बिहार की गांवों में तारें तो हैं लेकिन बिजली नहीं

 

बिहार की सड़कें अब सुकून देती हैं, खासकर लंबी सड़के। एक छोड़ से दूसरे छोर तक सहजता से सफर कर सकते हैं। सड़कों पर गाड़ियों की रफ्तार लगातर बनी रहती है। हां सड़कों के किनारे बसे गांव आपकी रफ्तार को थोड़ा बाधित जरूर करते हैं। मुर्गी, गाय, भैंस, बकरियां और कुत्तों की चहलकदमी थोड़ा परेशान करने वाला होता है। एक मोटर साइकिल पर सवार चार-चार लड़के आपकी लांग ड्राइविंग को थोड़ा असहज कर सकते हैं। ताड़ी के नशे में लड़खड़ाते हुये लोग भी कभी-कभी स्पीड ब्रेकर का काम करते हैं। कहीं-कहीं पर तो बिजली के खंभों को सड़कों पर स्पीड ब्रेकर के तौर रख दिया गया है, जो गति में आ रही गाड़ियों अचानक उछाल देती है।

प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनने वाली सड़कों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। छोटी-छोटी सड़कें गांवों को जोड़ तो रही हैं लेकिन बनावट के लिहाज से काफी कमजोर है। इन सड़कों को देखकर कहा जा सकता है कि अभी ट्रैफिक के लिहाज से ग्रामीण जीवन स्मूथ नहीं है। लोग अपने जानवरों को इन्हीं सड़कों पर बांधकर छोड़ देते हैं। यदि गलती से आप इन सड़कों पर चलने के दौरान हार्न का इस्तेमाल करते हैं तो आपके साथ मारपीट की संभावना काफी बढ़ जाती है। हार्न की आवाज सुनकर सड़कों पर बंधे हुये जानवर भड़कते हैं और इसके साथ ही ग्रामीणों का गुस्सा भी भड़क उठता है। सड़कों को लेकर बिहार के लोग एक हद तक संतुष्ट है, लेकिन बिजली को लेकर लोगों में आक्रोश है।

बिहार के दूर-दराज के गावों में बिजली की तारें तो पहुंच चुकी हैं, लेकिन बिजली नहीं। लोगों की महत्वकांक्षा बढ़ी हुई है, जल्द से जल्द आधारभूत समस्याओं को पाना चाह रहे हैं और इसमें हो रही देरी से थोड़े हिंसक भी हो उठे हैं। कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि नीतीश कुमार यदि जाएंगे तो बिजली के कारण ही जाएंगे क्योंकि बिहार के लोगों की महत्वकांक्षाओं को पूरा करने की करने की क्षमता अभी बिहार सरकार के पास नहीं है और लोग ज्यादा दिनों तक चुप बैठने वाले भी नहीं है।

ग्रामीणों की नजर में बिहार पुलिस के रवैये में भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। पुलिस का लूटखसोट जारी है। वैसे सुशासन का हल्ला करने वालों की टीम गांवों में भी सक्रिय है, लेकिन आम ग्रामीण यही कहते हैं कि कुछ खास बदलाव नहीं हुआ है, बस बदलाव का अहसास कराने की कोशिश की जा रही है।

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