शहीद भगत सिंह में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टीआरपी

 

चंदन कुमार मिश्र, पटना
23 मार्च 2011 को हमारे देश की संसद में यह तय किया जा रहा था कि कौन सा पक्ष ज्यादा दोषी है। मनमोहन सिंह सरकार और विपक्ष भाजपा में यह हल्ला था कि कौन बेदाग है। हमारी संसद के सारे लोग आरोप-प्रत्यारोप में जी-जान से लगे हुए थे। उन्हें याद ही नहीं आ सका कि आज 23 मार्च 2011 है यानि भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु के शहीद होने के अस्सी साल पूरे हो रहे हैं। अब कोई भी आदमी सोचें कि इनकी हरकतों को क्या कहा जाए? हमारा देश क्रिकेट, सिनेमा, चुनाव को कितने जोर-शोर से याद करता है! लेकिन 23 मार्च में न तो ग्लैमर है, न मार्केट वैल्यू, न कोई टी आर पी है फिर क्यों कोई याद रखे। अपनी क्षणिक खुशी के लिए क्रिकेट के पीछे साल के पचासों दिन खर्च करने वाले युवा, कभी सोचते ही नहीं कि वे चैन से खेल देख पाते हैं तो इसके पीछे भी कितनी बड़ी बात है। सवा अरब का शोर हर तरफ़ हो रहा है। मीडिया कमीनेपन की हद पार कर चुका है। भगतसिंह के अरबवें हिस्से में नहीं आने वाले इस देश के ऊपर शासन करते हैं। बीस पेज के अखबार में बीस लाइन में हर साल भगतसिंह को निपटा देने वाले मीडिया को क्या कहा जाए, आप खुद सोच लें। लेकिन यही मीडिया अखबार में साल में क्रिकेट के पीछे हजार पेज, सिनेमा के पीछे हजार पेज बहुत आसानी से खर्च करता है। और खुद को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता फिरता है। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र के चौकी की एक कील तक नहीं है।
यह वही देश है, यहां वही सरकार है जो आई सी सी के 42 करोड़ के टैक्स को माफ कर देती है। लेकिन क्या आप अगर आम आदमी हैं तो बैंक आपका 1 पैसा छोड़ता है। जिस क्रिकेट के एक-एक खिलाड़ी के पास इतनी हैसियत है कि वह अकेले बयालीस करोड़ दे सकता है उसको इतनी राहत देने के लिए भारत सरकार को बहुत बहुत बधाई! कोई इस भुलावे में न रहे कि अगर सरकार दूसरी होती तो यह नहीं करती। सरकारें जो भी हों उनके काम एक से हैं। जब तक विपक्ष में हैं चिल्ला रहे हैं, कल जैसे ही सरकार में जायेंगे इनका काम भी वही होगा। यह कोई नयी बात नहीं है, यह सब जानते है।
लेकिन सांसदों को उस दिन शेरो-शायरी का शौक चढ़ा था और उस दिन सुषमा स्वराज मनमोहन पर और मनमोहन सुषमा पर शेर दाग रहे थे। अपने गिरेहबान में झांकने के बजाय सब लोग एक-दूसरे की टांग-खींचने में लगे हुए थे। पता नहीं भारत के लोग कैसे-कैसे महानायकों को वोट दे देते हैं। इस बात पर शहीद फिल्म का एक गाना है उसका कुछ हिस्सा आपके सामने है, पढ़िए, अच्छा है कहकर अपनी ड्यूटी पूरी न करिए और डांस न करके जरा सोचिए।

जब शहीदों की अर्थी उठे धूम से
देशवालों तुम आँसू बहाना नहीं
पर मनाओ जब आज़ाद भारत का दिन
उस घड़ी तुम हमें भूल जाना नहीं

लेकिन ये भूल गए। अब आप खुद सोचे इन लोगों को क्या कहें? लेकिन इन सांसदों और विधायकों को, जो वे जिस पार्टी के हों, अपना वेतन, भत्ता सब कुछ लेने का समय हमेशा याद रहता है।

लौटकर आ सके ना जहां में तो क्या
याद बन के दिलों में तो आ जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी क़सम
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जायेंगे
ऐ वतन ऐ वतन

बात शुरु हुई थी 23 मार्च से तो इसी क्रम में आगे कुछ कहना चाहता हूं। भारत कुमार उर्फ़ मनोज कुमार की फिल्म शहीद 1965 में आई थी। उस फिल्म के कुछ हिस्सों को मैंने सुनकर लिखा है। इसमें भगतसिंह की कुछ बातचीत जिसे आज हम डायलाग कहते हैं, जो आज भी बहुत प्रासंगिक है, कुछ गानों की कड़ियां आदि चीजें मैं यहां दे रहा हूं। हो सकता है आप सबने शहीद देखी होगी लेकिन फिर से याद दिला रहा हूं। इन बातों को सुनने से नहीं लगता कि 1931 या 1965 की हैं, ये सारी आज भी वैसे ही महत्व रखती हैं। अंतर सिर्फ़ इतना है कि उस समय अंग्रेज थे, आज हिन्दुस्तानी अंग्रेज हैं।

एक

(भगतसिंह(मनोज कुमार) अकेले में गा रहे हैं। आवाज महेंद्र कपूर की है। कोई चीज नहीं बजायी जा रही है।)

मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

(शायद यह कड़ी प्रचलित गाने को सुनने पर नहीं मिलती है।)

बड़ा ही गहरा दाग है यारों जिसका गुलामी नाम है
बड़ा ही गहरा दाग है यारों जिसका गुलामी नाम है

उसका जीना भी क्या जीना जिसका देश गुलाम है
सीने में जो दिल था यारों
सीने में जो दिल था यारों
आज बना वो शोला

मेरा रंग दे बसंती चोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला

दो

(भगतसिंह को कैद कर के ले जाया जा रहा है। गाड़ी में बैठे भगतसिंह को सामने दूसरी गाड़ी में दुर्गा भाभी(निरुपा राय), सुखदेव( प्रेम चोपड़ा) और बच्चा दिखाई देता है। वहीं भगतसिंह के सीन पर रफ़ी साहब की आवाज में।)

कि रूख्सत करो हमको ऐ साथियो
पूरी करने हम अपनी कसम चल दिये
राखी बांधी थी बहना ने जिस हाथ में
पहनकर हथकड़ी उसमें चल दिये

(उसी वक्त छोटा बच्चा भगतसिंह को देखकर चिल्लाता है। फिर भगतसिंह यह कहते हैं। जहां तक मेरा खयाल है प्रचलित गाने में ये कड़ी सुनने को नहीं मिलती।)

हम न देखेंगे कल की बहारें तो क्या
तुमको तो वो बहारें दिखा जायेंगे।

ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम
तेरी राहों में जां तक लुटा जायेंगे।
फूल क्या चीज है तेरे कदमों पे हम
भेंट अपने सरों की चढ़ा जायेंगे।
ऐ वतन ऐ वतन

तीन

(भगतसिंह अदालत में बयान दे रहे हैं।)

भगतसिंह: हम इस बात से इनकार नहीं करते कि हमने एसेम्बली में बम फेंके। मगर वो बम किसी की जान लेने के लिए नहीं थे बल्कि लाखों, करोड़ों जानों की आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए थे। अगर गौर से देखा जाय तो दुनिया की बर्बादी की जड़ है एक इंसान का दूसरे इंसान पे हुकूमत करने का शौक। एक इंसान का ये शौक लाखों करोड़ों इंसानों की जिंदगियों को मौत से बदतर बना देता है। हम इस बारे में जितना सोचते हैं, हमारे इरादे अटल होते हैं कि इस हुकूमत को खतम होना चाहिए।

चार

( भगतसिंह पर कोड़े बरसाये गये हैं। भगतसिंह बेहोश होकर पड़ जाते हैं। जब होश आता है तब जेलर(मदन पुरी, अमरीश पुरी के बड़े भाई) आता है। भगतसिंह को ध्यान से
निहारता है।)

भगतसिंह( कराहते हुए) : क्या देख रहे हैं?

जेलर: वही जिसे न तुम महसूस करते हो, न देखते हो। अगर तुम आइने में अपनी सूरत देख लो तो तुम्हें अपने इरादों से, अपनी जिद्द से नफरत हो जाय। मैं कहता हूं तुम ये जिद्द छोड़ क्यों नहीं देते?

भगतसिंह: बहुत तरस आ रहा है आपको मेरी हालत पे।

जेलर: मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं। तुम सरकारी गवाह बन जाओ। मैं तुम्हें हर मुसीबत से बचा लूंगा। भगतसिंह, मुझे गलत मत समझो। यहां जो कुछ होता है सरकारी हुक्म से होता है। मैं मजबूर हूं।

भगतसिंह: आप हुक्म से मजबूर हैं। मैं दिल से मजबूर हूं।

जेलर: मैं तुम्हारे साथ बहस करने नहीं आया। सिर्फ़ इतना कहूंगा कि तुम्हारे साथी आज नहीं तो कल तुम्हारा साथ छोड़ देंगे। तुम अकेले रह जाओगे। और अकेले तुम हुकूमत से नहीं लड़ सकते।

भगतसिंह: अगर आपको मेरे अकेलेपन का इतना ही खयाल है तो आइए आप ही मेरे साथी बन जाइए। छोड़िए सरकारी वर्दी को। अपनी आत्मा से पूछकर देखिए। जवाब मिलेगा- ये पोशाक, ये घाव सरकारी वर्दी से कहीं अच्छे हैं।( भगतसिंह नंगे बदन हैं और घावों के निशान शरीर पर हैं।)

जेलर: समझाने की कोशिश की तो उल्टा सबक देना शुरु कर दिया। 35 करोड़ इंसानों में तुम्हीं एक तो दो-चार अकलमंद रह गये हो। बाकी सब बेवकूफ हैं। जिंदगी में जिन्हें कुछ न मिला वो सिर्फ़ नारे लगाते हैं। न इज्जत मिली न रुस्गार न मां बाप का प्यार न घर का सुख। बेकारी और बदहाली से तंग आकर तुमलोगों के लिए सिर्फ़ यही एक रास्ता था।

भगतसिंह(धीरे से): जेलर साहब!

जेलर(गुस्से से): क्या है?

भगतसिंह:(यह महेन्द्र कपूर की गायी हुई पंक्तियां हैं। ध्यान रहे यह अकेले सिर्फ़ उनकी आवाज में ही रिकार्ड किया गया था। कुछ भी नहीं बजाया जा रहा था।)

हम भी आराम उठा सकते थे घर पे रहकर
हमको भी पाला था मां-बाप ने दुख सह-सह कर
वक्त-ए-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कहकर
गोद में आंसू जो टपके कभी रुख से बहकर
तिफ़्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को
हमने जब वादी-ए-गुरबत में कदम रखा था
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को

मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

पांच

(कहर सिंह(प्राण) एक कैदी है। जेल में दूसरों को परेशान करने पर भगतसिंह उसे समझाना चाहते हैं।)

भगतसिंह: ये भी तो अपने भाई हैं। इनको क्यों परेशान करते हो?

कहर सिंह (चिल्ला कर): चुप! तू कौन होता है बीच में बोलने वाला? चार नारे लगाकर जेल में आ गया तो अपने आपको बड़ा बदमाश समझता है। बदमाश मेरे जैसे होते हैं। बीस तिजोरियां तोड़ी हैं मैंने, चार खून कित्ते ने।

छ:

(भगतसिंह भूख हड़ताल के लिए साथियों को समझा रहे हैं।)

भगतसिंह: मैं अब भी कहता हूं मत कीजिये भूख हड़ताल। इंसान के बड़े-बड़े इरादे भूख की आग में जलकर राख हो जाते हैं। एक बार इस आग में कूदने के बाद जलने के सिवा कोई रास्ता नहीं। मैं कहता हूं मान लीजिये मेरी बात। मत कीजिये ये भूख हड़ताल।

एक साथी: लेकिन भगतसिंह, तुमने ये भूख हड़ताल हम सब की खातिर की है। तो क्यों न हम सब मिलकर अपने हक के लिए लड़ें। नहीं, नहीं हम भी खाना नहीं खायेंगे।

(तभी जेलर का प्रवेश)

जेलर: क्या बात है? क्यों इनकार किया तुमने खाना खाने से?

भगतसिंह(हाथ में रोटी लेकर): जेलर साहब, ये क्या है?

जेलर( झल्ला कर): रोटी!

भगतसिंह: तो लीजिए खाइए।

जेलर: तुम मुझे ये रोटी खाने के लिए कह रहे हो?

भगतसिंह: जहां तक खाने का ताल्लुक है आपमें और हममें कोई फ़र्क नहीं। फिर आप ये रोटी क्यों नहीं खा सकते?

जेलर: भगतसिंह अपनी जबान पर काबू रखो। तुम भूल रहे हो तुम कहां हो, क्या कह रहे हो और किससे कह रहे हो?

भगतसिंह: बुरा मान गये! मैंने बात ही ऐसी कह दी जेलर साहब। लेकिन अगर ये रोटी जानवर के सामने रखी जाय तो वो भी खाने से इनकार कर दे।

जेलर: तुम जानवर की बात करते हो। (कहर सिंह को दिखाते हुए। कहर सिंह रोटी खा रहा है।) वो देखो! इंसान उसे खा रहा है।

भगतसिंह: यही तो आप लोगों का कमाल है जेलर साहब। यहां इंसान जानवर से भी बदतर बना दिया जाता है।

जेलर(चीखकर): भगतसिंह! हमारे नजदीक जानवर और मुजरिम में कोई फ़रक नहीं। ये जेल है। यहां बड़े-बड़े तीसमार खां अपनी चाल भूलकर चूहे बन जाते हैं। तुम और तुम्हारे साथियों की हस्ती ही क्या है?

भगतसिंह: आप की बहुत बड़ी हस्ती है। आप शाही नौकर हैं। एक हिन्दुस्तानी की, एक गुलाम की इससे बड़ी खुशनसीबी क्या होगी कि वो अंग्रेज के हुक्म को बजा लाना अपना फर्ज समझता हो। मैं और मेरे साथी बहुत मामूली हस्ती वाले हैं। लेकिन हमें जानवरों का खाना नहीं चाहिए।

सात

(रात के समय के जेल में कहर सिंह धनीराम(असित सेन) से पूछता है।)

कहर सिंह: ओ यारा उन इंकलाबियों ने आज भी खाना नहीं खाया।

धनीराम: ओहूं।

कहर सिंह: हद्द कर देतिए।

धनीराम: कहर सिंह प्यारे। एक दिन तू भी खाना मत खा।

कहर सिंह: ओय! मेरे अकेले के न खाने से क्या होता है?

धनीराम: उनका साथ थारा मुल्क दे रहा है। आजकल सभी घरों के चूल्हे ठंढे रहते हैं। जानता है चालीस दिन हो गये उन प्यारों को खाना खाये। चा…लीस दिन।

कहर सिंह: यार धनीराम, एक बात बता।

धनीराम: बोल।

कहर सिंह: ये पारत(भारत) माता क्या चीज है? ये इंकलाबी कहते हैं कि पारत(भारत) माता को आजाद कर के ही दम लेंगे। ओय मैं कह्ने कि अंग्रेजों ने उसको जहां कैद कर रखा है उस जेल पे हमला करके उसको छुड़वा लो।

अंत में

(और अब वो मशहूर गाना जिसे हम सब जानते हैं।)

ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है
दम निकले इस देश की खातिर बस इतना अरमान है

एक बार इस राह में मरना सौ जन्मों के समान है
देख के वीरों की कुर्बानी
देख के वीरों की कुर्बानी
अपना दिल भी बोला-
मेरा रंग दे बसंती चोला
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे
जिस चोले को पहन शिवाजी खेले अपनी जान पे
जिसे पहन झांसी की रानी मिट गयी अपनी आन पे
आज उसी को पहन के निकला
पहन के निकला
आज उसी को पहन के निकला
हम मस्तों का टोला

मेरा रंग दे बसंती चोला
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

ओ मेरा रंग दे बसंती चोला मेरा रंग दे
ओ मेरा रंग दे बसंती चोला
ओय रंग दे बसंती चोला
माय रंग दे बसंती चोला

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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