरसात में ताश का यह खेल कमोबेश बंद हो जाता था।

जला हुआ विशालकाय आफिस कैंपस के पश्चिम छोर पर था। अन्य आफिसों के चारों तरफ बड़े-बड़े मैदान थे, जबकि पुनाईचक की मुख्य सड़क इस जले हुये विशालकाय दानव से होकर ही निकलती थी, और जाकर बेलीरोड में मिलती थी। मामूली बदलाव के साथ यह सड़क आज भी अपनी जगह पर कायम है। लालू युग के दौरान मोस्यू (फ्रांसीसी भाषा श्रीमान के लिए युक्त शब्द) रंजन यादव ने पटना की सड़कों को दुरुस्त करने का जोरदार काम किया था। और शायद उसी का असर है कि इस सड़क की मजबूती और मुटाई बढ़ गई है।

डोमो का कुटुंब छह दिन तक तमाम आफिसों की सफाई में लगा रहता था और छुट्टी के दिन कैंपस में पाले हुये सुअरों में से किसी एक को पकड़कर उसे हलाक करता था, फिर सामूहिक रूप से छक कर पचास (स्थानीय भट्टी की शराब) पीता था और सुअर का भूना हुए मांस  खाता था। छुट्टी के दिन किसी एक सुअर को पकड़ने का एक्सरसाइज सुबह से ही शुरु हो जाता थी। चूंकि कैंपस बहुत बड़ा था, जिसके कारण सुअरों को दूर तक सरपट भागने का मौका मिलता था। सुअरों को थकाने के लिए पहले बच्चों को लगाया जाता था। वे लोग दो-तीन घंटे तक उन्हें लगातार दौड़ाते रहते थे। इसके बाद शिकारी युवकों की टोली हाथों में बांस बल्ला लेकर सक्रिय होती थी। उनके बांस बल्ले का टारगेट सुअर का थूथन होता था। थूथन पर एक सौलिड बल्ला लगते ही सुअर जमीन पर लोटकर जोर-जोर से चिंचियाता रहता था, और उसके थूथन पर बल्ला मारने वाला युवक गर्व से अपने अन्य साथियों की ओर देखता था।

खाने-पीने का दौर रात भर चलता था। शाम होते ही मुख्य आफिस के ऊपर लगे एक बड़े से बल्ब को वे लोग जला देते थे और जैसे-जैसे समय बीतते जाती थी वैसे-वैसे बिजली की गर्माहट से उसकी रोशनी बढ़ती जाती थी। मुहल्ले के निचले तबके के छोटे-छोटे लड़के उस रोशनी में देर रात तक उन्मुक्त होकर खेलते थे, डोम कुटुंब की महिलाएं बीड़ी का सूटा मारकर इधर-उधर की बातें करती रहती थीं, लड़के काठ के बने हुये बल्ले से क्रिकेट खेलते थे, और कुत्तों के झुंड खा-पी रही पुरुषों की टोली के पास मांस का गंध लेते हुये पूरे धैर्य के साथ अपनी बारी का इंतजार करते हुये रह-रहकर एक-दूसरे पर गुर्राते थे।

विशालकाय जला हुआ दानव रात में अपने उमेठे हुये बड़े-बड़े लोहे की भुजाओं के कारण और भी भयानक लगता था। रात के समय उधर फटकने की हिम्मत बच्चों को नहीं होती थी। उस दानव के अंदर सांपों और बिच्छुओं ने भी अपना डेरा बना रखा था, जिसके कारण रात में बड़े लोग भी उधर नहीं जाते थे।

किसी भी राजनीतिक आंदोलन का हिंसक हो जाना एक स्वाभाविक गुण है। दुनिया में कोई भी ऐसा आंदोलन नहीं मिलेगा, जो पूरी तरह से हिंसा से मुक्त रहा हो। साबरमती के संत के तमाम तरह के अहिंसक आंदोलनों का पटाक्षेप भी हिंसा से ही हुआ है, इस सच्चाई से मुंह मोड़ना इतिहास से आंखें चुराने के अलावा और कुछ नहीं है। डेमोक्रेसी और संपूर्ण क्रांति का नारा वाला जेपी मूवमेंट भी एक हिंसक मूवमेंट था, भले ही हाइपोथेसिस के लेवल पर इसे सजाने सवांरने की पुरजोर कोशिश की गई थी। पुनाईचक का काला दैत्यनुमा जला हुआ आफिस इस बात का प्रत्यक्ष गवाह था कि सत्ता और व्यवस्था के प्रति व्याप्त लोगों के दिलो में नफरत कभी-कभी सबकुछ भस्म करने पर उतारू हो जाती है, और नेतृत्व, नेतृत्व किये जाने वाले लोगों के सामने बौना पड़ जाता है। लोग सीधे तौर पर प्रकृति के नियमों से संचालित होने लगते हैं, और माल्थस के जनसंख्या सिद्धांत की भयावहता खुद-ब-खुद स्थापित होती चली जाती है।

 

जारी……( अगला अंक अगले शनिवार को)

This entry was posted in अंदाजे बयां. Bookmark the permalink.

13 Responses to पटना को मैंने करीब से देखा है (पार्ट-1)

  1. aniket says:

    वाह भईया…यादें आपकी लेकिन इस पर अधिकार हर उस बिहारी का है जिसने इस जीवन को जम कर जीया है । ऐसा लगा जैसे स्थान केवल बदल गया और इस याद मे मैं खुद खो गया ॥ बहुत अच्छा भईया । बिलकुल जीवंत ।

  2. Sundeep Kumar says:

    Your description of Patna is apt. A lot of well wishes for your Tewaronline.com. A lot is being written about Patna these days. A new novel in Hindi – ‘Alphari Grihtyagi’ by an IITian Prachand Praveer, published by Harper Collins has come out. If you can procure a copy, it’s a nice read about students from all parts of Bihar struggling to find their place in the world in Patna.

  3. Rajesh ojha says:

    आदरणीय आलोक जी,
    मैंने आपके ब्लॉग के बारे में सुना था| आज पढ़ने का भी मौका मिला| बहुत अच्छा लगा| आपकी बेलाग-लपेट वाली भाषा- शैली और बौद्धिक विचारों की सहज-सरल अभिव्यक्ति दिल को छू गयी| आपका ब्लॉग आने वाले दिनों में अत्यंत लोकप्रियता हासिल करे| यहीं मेरी शुभकामना है| आपके द्वारा लिखे गए उपरोक्त संस्मरण (जैसा मुझे लगा) में कहीं-कहीं किन्हीं शब्दों को लेकर मेरे मन में सवाल हैं| कृपया आप अपना ई-मेल पता देने का कष्ट करें|

  4. sanjay rai says:

    tum to narak se nikal liye. hum shayad na nikal paayen. patna ka bahut achchha varnan kiya hai. mauka mila to jarror judoonga tumhaare bog se.
    best wishes always!!!!!!!!!!!!!!!!!!

  5. Arjun Sharma says:

    Alok ji Aapki bhasha shaili bahut achi hai. jo shehar apna hota hai uske sath apnepan ka rishta to hota hi hai. mumbai ka kya kiya?

  6. Uddhav Thakare Huye 50 ke, Badhai dene pahuche “MY NAME IS KHAN” Ke KING KHAN
    Shiv sena ke karyakaari Adhyksha Uddhav ke 50 janmdin kaafi dhoom dham se manaya gaya ….Is avsar per unko badhai dene walon ka taanta laga raha hai… Nami Girami hastiyaan…Har kshetra ki hastiyaan unhe apne-apne tarike se shubhkamnayein aur badhaiyaan dee….Isi fehirist me Bollywood ke KING KHAN ka naam bhi shumaar hai…Shah rukh khan apne andaaz me unhe unke 50 janm divas par hardik shubhkamna aur badhaiyaan di…Iske liye unhone Shiv sena ke Mukhpatra (Mouthpiece) SAAMNA pe bakaayda aadhe page ka vigyapan bhi diya….Jiske madhyam se “Wish best Compliments from Red Chillies Entertainment” kaha. RED CHILLIES ENTERTAINMENT film company Shahrukhkhan ki khud ki company hai… Halanki “MY NAME IS KHAN” film me hui kamai ke aage ye kuchh nahi hai… February me SRK ki film “My name is khan” ke releasing ke samayShahrukh khan ne IPL me Pakistani Khiladiyon ke lene ki tarafdaari ki thee…jis par Shiv Sena ka bhari bharkam virodh King khan ko sahna pada tha …..Lekin is stunt me Shahrukh khan ki Film “My name is khan” ko kaafi kamai hui thee…Jiska aihsaan King Khan abhi tak maante aa rahe hain… Aur bavishya me bhi mante rahenge…Isi liye unhone Saamna me aadhe page ke vigyapan ke sath Uddhav Thakare ke ghar par unhe janmdin ki badhai dene pahuche…. Jisse unhe aage ki filmon me Nuksan na sahna pade…..Halaki Ye bhi hai, agar Maharashtra me rehna hai to Sena-Sena kehana hai….

  7. मन प्रसन्न हो गया आलोक भाई. इधर बहुत सारे ब्लोग्स पढ़े हैं और दलाल पत्रकारों द्वारा शुरू किये जाने वाले न्यूज़ पोर्टलों को भी देख रहा हूँ. बहुत ही शांत एवं उम्दा डिजाईन है. फॉण्ट साइज़ ऐसा है की आँखों को तकलीफ नहीं हुयी लम्बे लेख को पढने में. साले नए designers ख़ूबसूरत designing की होड़ में ऐसे फॉण्ट इस्तेमाल करते हैं कि हम उम्र के चौथे बसंत वालों की आँखों से तेल चूने लगे. कुछ लेखों में व्याकरण की अशुद्धियाँ हैं उस पर ध्यान दें और पैसों का क्या इंतज़ाम है? ऐसा न हो की विज्ञापन की होड़ में एक अच्छी शुरुआत दम तोड़ दे. एक donation का लिंक लगाएं पता नहीं इस चुतिया समाज में कितने लोग उसको क्लिक भी करेंगे लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग अवश्य अपना हाथ बढ़ाएंगे. बिहार सरकार इन दिनों न्यूज़ पोर्टलों को विज्ञापन दे रही है लेकिन उसके लिए उनको लौंडा नाच दिखाना होगा. देखिये कोई जुगत हो और बगैर समझौता के कोई रास्ता दिखे तो उस तरफ भी नज़र रखें. कुछ व्यावसायिक घरानों से संपर्क करें जो नियमित राशि दे सकें. पता नहीं मेरी सलाह कितनी सही है लेकिन पत्रकारिता के जूनून में घर मत फूंकना आलोक भाई. अपना समाज और अपने लोग बहुत निष्ठुर है मांस नोच लेंगे और हड्डियाँ तक चबा जायेंगे. शीघ्र ही मिलूंगा आपसे.

  8. prabhat says:

    dalali ka aur adda khula

  9. आलोक साहब को बहुत-बहुत मुबारक बाद …. कहा जाता है कि हिम्मते मरदां मददे खुदा … आप का प्रयास काफी सराहनीय है … हम साथ है लगे रहो ..

  10. RAJ SINH says:

    स्वप्निल से सहमत !

    और आपकी भाषा ,शैली ,तेवर से तो मैं परिचित हूँ ही ,अन्य सुधी जनों की सामान राय पा आनंदित हूँ .

    मेरी शुभकामनायें सदा तुम्हारे साथ हैं ‘ वत्स ‘ .

  11. RAJ SINH says:

    पुनश्च : मेरी वर्तनी की गलतियों को नज़र अंदाज़ करते रहना . ट्रांसलिट्रेसन का नौसिखिया हूँ , और अब तो आप भी पास नहीं हैं सिखाने को .

  12. editor says:

    स्पनिल भाई, आपने जो कुछ कहा है वो विचार करने योग्य है….निसंदेह इसे स्वतंत्र रूप से चलाते रहना एक चुनौती भरा काम है….अब नाच करने की स्थिति में नहीं हूं….फिर भी इस साइट के आर्थिक पक्ष को लेकर कुछ सटीक योजना बना रहा हूं….जब मुलाकात होगी तो विस्तार से बात होगी….
    आपका आलोक नंदन

    राज जी
    आपका प्यार और स्नेह मुझे हमेशा मिला है…और आगे भी मिलता रहेगा..वैसे भी आपके मार्गदर्शन की जरूरत है….आप मक्कड़ साहेब से न्यूजर्सी में जरूर मिलिएगा….मेरे लिये यह देखना अच्छा होगा कि भारत के दो सपूत अमेरिका में भारतीयों की सम्मान की लड़ाई को किस तरह से लड़ते हैं….
    आपका आलोक नंदन

    बाकी सभी लोगों को धन्यवाद ….मेरी पूरी कोशिश होगी कि यह साइट निर्भिकता से चलती रहे….बिना किसी समझौते के…..

  13. Md . firoj Akhtar says:

    kya concept hai

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>