क्या वाकई में आजादी की यह दूसरी लड़ाई है ?

सिविल सोसाईटी होता क्या है ?  क्या यह जनता द्वारा एक चयनित सोसाईटी है? या फिर गठित ? बार-बार यही कहा जा रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जारी अभियान में सिविल सोसाईटी के पांच सदस्य होंगे। सरकार की ओर से पांच लोग होंगे। सरकार की ओर से पांच लोग तो समझ में आने वाली बात है, लेकिन पूरे देश की जनता की ओर से सिविल सोसाईटी के पांच नुमाइंदे एक अचयनित बड़ी में से निकल कर करोड़ों जनता की नुमाइंदिगी का दावा कैसे कर सकते हैं। क्या यह कामेडी आफ डेमोक्रेसी नहीं है?

अन्ना हजारे के अनशन से सरकार झुकी, भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में अन्ना जीते, अन्ना की जीत हिन्दुस्तान की जीत, दूसरी आजादी की लड़ाई शुरु, एक से एक अंदाज में कुछ क्रांतिकारी तरीके से अन्ना की जीत की घोषणाएं की जा रही है, मीडिया में तो होड़ मची है, अन्ना को दूसरा गांधी साबित करने की।

क्या वाकई में आजादी की यह दूसरी लड़ाई है ? यदि हां तो भारत अपने आप में जनतंत्र के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा प्रयोगवादी लेबोरेटरी हो जाएगा, क्योंकि एक आजादी मिलने के बाद दूसरी आजादी की लड़ाई अब  तक किसी भी मुल्क में नहीं हुआ है। आजादी तो एक बार की चीजो होती है, आर या पार। तो मान लिया जाये कि भारत 1947 में आजाद ही नहीं हुआ  था?

सवाल बहुत हैं, और पब्लिक डिबेट नदारद है। बाप बेटे शशि भूषण और शांति भूषण सिविल सोसाईटी की ओर से सदस्य बनाये गये हैं, थोड़ी देर के लिए बाबा रामदेव ने वंशवाद को लेकर उनकी तरफ ऊंगली उठाया, लेकिन तुरंत ही इन्हें संभाल लिया गया, शायद बाबा रामदेव को यह अहसास कराया गया कि जनमत उनके खिलाफ हो सकती है। यह सही समय नहीं है सिविल सोसाईटी पर वंशवाद को लेकर उंगली उठाने का।

यदि देखा जाये तो देश की ज्यूडिसियरी वंशवाद की गिरफ्त में बुरी तरह से जकड़ी हुई है, वकीली में भी मामला कुछ ऐसा ही हैं। अन्ना हजारे का यह कहना कि पिता और पुत्र को उनकी काबिलयित के आधार पर ही ड्राफ्ट कमेटी में लिया गया है, एक तरह से उन वकीलो की काबिलयित को नकारने वाला जो रात दिनकर के वकीली की पढ़ाई करके देश के कोर्ट कचहियों में अपना जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

ड्राफ्ट कमेटी में सरकार की नुमाइंदगी कर रहे कपिल सिब्बल कह रहे हैं कि जन लोक पाल बिल से व्यववस्था में कोई सुधार होने वाला नहीं है और अन्ना हजारे उन्हें ड्राफ्ट कमेटी की सदस्यता छोड़ने को कह रहे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि कमेटी में बिल के प्रारुप को लेक जबरदस्त खींचतान होने वाली है। ड्राफ्ट कमेटी विसंगतियों से भरा हुआ है फिर भी इस बात इन्कार नहीं किया जा सकता कि अन्ना हजारे ने लोगों के मन में एक सकारात्मक उर्जा का संसार किया है।

अन्ना हजारे की के आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह ब्लडलेस है और यही वजह है कि लोग इसकी ओर आकर्षित भी हो रहे हैं। इस आंदोलन में शहरी युवाओं की उत्साहजनक  भागीदारी आंदोलन की चमक में इजाफा करता है। वर्तमान पीढ़ी हमेशा अपना बेहतर देती है, अन्ना हजारे को आंदोलन को अपना बेहतर देने के लिए यह पीढ़ी तैयार है, अब देखना ये है कि अपने मुकाम पर पहुंच पाती है या नहीं, क्योंकि अभी इस आंदोलन को कई कंटीली रास्ताओं से होकर गुजरना है।

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One Response to क्या वाकई में आजादी की यह दूसरी लड़ाई है ?

  1. चंदन says:

    देश आजाद हुआ ही नहीं है। कौन स्वतंत्र है कुछ हजार या लाख लोग ही तो। यहां आजादी की दूसरी लड़ाई फिर से लड़नी होगी लेकिन तरीका दूसरा अपनाना होगा। अन्ना ने भारी गलती कर दी है, ऐसा लगता है। पता नहीं अन्ना से यह गलती किसने करवायी। सदस्यों में चिदम्बरम जैसे लोग कपिल सिब्बल जैसे लोग हैं। वहीं वंशवाद भी दिख रहा है। अगर अन्ना अच्छे इंसान हैं तो उनको अहसास जरुर होगा कि उन्होंने कितनी बड़ी गलती की है।

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