बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल( भाग-4)

प्रस्तुतकर्ता : चंदन कुमार मिश्र

 इन विदेशी कम्पनियों ने देश में कम्पन पैदा कर दिया है। पूरे देश में लाखों-करोड़ों लोगों के अस्वस्थ बनाने, रोजगार छीन लेने, भारत को कमजोर बनाने, पूरे देश को जकड़ कर जोंक की तरह पकड़ कर रखने में इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने कोई प्रयास नहीं छोड़ रखा है। इसी विषय पर आइए एक शानदार किताब पढ़ते हैं जो कुछ कड़ियों में आपके सामने प्रस्तुत की जायेगी जिसका नाम है- ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मकड़जाल’। इसके लेखक हैं राजीव दीक्षित। इस किताब में निम्न अध्यायों को पढ़ेंगे। यह किताब कुछ वर्षों पुरानी है।

 भुगतान सन्तुलन और निर्यात का भ्रम

 विदेशी कम्पनियों को देश में बुलाने के पीछे एक ताकतवर तर्क होता है कि भारतीय उत्पाद अपनी घटिया गुणवत्ता के कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में टिक नहीं पाता, अतः आधुनिक तकनीक से बेहतर उत्पादन करने से निर्यात में तेजी आयेगी और देश में भुगतान सन्तुलन की स्थिति अच्छी रहेगी अर्थात् निर्यात को बढ़ावा देने के लिये विदेशी कम्पनियों की आवश्यकता होती है। लेकिन इस तर्क का खोखलापन नीचे दी हुयी तालिका प्रदर्शित कर देती है:-

 वर्ष                               विश्व निर्यात में भारत का  हिस्सा

1938                                        4.5 %

1950                                        2.2 %

1955                                        1.5 %

1960                                        1.2 %

1965                                        1.00 %

1970                                        0.7 %

1975                                        0.5 %

1980                                        0.1 %

1990                                        0.05 %

1991                                        0.045 %

1992                                        0.042 %

1993                                        0.04 %

1994                                        0.38 %

 देश के निर्यात की घटती हुयी दर से अनुमान लगाया गया है कि सन् 1995 के समाप्त होने तक विश्व निर्यात में भारत का हिस्सा मात्र 0.03 % रह जायेगा।

निर्यात में लगातार घाटे से, देश एक भयंकर आर्थिक संकट से गुजर रहा है जो आतंकवाद से भी अधिक भयावह है क्योंकि इससे देश में राजनीतिक एवं आर्थिक अस्थिरता तथा अराजकता का खतरा पैदा हो गया है। यह संकट विदेशी मुद्रा की तंगी अर्थात् भुगतान संतुलन (निर्यात में कमी तथा आयात में बढ़ोत्तरी) की प्रतिकूलता से उत्पन्न हुआ है। देश के धुरंर अर्थशास्त्री एवं योजना शास्त्री पिछले कुछ वर्षों से एक ऐसी रणनीति को खेजने में लगे हुये हैं जिससे इसका सामना किया जा सके।

भुगतान संतुलन का संकट भारत के लिये कोई नयी बात नहीं है। पिछले लगभग 45 वर्षों के विकास काल में भारत को कई बार इस स्थिति का सामना करना पड़ा है। यह संकट सर्वप्रथम 1957 में पैदा हुआ था, जब भारत को अपने व्यापक औद्योगिकीकरण के लिये निर्यात से अधिक आयात करना पड़ा था।

सन् 1966 में ऐसी संकटपूर्ण स्थिति पुनः उत्पन्न हुयी तो संकट पर काबू पाने के लिये तथा निर्यात बढ़ाने के बाहरी दबाव के चलते भारत ने अपनी मुद्रा का 57.5 % अवमूल्यन कर दिया। बाद में 1970 के आरम्भ होने वाले दशक में पेट्रोलियम की कीमतों में भारी वृद्धि के कारण भारत संकट में फंस गया। किसी तरह खाड़ी के देशों से प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी गयी धनराशि से भारत इस संकट से बच गया।

परन्तु 1985 के बाद से स्थिति एकदम बदल गयी है। भारी व्यापार घाटों तथा विदेशी कर्जो ने देश की कमर तोड़ दी है। विदेशी मुद्रा का खजाना खाली हो गया है।

विदेशी कम्पनियों को लगातार व्यापारिक घाटों को पूरा करने के लिये बुलाया जा रहा है लेकिन व्यापार घाटे लगातार बढ़ रहे है। 1983-84 में 5,871 करोड़ रूपये का घाटा हुआ, जो 1985-86 में बढ़कर 9,586 करोड़ रूप्ये तक पहुँच गया। 1985-86 से 1987-88 तक औसतन व्यापार घाटा 9,412 करोड़ रूपये रहा। 1995 के अन्त तक व्यापार घाटा 7,500 करोड़ रूपये तक पहुँच जायेगा।

इस घाटे का मूल कारण देश में अपनायी जाने वाली उदारीकरण की नीति है। तकनीकी को उन्नत बनाने के इरादे से अधिक से अधिक

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को न्यौता दिया जा रहा है। कम्पनियों की संख्या देश में बढ़ रही है। और उसी अनुपात में आयात बढ़ रहा है जबकि निर्यात में लगातार कमी आ रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने निर्यात के लक्ष्य को पूरा कर पाने में असफल सिद्ध हो रही हैं। वर्ष 1988-89 के दौरान ही 293 बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने निर्यात लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी हैं।

इन सबके बावजूद सरकार विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के दबाव में, निर्यात बढ़ाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली छूट दे रही है। वास्तव में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का निर्यात भारत के कुल निर्यात का 0.5 % ही रहता है। भारतीय रिजर्व बैंक की मार्च 1992 की रिपोर्ट के अनुसार 326 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1987-88 में केवल 810.37 करोड़ रूपये का निर्यात किया, जबकि इस वर्ष में भारत का कुल निर्यात 15,674 करोड़ रूपये के लगभग था। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ निर्यात बढ़ाने के नाम पर आती है लेकिन इनकी नीयत भारतीय बाजार पर कब्जा करने की रहती है। “पॉलिटिकल इकॉनामी ऑफ इण्डिया” की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1 करोड़ रूपये से अधिक की चुकता पूँजी वाली 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1986-87 में केवल 412.71 करोड़ रूपये का निर्यात किया जबकि इन कम्पनियों की कुल बिक्री 9,879.77 करोड़ रूपये थी। अर्थात् इन 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने 1986-87 में अपनी कुल बिक्री का मात्र 4.18 प्रतिशत ही निर्यात किया। इसी रिपोर्ट के अनुसार 1985-86 में इन 144 बहुराष्ट्रीय कम्पनियांे ने 8,997 करोड़ रूपये की कुल बिक्री की, लेकिन निर्यात मात्र 384.67 करोड़ रूपये का ही किया। अर्थात् कुल बिक्री का 4.23 प्रतिशत मात्र।

सरकार ने विश्व बैंक और मुद्राकोष के दबाव में जुलाई 1991 में रूपये का लगभग 25 प्रतिशत अवमूल्यन किया। इसके लिये वित्तमंत्री का तर्क था कि देश का निर्यात और अधिक बढ़ाने के लिये अवमूल्यन किया गया है। लेकिन इसके बावजूद 1990-91 के मुकाबले 1991-92 के निर्यात् में 15 प्रतिशत की कमी आयी। जबकि इसके पहले के 5 वर्षों में निर्यात में 16.8 प्रतिशत औसतन बढ़ोत्तरी हुयी। इ. 5 वर्षो में निर्यातत 9.7 अरब डालर से बढ़कर 18.1 अरब डालर तक हो गया। परन्तु 1991-92 में निर्यात घटकर 17.8 अरब डालर रह गया।

 वर्ष              निर्यात                आयात               घाटा

(करोड़ रू.)       (करोड़ रू.)           (करोड़ रू.)

 1979-80           6,418                    9,143              2,725

1980-81           6,576                    12,544             5,967

1981-82           7,766                    13,887             6,121

1982-83           9,137                    11,913             1,776

1983-84           10,169                   16,039             5,871

1984-85           11,959                   18,680             6,721

1985-86           11,578                   21,164             9,586

1986-87           13,315                   22,669             9,354

1987-88           16,396                   25,633             9,296

1988-89           20,646                   34,202             13,556

1989-90           28,234                   41,173             10,640

1990-91           32,553                   43,193             10,640

1991-92           44,042                   47,851             3,806

1992-93           14,921                   52,205             10,284

1993-94           55,824                   57,649             1,825

1994-95           65,482                   71,247             5,765

 सन् 1988 बाद घाटे में और तेजी से वृद्धि हुयी है। औसतन भारत की निर्यात आया, आयात भुगतान का 60 प्रतिशत है।

  मेरी ओर से-

 यह आँकड़े नये हैं जो भारत सरकार की आर्थिक-समीक्षा 2010-2011 से लिये गये हैं। हालत साफ है। भारत 1995 से लेकर 2010 तक हमेशा घाटे में रहा है। यह बात आपको बता दूं कि सन् 1949-50 से लेकर आज तक भारत 1972-73 और 1076-77 इन दो वर्षों को छोड़कर सभी वर्षों में घाटे में रहा है।–          

चंदन कुमार मिश्र

 कर्ज और आर्थिक सहायता की राजनीति

 अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आई.एम.एफ), विश्व बैंक जैसी संस्थायें जब देशों को कर्जा देती हैं तो वह उन देशों के विकास के लिये नहीं होता है, बल्कि इस बात के लिये होता है कि पिछड़ी अर्थव्यवस्थाओं को पनपने न दिया जाय। यह कर्जा इसलिये दिया जाता है कि उन देशों में आत्म निर्भरता न आने पाये और उन देशों की गरीबी कभी भी दूर न हो।

विश्व बैंक गरीब देशों को जो मदद देता है वह अमीर देशों से नहीं आती बल्कि अमीर देशों को मदद तथाकथित तीसरी दुनिया से जाती है। जाहिर है कि विकासशील और अविकसित देशों की मदद के नाम पर चलने वाले इस प्रवाह को रोकने में और उसे सचमुच विकासशील और अविकसित देशों की बेहतरी के लिये लगाने में विकसित देश कोई रूचि नहीं रखते। अगर उनकी रूचि है तो गरीब व अविकसित देशों को अपनी अर्थव्यवस्था के साथ पोषक अर्थव्यवस्थाओं के रूप में जोड़े रखने में। ताकि वे अपनी इस्तेमाल की हुयी प्रौद्योगिकी और बेकार हुये संयंत्रों को इन देशों को बेच सकें और इस तरह ये अविकसित व गरीब देश प्रौद्योगिकी के स्तर पर हमेशा पिछड़े रहें और उनके कर्जदार भी बने रह सकें। इसलिये विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष आदि संस्थाओं से जो भी मदद दी जाती है वह उन देशों को पिछड़ा रखने का एक साधन है।

विश्व बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के आंकड़े बताते हैं कि अमीर देशों से गरीब देशों को मदद मिलने की बजाय 50 अरब डालर (95 खरब रूपये) का कच्चा माल और उत्पादन उल्टे इन्हीं देशों को प्रतिवर्ष मुनाफे के तौर पर उपलब्ध हो जाते हैं। यानि ये अमीर देश हमारी मदद नहीं करते बल्कि हम ही प्रकारान्तर से उनकी मदद करते आ रहे हैं। अगर हर साल मिलने वाली नयी सहायता की रकम घटा दी जाय, तो लगभग 40 अरब डालर (760 अरब रूपये लगभग) है, तो भी 10 अरब डालर की रकम विकासशील और अविकसित देशों से इन विकसित अमीर देशों में जाती रहती है। यह है इन देशों की हमारे विकास के लिये मदद और यह है विकासशील देशों की सरकारों की विकास संबंधी अवधारणा।

अमीर देशों की दृष्टि से देखा जाय तो उनको कई स्तरों पर लाभ होता है – पहला यह कि विकासशील और अविकसित देश उनके द्वारा प्रयुक्त और बेकार प्रौद्योगिकी और संयंत्र लेने लायक हो जाते हैं, यानि जिस प्रौद्योगिकी ओर संयंत्रों से वे पहले ही लाभ उठा चुके हैं और जो अब उनके लिये बेकार हो गये हैं, उसे विकासशील या अविकसित देशों में ऊँची कीमत में पटकने का इंतजाम हो जाता है।

दूसरा लाभ यह है कि इस तरह से सहायता प्राप्त करने वाले देश प्रौद्योगिकी के मामले में तो पिछड़े रहते ही हैं, वे भारी कर्जदार भी बने रहते हैं और यह कर्जदारी साल-दर साल बढ़ती रहती है। इस तरह वे देश इन पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओ से जुड़े रहने को मजबूर बोझ ऊपर से लद जाता है। पश्चिमी देशों के इस दुष्चक्र में फंसकर इन देशों की अर्थव्यवस्था चौपट होने की स्थिति में पहुँच जाती है।

तीसरा फायदा अमीर देशों को गुप्त पूँजी पलायन से मिलता है। तीसरी दुनिया के शासक वर्ग अपने कालेधन को चोरी-छिपे बाहर ले जाकर पश्चिमी बैंकों में जमा करते हैं और इस तरह पश्चिम के उद्योगों को बिना ब्याज की पूँजी उपलब्ध कराते हैं। ज्ञात रहे कि कालेधन पर ब्याज नहीं मिलता है, चोरी का धन जमा करने वाली बैंक केवल उस कालेधन की सुरक्षा की गारंटी देती है। पश्चिम की जो सम्पन्नता आज है वह उसी पूँजी के कारण है। अगर वह पूँजी मिलना बन्द हो जाये तो उसकी सम्पन्नता आधी रह जायेगी।

अमीर देशों के पास तीसरी दुनिया के देशों की कर्जदारी बढ़ाने का एक जरिया और भी है; औश्र वह है गरीब देशों के कच्चे माल की कीमत विश्व बाजारों में गिरा देना। अमीर देश जब देखते हैं कि गरीब देशों की सम्पन्नता बढ़ रही है तो कच्चे माल की खरीद पर रोक लगा दी जाती है और आपूर्ति मांग के नियम के मुताबिक मांग कम होने पर चीजों के भाव हमेशा गिरते है। इस तरह कच्चा माल बेचने वाले इन देशों में गरीबी और बेरोजगारी फैलती है।

 कर्जे का दुष्चक्र

 विकास का जो ढाँचा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने देश को दिया है वह लगातार देश को कर्जे के जाल में फँसाता चला जा रहा है। कर्जदारी में वृद्धि के साथ ही सूद भुगतान भी बढ़ रहा है। 1984 में यह 1.5 अरब डालर (28.5 अरब रूपये लगभग) था, जो 1990 के अन्त तक 4 अरब डालर (76 अरब रूपये लगभग) हो गया। सन् 1991 में यह सूद 4.6 अरब डालर (87.4 अरब रूपये लगभग) तक पहुँच गया।

जुलाई 1995 तक देश के ऊपर कुल विदेशी कर्ज 4,53,397 करोड़ रूपये (140 अरब डालर से भी अधिक) हो चुकी है। इस कर्जे के ब्याज के रूप में प्रतिवर्ष लगभग 49,508 करोड़ रूपये (15 अरब डालर से भी अधिक) चुकाने पड़ रहे है। इस विदेशी कर्जे में वह हिस्सा शामिल नहीं है जो सरकार द्वारा विदेशी सहायता और साफ्ट लोन के रूप में लिया

जाता है। यदि इसे भी शामिल कर लिया जाय तो कुल कर्जा लगभग 6,91,511 करोड़ रूपये के बराबर बैठता है। इस समय भारत दुनिया में दूसरे नम्बर का सबसे बड़ा कर्जदार देश है। पिछले वर्ष तक भारत की स्थिति दुनिया में तीसरे सबसे बड़े कर्जदार देश की थी। भारत से पहले मैक्सिको और ब्राजील देशों का नम्बर आता था, लेकिन 1995 में विदेशी कर्ज के मामले में भारत ने मैक्सिको को भी पीछे छोड़ दिया है।

विदेशी कर्जे पर चुकाया जाने वाला ब्याज तथा सरकार द्वारा कम समय के लिये लिया गया कर्ज, यदि दोनों को मिला दिया जाय तो तस्वीर बहुत ही भयावह है। केन्द्र सरकार पर घरेलू कर्ज और देनदारियों में भी खूब बढ़ोतरी हो रही है। देनदारियाँ ऐसे कर्ज को कहते है, जिस पर ब्याज नहीं देना पड़ता। 1980-81 में केन्द्र सरकार पर घरेलू कर्ज और घरेलू देनदारियाँ 48,451 करोड़ रूपये थी, जो 1990-91 मे बढ़कर 2,83,033 करोड़ रूपये हो गयी। मार्च 95 तक ये 4,83,545 करोड़ रूपये के बराबर हो गयीं। इसी प्रकार केन्द्र सरकार पर विदेशी देनदारियाँ 1980-81 में 11,298 करोड़ रूपये थीं जो 1990-91 में 3,21,525 करोड़ रूपये के बराबर हो गयीं। इसी तरह कुल देनदारियाँ (घरेलू कर्ज सहित), जो 1980-81 में 59,749 करोड़ रूपये थी, वह मार्च 1995 में 5,33,053 करोड़ रूपये हो गयी। इन देनदारियों में यदि विदेशी कर्ज को जोड दिया जाय तो स्थिति अत्यन्त ही भयावह दिखती है। देश के सकल घरेलू उत्पाद से भ अधिक विदेशी कर्ज तथा देनदारियों का आंकड़ा बैठता है। देश का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 8,00,000 करोड़ रूपये के बराबर है, लेकिन विदेशी कर्ज ओर देनदारियाँ इस डेढ़ गुना (लगभग) अधिक है। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट हो जाता है कि देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह विदेश कर्ज और देनदारियों पर ही निर्भर हो गयी है। विदेशी कर्ज और देनदारियों के दुष्चक्र में फंस कर लैटिन अमरीका, अफ्रीका और एशिया के कई देश बुरी तरह बरबाद हो चुके हैं। कई देशों की हालत तो ऐसी है कि वे यदि अपनी पूरी सम्पत्ति बचे भी दें तो भी विदेशी कर्जे को नहीं चुका सकता हैं। कई देशों के हालाता ऐसे हो गये हैं कि उन्हें पुराने कर्ज चुकाने के लिये नया कर्ज लेना पड़ता है। इस तरह कर्जे का फन्दा ऐसे देशों के गले में कसता ही जा रहा है।

इस समय स्थिति यह है कि देश की निर्यात से होने वाली आय का 50 प्रतिशत अंश प्रतिवर्ष सूद को चुकाने में खर्च हो जाता है। शेष 50 प्रतिशत निर्यात आय, प्रतिवर्ष होने वाले आयात का मात्र 42 प्रतिवर्ष ही पूरा कर पाती है। विकास की उल्टी दिशा के कारण देश कर्ज के दुष्चक्र में फंस गया है।

 उच्च विदेशी तकनीक का झूठ

 विदेशी उच्च तकनीक को लाने के नाम पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को व्यापार की खुली छूट दी जाती है। भारत में आने वाली सभी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने विदेशी उच्च तकनीक देने के समझौते पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। लेकिन वास्तव में अधिकांश बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ ऐसे क्षेत्रों में व्यापार कर रही है, जहाँ विदेशी तकनीक की कोई जरूरत नहीं है। 80 के देशक में सरकार की ओर से एक नीति बनायी गयी थी। इस नीति के अनुसार

850 ऐसी वस्तु हैं, जिसके उत्पादन को लघु उद्योगों के लिये सुरक्षित रखा गया है। लेकिन जितनी भी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हैं, वे सभी इन्हीं उत्पादों के व्यापार में लगी हुयी हैं। लघु उद्योगों के लिये आरक्षित उत्पादों के क्षेत्र में घुसपैठ से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों क्षरा उच्च विदेशी तकनीक लाने की बात एकदम झूठ साबित होती है। देश में व्यापार कर रही कुछ बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ के बारे में नीचे तालिका दी जा रही है कि ये कम्पनियाँ ’जीरो तकनीक’ के क्षेत्र में व्यापार कर रही हैं अर्थात् ऐसे सामान बना-बेच रही हैं जिनमें विदेशी तकनीक की कोई जरूरत नहीं है। कुछ उदाहरण देखें:-

 कम्पनी का नाम                        क्या सामान बना/बेच रही हैं ?

 बाटा इण्डिया                    जूते, मोजे, रेडीमेड कपड़े, चमडे़ के थैले आदि।

बर्जर पेन्ट्स                    पेन्ट्स, तरह-तरह के रंग आदि।

ब्रुक बाण्ड इण्डिया लि.            चाय, कॉफी, रसोई घर के मसाले आदि।

कैडबरी इण्डिया लि.              चॉकलेट, बिस्कुट, आईसक्रीम आदि।

कोलफैक्स लेबोरेटरी इ.           शेविंग क्रीम, आफ्टर शेविंग लोशन आदि।

कालगेट-पामोलिव                टूथ पेस्ट, टूथ पाउडर, टूथ ब्रश, साबुन, शेविंग क्रीम

कार्न प्रोडक्ट्स इण्डिया                  दही पाउडर, जैली, मक्के के दोन पैक करके बेचना आदि।

क्राम्पटन ग्रीव्ज                  घरेलू पंखे, बल्ब, ट्यूब लाइट आदि।

ड्यूफार-इन्टरफैन                सौंदर्य प्रसाधन के सामान, साबुन आदि।

एस.के.एफ. लि.                 दर्द निवारक मलहम तथा स्प्रे आदि।

फिस्कर्स इण्डिया                 कैंची, चाकू आदि।

फनस्कूल इण्डिया                बच्चों के खिलौने।

जनरल इलैक्ट्रिक कम्पनी         घरेलू पंखे, बल्ब, ट्यूब लाइट, बिजली मोटर आदि।

ज्यौफ्री मैनर्स                   टूथ पेस्ट, टूथ ब्रश, साबुन आदि।

कम्पनी का नाम                        क्या सामान बना/बेच रही हैं ?

ग्लैक्सो इण्डिया                  बेबी फूड, ग्लूकोज के पैक, दवाएं आदि।

गाडफ्रे फिलिप्स                  सिगरेट, चाय आदि।

गुडलस नेरोलेक                  तरह-तरह के पेन्ट्स।

ग्रामोफोन इण्डिया                रिकार्ड, कैसेट आदि।

गेस्टकीन विलियम               सेफ्टी पिन, बटन, नट-बोल्ट आदि।

हिन्दुस्तान लीवर                 साबुन, टुथपेस्ट, शैम्पू, डिटर्जेन्ट आदि।

सीबा-गायगी                    टूथ पेस्ट, टूथ पाउडर, क्रीम, टूथ ब्रश, दवाएं।

एच.एम.एम. लि.                दूध पाउडर, बालों की क्रीम, बिस्कुट, टॉफी आदि।

आई. सी. आई.                  पेन्ट्स तथा रासायनिक रंग आदि।

इन्डिया फोटोग्राफिक कम्पनी       कैमरा, कैमरा-रील आदि।

इन्डियन स्वीइंग मशीन कम्पनी    सिलाई मशीन, रसोई घर के बरतन आदि।

इन्डो-मत्सुशिता कम्पनी           प्रेशर कुकर, घरेलू बरतन आदि।

ऑयन एक्सचेंज इण्डिया          वाटर फिल्टर्स।

आई. टी. सी.                   सिगरेट, होटल व्यवसाय, वनस्पति तेल आदि।

जे. एल. मॉरीसन                टूथपेस्ट, दूध की बोतल, फेस क्रीम।

जे. के. हेलन क्रूटिस              सौंदर्य प्रसाधन के सामान।

जॉनसन एण्ड जॉनसन                  साबुन, टेल्कम पाउडर, सेनेटरी नेपकिन्स, बड्स।

किसान प्रॉडक्ट लि.              जैम, स्क्कैश, बिस्कुट, चटनी आदि।

कोठारी जनरल फूड्स             कॉफी, साफ्ट ड्रिंक, पान मसाला आदि।

लखनपाल नेशनल                ड्राई सैल।

लिप्टन इण्डिया लि.              चाय, साफ्ट ड्रिंक, वनस्पति तेल।

मदुरा कोट्स                    धागे (सिलाई के लिये)।

मेटल बाक्स                    प्लास्टिक के बर्तन आदि।

बास्किन राबिन्स                 आईसक्रीम

नेस्ले इण्डिया                   साबुन, टेल्कम पाउडर, कोल्ड क्रीम

प्राक्टर एण्ड गैम्बिल              बाम, टॉफी, साबुन, चॉकलेट आदि।

रेकिट एण्ड कोलमैन              बूट पॉलिश, साबुन, डिटर्जेन्ट, लोशन आदि।

विमको लिमिटेड                 माचिस (दियासलाई), नमक आदि।

कोका कोला                     साफ्ट ड्रिंक

लोटस चॉकलेट्स                 बच्चों की चॉकलेट, बिस्कुट आदि।

कम्पनी का नाम                        क्या सामान बना/बेच रही हैं ?

रिगले                          चॉकलेट, टॉफी आदि।

रफेम इण्डिया                   चॉकलेट, टॉफी, लैमनचूस

यार्डल                          सौंदर्य प्रसाधन और साबुन

बाकारोज परफ्यूम्स               सुगंधित सेन्ट, साबुन, सौंदर्य प्रसाधन

लेबोरेटरीज गार्नियर              साबुन, सौंदर्य प्रसाधन के सामान

रीबुक इण्डिया                   जूते, चप्पल आदि।

जिलेट इण्डिया                  सेफ्टी रेजर, ब्लेड आदि।

विल्टेक इण्डिया                  सेफ्टी रेजर, ब्लेड आदि।

स्टीफेन केमीकल्स               डिटर्जेन्ट पाडडर, साबुन आदि।

विदेश से आयी टेक्नोलॉजी (?)

 

दुनिया के विकसित-अमीर देशों के द्वारा दी गयी टेक्नोलाजी के बदले प्रतिवर्ष लगभग 400 करोड़ रूपया रायल्टी के रूप में हमारे देश से बाहर जा रहा है। लेकिन देखने की बात यह है कि इन विकसित देशों द्वारा हमारे देश को कौन सी टेक्नोलाजी दी गयी है? किस देश ने किस प्रकार की टेक्नालोजी दी है, इसके कुछ उदाहरण:

 टेक्नोलॉजी                        कहाँ से आयी

 

नमक                                स्विट्जरलैण्ड

बच्चों के कपड़े                              नीदरलैण्ड

केले की चटनी                        डेनमार्क

चाकलेट-टाफी                         ब्रिटेन

साफ्ट ड्रिंक                           अमरीका

चीनी-मट्टी के बर्तन                    जापान, इटली, स्वीडन

कांच का सामान                       अमरीका, बेल्जियम

बाल प्वाइंट पेन व रिफिल               स्विटजरलैण्ड, जर्मनी, जापान, अमरीका, फ्रांस

छाता                                जापान, ताईवान

प्लास्टिक के बर्तन                     ब्रिटेन

स्कूल बैग                            ब्रिटेन

मोटरकार की सीट                      जापान

टेक्नोलॉजी                        कहाँ से आयी

 गहने-जेवरात                          कनाडा

सुई                                 स्विट्जरलैण्ड

प्लास्टिक की बोतलें, डिब्बे व अन्य सामान ब्रिटेन, अमरीका

खिलौने बनाने के लिए                        अमरीका, जापान, इटली, कोरिया, हांगकांग

स्पोटर्स कैप                           कनाडा

च्यूइंगम और बबलगम                  दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन

आलू-चिप्स                           अमरीका

टमाटर की चटनी                      बुल्गारिया, अमरीका

घरेलू चाकू                            नीदरलैण्ड

प्लास्टिक के फूल                      अमरीका

सौन्दर्य प्रसाधन                        अमरीका, फ्रांस

गैस लाइटर                           स्पेन

कैंची                                 फिनलैण्ड

फास्ट-फूड                            नीदरलैण्ड, अमरीका, स्विट्जरलैण्ड

तकिया                               फ्रांस

हैण्ड बैग                             अमरीका

लिपिस्टिक                            अमरीका

बालों के शैम्पू एवं आफ्टरशेव लोशन            फ्रांस, अमरीका, ब्रिटेन, नीदरलैण्ड

माल देशी, मुहर विदेशी

 

कई बार ऐसा भी होता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ न तो पूँजी लाती है और न ही कोई उच्च तकनीक। होता यह है कि ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कुछ भारतीय कम्पनियों के साथ ’फ्रेंचाइज एग्रीमेन्ट’ करती हैं या ’सब कान्ट्रेक्टिंग एग्रीमेन्ट’ करती हैं। इसके तहत उत्पादन का काम तो वह भारतीय कम्पनी करती है लेकिन उत्पादित माल पर नाम बहुराष्ट्रीय कम्पनी का ही होता है। अर्थात् बाजार में बिकने वाले माल की उत्पादक कोई स्वदेशी कम्पनी है लेकिन माल विदेशी कम्पनी के नाम से बिकता है। पूँजी लगाये स्वदेशी कम्पनी, तकनीक इस्तेमाल करे स्वदेशी कम्पनी, उत्पादन कराये स्वदेशी कम्पनी, लेकिन माल बिके विदेशी कम्पनी के नाम पर। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का यह गोरखधंधा इस देश में खूब चल रहा है।

नीचे ऐसी कम्पनियों की सूची दी जा रही है जिन्होंने न तो पूंजी लगाई, न कोई टेक्नोलॉजी लाये हैं और न ही कोई फैक्टरी लगाई है लेकिन माल उनके नाम से बिक रहा है और करोड़ों रूपये देश से बाहर जा रहा है।

सामान का नाम         भारतीय उत्पादक        बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनी

जूते               आगरा, कानपुर, कलकत्ता, अन्य

 स्थानों से मोचियों द्वारा ठेके पर           बाटा (इण्डिया) लि

कोलगेट टूथ पाउडर  क्रिस्टल कॉस्मेटिक्स, हैदराबाद            कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

चार्मिस लोशन       एम.जी.साहनी एण्ड कम्पनी, दिल्ली  कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

हेलो शैम्पू          एम.जी.साहनी एण्ड कम्पनी, दिल्ली  कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

पामोलिव शैम्पू            एम.जी.साहनी एण्ड कम्पनी, दिल्ली  कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

कोलगेट टूथपेस्ट     सन शाइन कॉस्मेटिक्स           कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

कोलगेट ब्रश        अडवानी इण्डस्ट्रीज, महाराष्ट्र        कोलगेट-पामोलिव इण्डिया

आयोडेक्स (बर्न स्प्रे) अक्रा पैक इंडिया                 एस्केफ इण्डिया लि

सिबाका टूथ पाउडर   कैन्ट लैब्स, बम्बई                हिन्दुस्तान सीबा-गायगी लि.

सिग्रल टूथ पेस्ट     इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट्स   हिन्दुस्तान लीवर लि

लिरिल फ्रेशनेश टेल्क्म इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट्स   हिन्दुस्तान लीवर लि.

क्लीनिक शैम्पू      इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट्स   हिन्दुस्तान लीवर लि

सनसिल्क शैम्पू     इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट्स   हिन्दुस्तान लीवर लि.

फेयर एण्ड लवल क्रीम इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट्स   हिन्दुस्तान लीवर लि

टियारा शैम्पू        फियोरा कॉस्मेटिक्स              जे.के. हेलन करटिस लि

निविया आफ्टरशेवलोशन  कॉस्मोपैक सिल्वासा                    जे.एल.मॉरीसन एण्ड जॉन्स लि

निविया टेल्कम            केवन कॉस्मेटिक्स                               जे.एल.मॉरीसन एण्ड जॉन्स लि

निविया क्रीम               केवन कॉस्मेटिक्स                              जे.एल.मॉरीसन एण्ड जॉन्स लि.

क्यूटीकुरा टेल्कम         नीनन प्रॉडक्टूस                                   म्यूलर इण्डिया लिपामेड

वैसलीन                                    जे. बी. अडवानी एण्ड कं.                   पाण्ड्स इण्डिया लि

पाण्ड्स सण्डल टेल्कम  इण्टरनेशनल हेल्थ केयर प्रॉडक्ट        पाण्ड्स इण्डिया लि.

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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