बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-3)

प्रस्तुतकर्ता : चंदन कुमार मिश्र

इन विदेशी कम्पनियों ने देश में कम्पन पैदा कर दिया है। पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों के अस्वस्थ बनाने, रोजगार छीन लेने, भारत को कमजोर बनाने, पूरे देश को जकड़ कर जोंक की तरह पकड़ कर रखने में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने कोई प्रयास नहीं छोड़ रखा है। इसी विषय पर आइए एक शानदार किताब पढ़ते हैं जो कुछ कड़ियों में आपके सामने प्रस्तुत की जायेगी जिसका नाम है- ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल’। इसके लेखक हैं राजीव दीक्षित। इस किताब में निम्न अध्यायों को पढ़ेंगे। यह किताब कुछ वर्षों पुरानी है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भारत में प्रवेश

भारत में विदेशी कम्पनियाँ तीन तरीके से कम कर रही है। पहला, सीधे अपनी शाखायें स्थापित करके, दूसरा अपनी सहायक कम्पनियों के माध्यम से, तीसरा देश की अन्य कम्पनियों के साथ साझेदार कम्पनी के रूप में।

जून 1995 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार 3500 से कुछ अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ, अपनी शाखाओं या सहायक कम्पनियों के रूप में देश में घुसकर व्यापार कर रही हैं। 20,000 से अधिक विदेशी समझौते देश में चल रहे हैं। औसतन 1000 से अधिक नये विदेशी समझौते प्रतिवर्ष देश में होते हैं।

सन् 1972 के अन्त तक देश में कुल 740 विदेशी कम्पनियाँ थीं। जिनमें से 538 अपनी शाखायें खोलकर व 202 अपनी सहायक कम्पनियों के रूप में काम कर रही थीं। इनमें सबसे अधिक कम्पनियाँ ब्रिटेन की थीं। लेकिन आज सबसे अधिक कम्पनियाँ अमेरिका की हैं। समझौते के अन्तर्गत काम करने वाली सबसे अधिक कम्पनियाँ जर्मनी की हैं। 1977 में विदेशी कम्पनियों की संख्या 1136 हो गयी।

आजादी के पूर्व सन् 1940 में 55 विदेशी कम्पनियाँ देश में सीधे कार्यरत थीं। आजादी के बाद सन् 1952 में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ब्रिटेन की 8 विशालकाय कम्पनियों के सीधे नियन्त्रण में 701 कम्पनियाँ भारत में व्यापार कर रही थीं। ब्रिटेन की अन्य 32 कम्पनियाँ, भारतीय कम्पनियों के साथ किये गये समझौतों के तहत कार्यरत थीं। ये 8 विशालकाय ब्रिटिश कम्पनियाँ सन् 1853 से ही भारत में घुसना शुरू हो गयी थीं। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा सोची समझी रणनीति के तहत लायी गयी ये कम्पनियाँ सन् 1860 तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी के भारतीय उपमहाद्वीप के शोषण के लिये धारदार हथियार बन चुकी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में स्थापित हो जाने के बाद ये कम्पनियाँ दुनिया के अन्य दूसरे देशों में शोषण करने चली गयीं।

ये 8 ब्रिटिश कम्पनियाँ निम्न थीं:-

1.            एन्ड्रयूल एण्ड कम्पनी

2.            मेक्लाइड एण्ड कम्पनी

3.            मार्टिन एण्ड कम्पनी

4.            बर्न एण्ड कम्पनी

5.            डंकन ब्रदर्स एण्ड कम्पनी

6.            आक्टेवियस स्टील एण्ड कम्पनी

7.            गिलैण्डर अर्बुदनाट एण्ड कम्पनी

8.            शा वालेस एण्ड कम्पनी

भारत में जैसे-जैसे विदेशी पूँजी का निवेश बढ़ता गया वैसे-वैसे विदेशी कम्पनियों की संख्या बढ़ती गयी। इसके साथ जुड़ा हुआ एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि जिन विदेशी कम्पनियों ने भारत में पूँजी निवेश किया उनमें से अधिकांश कम्पनियों ने अपने निवेश करने के अगले वर्षों में ही अपनी निवेश की हुयी पूँजी के बराबर या उससे अधिक पूँजी कमा ली। बाकी अन्य कम्पनियों ने अधिकतम 5 वर्षों में अपनी निवेश की हुई पूँजी को कमा लिया।

हर क्षेत्र में घुसी हैं बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

आज देश का छोटा-बड़ा प्रत्येक क्षेत्र इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का गुलाम है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में आने वाली कोई भी चीज ऐसी नहीं हैं, जिसे ये कम्पनियाँ न बनाती हों। दैनिक उपयोग के सामानों का उत्पादन करके ये विदेशी कम्पनियाँ घर-घर में घुसी हुयी हैं। खेती के काम में आने वाले जहरीले कीटनाशकों, खादों अन्य उपकरणों का उत्पादन करके इन विदेशी कम्पनियों ने हमारी आत्मनिर्भर खेती को अपना गुलाम बना लिया है। उद्योगों के क्षेत्र में रद्दी तकनीकी का इस्तेमाल करके वातावरण को विषैला कर दिया है। हवा, पानी और मिट्टी भी अब प्रदूषण से मुक्त नहीं हैं।

नीचे उन क्षेत्रों की सूची दी गयी है जिनमें घुसकर इन विदेशी कम्पनियों में हमारी आर्थिक व्यवस्था को पंगु बना दिया है-

कुछ प्रमुख उत्पादन के क्षेत्र, जिनमें विदेशी कम्पनियाँ घुसी हुई हैं।

1.            दैनिक उपभोग की सामग्री के क्षेत्र में

2.            दवा उद्योग के क्षेत्र में

3.            खाद, कीटनाशक, दवायें व खेती उपकरणों के क्षेत्र में

4.            रासायनिक पदार्थों के उत्पादन में

5.            मोटर-गाड़ियों के उपकरणों के उत्पादन के क्षेत्र में

6.            भारी इंजीनियरिंग सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में

7.            इलेक्ट्रानिकी व इलैक्ट्रीकल सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में

8.            सैनिक रक्षा सामग्री के क्षेत्र में

9.            फूड प्रोसेसिंग व प्लांटेशन (चाय, कॉफी, डिब्बाबन्द खाद्य पदार्थ, चॉकलेट)

10.          वैज्ञानिक रक्षा अनुसंधान में

11.          सीमेन्ट उद्योग में

12.          तेल शोधन व उत्पादन के क्षेत्र में

13.          धातुओं के खनन तथा निष्कर्षण क्षेत्र में

14.          जूट उद्योग में

15.          सिले हुये (रेडीमेड) कपड़ों के उत्पादन क्षेत्र में

16.          जूते व अन्य खेल सामानों के उत्पादन क्षेत्र में

17.          रबर इन्डस्ट्रीज के क्षेत्र में

18.          बच्चों के खिलौने व अन्य प्लास्टिक सामानों के उत्पादन में

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ताकत

भारत में इन विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की कितनी ताकत है ? इनकी ताकत का एक अंदाज इसी बात से लागया जा सकता है कि दुनिया की सबसे बड़ी विशालकाय 100 बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ चुनी गयीं हैं। जिनके बारे में ’फारचून’ पत्रिका के 31 जुलाई 1989 के अंक में एक टिप्पणी छपी थी:-

“पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था पर चुनी गयी 100 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का कब्जा है। जितनी तरह परिसम्पत्ति इन 100 कम्पनियों के पास हैं, उसमें जरा सी भी हेर-फेर कर देने पर पूरे विश्व की अथव्यवस्था चरमरा सकती है।” इन सभी कम्पनियों की शाखायें दुनिया के 125 से भी अधिक देशों में है। 31 जुलाई 1995 तक इन 100 कम्पनियों में से 50 कम्पनियाँ भारत में काम कर रही हैं। इन 50 कम्पनियों में से प्रत्येक का वार्षिक कारोबार भारत सरकार के वार्षिक बजट से अधिक है।

वर्ष 1994 में इन कम्पनियों की विश्व भर में बिक्री तथा भारत में ये कम्पनियाँ किस रूप में कार्य कर रहीं हैं; इसका विवरण नीचे दी गयी तालिका में दिखाया गया है:-

विदेशी/बहुराष्ट्रीय कम्पनी वर्ष 1994 की बिक्री भारत में कार्यरत रूप

जनरल मोटर्स                                                        4936.032 अब्ज रुपये                         शाखा

फोर्ड मोटर्स                                                             4110.048 अब्ज रुपये                         शाखा

एक्सॉन                                                                   3246.688 अब्ज रुपये                         शाखा

वॉल मार्ट                                                                2669.184 अब्ज रुपये                         शाखा

ए.टी. एण्ड. टी.                            2403.008 अब्ज रुपये            शाखा

जनरल इलेक्ट्रिक क.                   2063.984 अब्ज रुपये           शाखा

आई. बी. एम                        2049.664 अब्ज रुपये           शाखा

मोबिल                             1907.872 अब्ज रुपये           शाखा

सीयर्स                              1745.888 अब्ज रुपये           संयुक्त उद्यम में

क्राइसलर                            1671.168 अब्ज रुपये           संयुक्त उद्यम में

विदेशी/बहुराष्ट्रीय कम्पनी वर्ष 1994 की बिक्री भारत में कार्यरत रूप

स्टेट फॉर्म                           1234.200 अब्ज रुपये           ——–

पू्रडेन्शियल कंपनी                    1163.072 अब्ज रुपये           सहयोगी कम्पनी

ई. आई. द्यूपौं                        1118.976 अब्ज रुपये           संयुक्त उद्यम/

मार्ट                               1098.016 अब्ज रुपये           ——–

सीटीकॉर्प                     1012.800 अब्ज रुपये           शाखा

शेवरॉन                      994.048 अब्ज रुपये            सहयोगी कंपनी

प्रॉक्टर एंड गँबल                      969 अब्ज रुपये        शाखा

पेप्सीको                             911 अब्ज रुपये        शाखा/संयु उद्योग

ऑमको                      862 अब्ज रुपये        सहयोगी कंपनी

हेलवट पॅकार्ड                         799 अब्ज रुपये        शाखा/सह. कंपनी

आय. टी. टी.                        760 अब्ज रुपये        शाखा/सह. कंपनी

कोनाग्रा                      752 अब्ज रुपये        सहयोगी कंपनी

क्रोजर                              734 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

अमेरिकन इंटरनॅशनर ग्रुप        716 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

मोटोरीला                     711 अब्ज रुपये        शाखा/संयु. उद्योग

मेट्रोपॉलीटन लाईफ इन्शूरन्स कंपनी 712 अब्ज रुपये        शाखा/संयुक्त उद्योग

फिलीप मॉरिस                        1720 अब्ज रुपये       शाखा

टेक्साको                     1080 अब्ज रुपये       सहयोगी कंपनी

बोइंग कॉरपोरेशन                      701 अब्ज रुपये        शाखा/संयु उद्योग

डायटन-हडसन                 681 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

युनायटेड टेक्नॉलॉजी                   626 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

जे. सी. पेनी                         674 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

डाऊ केमीकल्स                       640 अब्ज रुपये        शाखा/संयु उद्योग

जी. टी. ई. स्टेमफोर्ड्र                   638 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

युनायटेड पार्सल सर्विस          626 अब्ज रुपये        शाखा

फेडरेशन नॅशनल मॉरगेज

असोसिएशन ट्रॅव्हलर्स                  590 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

सिग्न                              588 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

अमेरिकन स्टोअर्स                     587 अब्ज रुपये        शाखा

विदेशी/बहुराष्ट्रीय कम्पनी वर्ष 1994 की बिक्री भारत में कार्यरत रूप

मेरिल लिन्ब                         583 अब्ज रुपये        शाखा

जेरॉक्स                      570 अब्ज रुपये        शाखा

अटना लाईफ इन्शुरन्स कंपनी            560 अब्ज रुपये        —–

ईस्टमॅन कोडक                539 अब्ज रुपये        शाखा

बेलसाउथ                            539 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

यू.एस. एक्स.                        537 अब्ज रुपये        शाखा/संयुक्त उद्योग

बँक ऑफ अमेरिका                    528 अब्ज रुपये        शाखा

प्राइस-कॉस्टको                 527 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

कोका-कोला                          517 अब्ज रुपये        शाखा/संयु उद्योग

ए. एम.आर.                         516 अब्ज रुपये        संयुक्त उद्योग

सुपर व्हॅल्यू                          509 अब्ज रुपये        शाखा

विदेशी पूँजी का धोखा

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जब भी दुनिया के किसी देश में व्यापार करने के लिये जाती हैं तो वे उस देश के लिये भारी सिर दर्द बन जाती हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के किसी भी देश में काम करने से ऐसा नहीं है कि मात्र आर्थिक दुष्प्रभाव ही पड़ते हों अपितु उस देश में इन कम्पनियों के व्यापक और गहरे प्रभाव नजर आते हैं। क्योंकि इन कम्पनियों का चरित्र ही ऐसा है कि ये देश की नीतियाँ बदलवाने के लिये सीधे राजनैतिक हस्तक्षेप करती है। सामाजिक जीवन भी इन कम्पनियों के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है।

जब ये कम्पनियाँ काम करने के लिये अन्य देशों में जाती हैं तो उनके पीछे कुछ मिथ्या धारणायें काम करती हैं जैसे ये अपने साथ पूँजी लायेंगी, आधुनिक तकनीक देंगी, लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया करायेंगी, देश का निर्यात बढ़ायेंगी, देश के भुगतान सन्तुलन की स्थिति को चुस्त-दुरूस्त रखेंगी, देश की आर्थिक संसाधनों में और अधिक वृद्धि करेंगी आदि-आदि। लेकिन असलियत ठीक इन सभी दावों से उल्टी होती है।

विदेशी कम्पनियों के पक्ष में सबसे बड़ी दलील दी जाती है कि भारत जैसे गरीब और पिछड़े देश में पूँजी की बड़ी कमी होती है और पूँजी के अभाव में विकास नहीं हो सकता। इसलिये विदेशों से पूँजी आमन्त्रित करके इस कमी को पूरा किया जा सकता है और पिछडे़पन के दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता है।

लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। ये विदेशी कम्पनियाँ बाहर से बहुत कम पूँजी लाती है, अधिकांश पूँजी यहां के बैंकों से कर्ज लेकर, यहाँ की जनता से कर्ज लेकर और उनको शेयर बेचकर एकत्रित करती हैं। देश में जितनी भी विदेशी कम्पनियाँ कार्य कर रही हैं, वे औसतन 5 प्रतिशत तक पूँजी ही बाहर से लाती है। बाकी 90 प्रतिशत से लेकर 95 प्रतिशत तक पूँजी ये भारतीय स्रोतों से ही एकत्रित करती हैं।

कितनी पूँजी, कितना धोखा

भारत में व्यापार कर रही 45 प्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने जब व्यापार शुरू किया तो कितनी पूँजी लगायी थी, इसके बारे में कुछ तथ्य नीचे दिये जा रहे हैं:-

बहुराष्ट्रीय कम्पनी                 आने का वर्ष               लायी गयी पूँजी

शालीमार पेन्टस लि.                   1901                       63 लाख रुपये

बी.एस.टी. इंन्डस्ट्रीज लि.                     1930                         1.85 कोटी रुपये

बाटा इण्डिया लि.                           1931                         70 लाख रुपये

हिन्दुस्थान लीवर लि.                  1933                       24 लाख रुपये

बहुराष्ट्रीय कम्पनी                 आने का वर्ष               लायी गयी पूँजी

युनियन कार्बाईड इण्डिया लि.                   1934                 8.36 कोटी रुपये

क्रॉम्प्टन ग्रीव्स लि.                          1937                 3 कोटी रुपये

न्यू इन्डीया इंडस्ट्रीज लि.               1942                 27 लाख रुपये

बूट्स कंपनी इंडिया लि.                1943                 1.10 कोटी रुपये

जॉफ्रीमॅन कंपनी लि.                          1943                 5 लाख रुपये

क्लोराइड इंडिया लि.                          1946                 2.11 कोटी रुपये

ब्यूको वुल्फ इंडिया लि.                 1947                 39 लाख रुपये

बेकेलाईट हायलम लि.                        1947                 1 कोटी रुपये

हिन्दुस्थान सीबा गायगी लि.                    1947                 4.57 कोटी रुपये

सायनामिड इंडिया लि.                        1947                 1.39 कोटी रुपये

कोटस् इंडिया लि.                     1947                 38 लाख रुपये

जर्मन रेमेंडीज लि.                           1949                 64 लाख रुपये

मोटर इंडस्ट्रीज कंपनी लि.              1951                 3.35 कोटी रुपये

ओटीस वलीवेटर कंपनी लि                     1953                 72 लाख रुपये

कार्बोरेंडम युनीव्हर्सल लि.               1954                 1.06 कोटी रुपये

फेनर इंडिया लि.                      1955                 64 लाख रुपये

हेक्स्ट इंडिया लि.                     1956                 2.72 कोटी रुपये

केबल कार्पोरेशन इडिया                 1956                 3.40 कोटी रुपये

इंग्लिश इलेक्ट्रीक कंपनी                1956                 2.25 कोटी रुपये

सीमेन्स इंडिया लि.                           1956                 2.40 कोटी रुपये

पॉलीकेम लीमिटेड                     1956                 56 लाख रुपये

डॉ. बँक अँन्ड कंपनी लि                1956                 16 लाख रुपये

जॉन्सन अँन्ड जॉन्सन लि.              1957                 24 लाख रुपये

कलर केम लि.                              1957                 1.25 कोटी रुपये

बायर इंडिया लि.                      1957                 3.59 कोटी रुपये

फूड स्पेशॅलिस्ट लि.                          1958                 4.51 कोटी रुपये

डेव्हीर्चड ब्राउन ग्रिव्हज लि.              1959                 36 लाख रुपये

अटलास कापको इंडिया लि              1959                 1.33 कोटी रुपये

के. एस. बी. पंप्स लि.                 1959                 86 लाख रुपये

मॅथर अँड प्लँट लि.                          1959                 1.83 कोटी रुपये

बहुराष्ट्रीय कम्पनी                 आने का वर्ष               लायी गयी पूँजी

फिलिप्स कार्बन ब्लॅक लि.              1959                 1.57 कोटी रुपये

सँडविक एशिया लि.                          1960                 1.17 कोटी रुपये

ऑडको इंडिया लि.                           1961                 12 लाख रुपये

किर्लोस्कर कमिन्स लि.                 1961                 50 लाख रुपये

आय. डी. एल. केमीकल्स लि.           1961                 1.07 कोटी रुपये

गेस्ट कीन विलियम्स लि.              1962                 7.69 कोटी रुपये

सुन्दरम क्लोटन लि.                         1962                 1.96 कोटी रुपये

रिचर्डसन हिंदुस्थान लि.                1964                 1.17 कोटी रुपये

नीडल रोलर बेअरिंग कंपनी              1965                 10 लाख रुपये

विडिया इंडिया लि.                           1965                 45 लाख रुपये

सेन्चूरी एन्का लि                     1965                 2.97 कोटी रुपये

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा पूँजी निवेश मात्र एक धोखा है। हिन्दुस्तान लीवर, कालगेट, सीबागाइगी जैसी सैकड़ों विदेशी कम्पनियों ने मात्र कुछ लाख रूपये से भारत में व्यापार शुरू किया। लाभ कमा-कमा कर बोनस शेयर के रूप में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपनी शेयर पूँजी कराड़ों रूपये में कर ली। अब ये कम्पनियाँ रॉयल्टी, शुद्ध लाभ और टेक्नीकल फीस के रूप में अरबों रूपये भारत से बाहर ले जा रही हैं। इस बात की गंभीरता का अहसास इसी से हो जाता है कि 1976.77 में जहाँ भारत में कार्यरत विदेशी कम्पनियाँ 121.54 करोड़ रूपये देश से बाहर ले गयीं, वहीं 1986-87 में यह राशि बढ़कर 494.6 करोड़ रूपये हो गयी। पिछले 11 वर्षों में ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ वैधानिक रूप से 3244.15 करोड़ रूपये भारत से बाहर ले जा चुकी हैं, जबकि अवैधानिक तरीके से ये कम्पनियाँ इससे कई गुनी अधिक राशि देश से बाहर ले जा चुकी हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की भारत में शेयर पूँजी लगभग 675 करोड़ रूपये मात्र है। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ देश के खून-पसीने की कमाई विदेशी मुद्रा का निर्यात अपने मूल देशों को कर रही हैं। इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने पूँजी के नाम पर कैसा मकड़जाल इस देश पर फैलाया है, इसका अनुमान दो-तीन उदाहरणों से लगाया जा सकता है।

हिन्दुस्तान लीवर ने भारत में सन् 1933 में जब व्यापार शुरू किया तब इसकी मूल कम्पनी यूनीलीवर ने मात्र 24 लाख रूपये लगाये। 1933 में प्रारम्भ हुयी इस कम्पनी ने ऐसा जाल बिछाया कि 1990 में इसकी मूल कम्पनी यूनीलीवर की शेयर पूँजी 47.59 करोड़ रूपये हो गयी। इसमें से 44.51 करोड़ रूपये की शेयर पूँजी बोनस के रूप में जुड़ी। 1975 से 1990 तक के बीच हिन्दुस्तान लीवर ने 80.18 करोड़ रूपये लाभांश के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। यह रकम रायल्टी और तकनीकी शुल्क के अतिरिक्त है।

इसी तरह कालगेट-पामोलिव कम्पनी ने सन् 1937 में मात्र 1.5 लाख रूपये से अपना कारोबार शुरू किया। 1989 के आते-आते अमरीकी कम्पनी कालगेट-पामोलिव की शेयर पूँजी बढ़कर 12.57 करोड़ रूपये हो गयी। इसमें 12.56 करोड़ रूपये की पूँजी बोनस शेयर के रूप में जुड़ी। कालगेट-पामोलिव कम्पनी 1977 से 1989 के बीच में 18.42 करोड रूपये लाभांश के रूप में भारत से अमरीका ले गयी।

स्विस कम्पनी सीबा गाइगी ने 1947 में 48.75 लाख रूपये से कारोबार शुरू किया। 1991 में इस कम्पनी की शेयर पूँजी बढ़कर 13.54 करोड़ रूपये हो गयी। इलैक्ट्रानिक उद्योग में लगी फिलिप्स कम्पनी ने 1956 में सिर्फ 10 लाख रूपये में अपना कारोबार शुरू किया, सन् 1974 में इस कम्पनी ने 10 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में भारत से होलैण्ड भेज दिया। रिजर्व बैंक की 1992 की रिपोर्ट के अनुसार 1987-88 में 326 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की शेयर पूँजी 1445.23 करोड़ रूपये थी, इनमें 60 प्रतिशत हिस्सा भारतीय लोगों का हुआ था, 610 करोड़ रूपये बैंकों के थे और 50 करोड़ सरकार के थे।

सामान्यतः बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ जितनी पूँजी लेकर आती है, उससे कई गुना अधिक पूँजी तो वे एक ही वर्ष में देश के बाहर भेज देतीहैं। उदाहरण के लिये गुडईयर कम्पनी ने भारत में 1 करोड़ रूपये पूँजी का निवेश किया। यह पूँजी निवेश इस कम्पनी ने भारत में अपना कारोबार शुरू करने पर किया था। लेकिन 1989 में गहुडईयर ने 7.33 करोड़ रूपया भारत से बाहर मुनाफे के रूप में भेज दिया। अर्थात् एक ही वर्ष में पूँजी निवेश का सात गुना देश से बाहर भेज दिया। इसी तरह बायर इंडिया का भारत में आरम्भिक पूँजी निवेश 8.29 करोड़ रूपये था, लेकिन 1989-90 में ही इस कम्पनी ने 13.3 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में भारत से बाहर भेज दिये। ग्लैक्सो इंडिया की भारत में चुकता पूँजी 2.88 करोड़ रूपये की है, लेकिन इस कम्पनी ने 1989-90 में 3.93 करोड़ रूपये मुनाफे के रूप में देश से बाहर भेज दिये। अमरीकी कम्पनी फाइजर ने, भारत में जब अपना कारोबार शुरू किया तो मात्र 5 लाख रूपये लगाये और कारोबार शुरू होने के पहले ही वर्ष में फाइजर ने 4.83 करोड़ रूपये भारत से अमरीका भेज दिया। इसी तरह अमरीकी कम्पनी एबट लेबोरेटरीज ने मात्र 1 लाख रूपये की पूँजी से कारोबार शुरू करके, अगले ही वर्ष में 23 लाख रूपये भारत से अमरीका भेज दिया। ग्रेशम एण्ड कविन कम्पनी अपनी चुकता पूँजी का 7.65 गुना मुनाफा हर साल विदेश ले जाती है। सिगरेट बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनी आई.टी.सी. अपनी कुल चुकता पूँजी पर लगभग 11364 प्रतिशत मुनाफा कमा रही है। लगभग सभी अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपनी चुकता पूँजी का 860 प्रतिशत मुनाफा भारत से कमा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ मुनाफे, लाभांश, रॉयल्टी और तकनीकी फीस के रूप में कितना धन देश से बाहर ले जा रही है, इसकी जानकारी के लिये नीचे तालिका दी गयी है:-

कितना लूट कर ले जा रही हैं, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ

वर्ष    मुनाफे के रूप में लाभांश के रूप में रायल्टी के रूप में तकनीकी फीस के रूप में

(करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)          (करोड़ रू.)

1965-66        13.50         19.40                2.95                 6.98

1966-67        14.47         28.77                5.13                  10.43

1967-68        15.95         32.70                4.32                  14.68

1968-69        12.96         30.25                 4.78                  17.97

1969-70        12.72         31.14                5.80                  13.05

1970-71        13.12         43.48                5.23                  20.63

1971-72       09.94         38.87                5.86                 13.90

1972-73        15.54         39.08                7.33                 11.33

1973-74        21.91         37.51                 6.21                 14.08

1974-75        07.19         18.46                 8.46                 12.56

1975-76       20.36         24.84                10.49                 25.66

1976-77        19.39         48.47                 15.88                37.88

1977-78        10.13         68.01                19.50                28.14

1978-79        10.24         54.35                 12.65                55.52

1979-80       14.37         50.92                9.53                 43.97

1980-81        12.10         55.92                8.88                104.93

1981-82       12.16         58.92                15.99                270.70

1982-83        19.12         70.31                 39.72                258.58

1983-84        20.00         62.11                27.60                 314.89

1984-85       16.68         74.58                28.49                300.90

1985-86       11.80         75.20                23.50                367.90

1986-87        10.60         85.50                40.10                358.40

स्रोत: रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया रिपोर्ट 1989

सन् 1978 में भारत में कुल विदेशी पूँजी का निवेश 1800 करोड़ रूपये था जो भारत में कुल पूँजी निवेश (नीजि तथा सरकारी क्षेत्रों में) का मात्र 8 प्रतिशत था। जबकि दूसरी ओर इसी वर्ष दो के 1929 करोड़ रूपये बाहर चला गया इन कम्पनियों के लाभ, रायल्टी, तकनीकी फीस, इत्यादी के रूप में।

नीचे दी गयी तालिका सन् 1981 में देश में विदेशी पूँजी निवेश तथा साथ ही साथ उसी वर्ष में देश से बाहर जाने वाली पूँजी का आंकड़ा दिया गया है:-

वर्ष विदेशी पूँजी निवेश भारत से बाहर गया धन

1981                                                       108 करोड़ रूपये                   114 करोड़ रूपये

1982                                                       628 करोड़ रूपये                   641 करोड़ रूपये

1983                                                       618 करोड़ रूपये                   590 करोड़ रूपये

1984                                                       1130 करोड़ रूपये                 1169 करोड़ रूपये

1985                                                       1260 करोड़ रूपये                 1181 करोड़ रूपये

1986                                                       1066 करोड़ रूपये                 1265 करोड़ रूपये

1987                                                       1077 करोड़ रूपये                 1193 करोड़ रूपये

1988                                                       2397 करोड़ रूपये                 2542 करोड़ रूपये

1989                                                       3166 करोड़ रूपये                 5235 करोड़ रूपये

1991 से 1995 तक                              25,479 करोड़ रूपये                             34240 करोड़ रूपये

ऊपर दिये गये आंकड़ो से एकदम स्पष्ट है कि वर्ष 1983 व 1985 को छोड़कर शेष वर्षों में देश को घाटा ही रहा है। जितना पूँजी निवेश हुआ, उससे कहीं अधिक धन देश से बाहर चला गया। अतः स्पष्ट है कि विदेशी पूँजी निवेश का सौदा देश के लिये घाटे का सौदा रहा।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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