लुप्त होती कठपुतली कला को बचाने की कोशिश

ज्योति परिहार, निदेशक किलकारी

तेवरआनलाईन, पटना

एक समय था जब कठपुतली का नाम सुनते ही बच्चों के चेहरे खिल उठते थे। शहरों से लेकर दूर दराज के गावों में भी कठपुतली नाच मनोरंजनन का एक मुख्य साधन हुया करता था। पिछले कुछ दशक में दुनिया तेजी से बदली है, साथ में मनोरंजन के साधन भी बदले हैं। कठपुतली धीरे-धीरे बच्चों के जीवन से गुम होता चला गया। किलकारी की निदेशक ज्योति परिहार इस लुप्त होती कला को बचाने की पूरी कोशिश कर रही हैं। इसी कोशिश के तहत हाल ही में किलकारी बिहार भवन द्वारा आठ दिवसीय कठपुतली निर्माण प्रशिक्षण-सह-प्रस्तुति कार्यशाला का आयोजन युवा आवास फ्रेजर रोड पटना में किया गया। इस कार्यशाला में कुल 50 बच्चों ने भाग लिया। राजस्थान से आये  कलाकारो ने बिहार के बच्चों को कठपुतली निर्माण और संचालन  की बारीकियों की जानकारी दी।

इस कार्यशाला के औचित्य के बारे में पूछने पर ज्योति परिहार ने कहा, “मैं पिछले कई वर्षों से बिहार में कठपुतली से जुड़े कलाकारों की तलाश कर रही थी। यह जानकर आश्चर्य हुआ कि ऐसा एक भी कलाकार बिहार में नहीं है। चूंकि कठपुतली नृत्य मनोरंजन का एक सहज और सरल माध्यम है। मुझे लगा कि इस संदर्भ में कुछ करने की जरूरत है। इसी के तहत हमने राजस्थान से कुछ कलाकारों को आमंत्रित किया जो यहां के बच्चों को कठपुतली कला का प्रशिक्षण दे सके।” विलुप्त होते कठपुतली कला के कारणों को रेखांकित करते हुये उन्होंने आगे कहा,“ आज बच्चे टेलीविजन और नेट से जुड़ते जा रहे हैं। मनोरंजन के लिए इन चीजों पर उनकी निर्भरता बढ़ गई है। ऐसे में कठपुतली कला को बचाने के लिए यह जरूरी है कि सीधे बच्चों को इससे जोड़ा जाये।”

इस कार्यशाला में आकर बच्चे भी काफी खुश थे। उन्होंने कठपुतली बनाने से लेकर नचाने तक का गुर सीखा और उन्हें काफी मजा भी आया। खुद के द्वारा बनाये हुये कठपुतलियों के साथ ये बच्चे अब तक कई शो भी कर चुके हैं और आने वाले दिनों में पूरे देश  में इस तरह के शो करने का इरादा बनाये हुये हैं। ज्योति परिहार भी इन बच्चों की उपलब्धियों से काफी संतुष्ट हैं। यह पूछे जाने पर कि इस कार्यशाला पर कितना खर्च हुआ वो हंसते हुये कहती हैं, “बच्चों के चेहरे पर जो खुशी दिख रही है उसके सामने खर्च कोई मायने नहीं रखता है। मेरे लिए तो इतना ही काफी है कि बच्चे मन लगाकर इस कला को सीख रहे हैं।”

 राजस्थान से आये कलाकार भी बच्चों के साथ काफी घुलेमिले हुये थे। नागौर के कठपुतली कलाकार बिल्लो राम भाट ने कहा कि यहां के बच्चे काफी प्रतिभाशाली हैं। बहुत जल्द ही उन्होंन  सबकुछ सीख लिया। अब जरूरत सिर्फ अभ्यास करने की है। अभ्यास करने के साथ ये और भी परफेक्ट होते जाएंगे। इस दौरान बच्चों को कई राजस्थानी लोकगीत भी सिखाया गया।   

ज्योति परिहार ने कहा कि कठपुतली के माध्यम से हम समाज में सकारात्मक संदेश दे सकते हैं। आने वाले दिनों में हम बच्चों को लेकर ऐसे ही सकारात्मक कार्य करेंगे। इससे कठपुतली नृत्य की लोकप्रियता तो बढ़ेगी ही साथ ही बच्चों का सही दिशा में विकास भी होगा।  

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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