कहीं यह इलेक्ट्रान ही भगवान तो नहीं है ?

चंदन कुमार मिश्र, पटना
जिन लोगों ने थोड़ा सा भी विज्ञान पढ़ा है उन्होंने निश्चय ही परमाणु संरचना पढ़ी होगी। ईश्वर की सत्ता स्वीकार करनेवालों का कहना है कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान है। हवा में भी, पानी में भी, जहर में भी, शराब में भी, दूध में भी, माटी में भी, आग में भी, कुर्सी में भी, आदमी में भी, लादेन में भी, जार्ज बुश में भी, मनमोहन सिंह में भी, कांग्रेस में भी, सोनिया गाँधी में भी, भगतसिंह में भी, सैंडर्स में भी, राबर्ट क्लाइव में भी, सिराजुद्दौला में भी, कमीने मीरजाफ़र में भी, आतंकवादी में भी, सेना में भी, भ्रष्टाचार में भी, भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ने वालों में भी, चोर में भी कोतवाल में भी यानि हर जगह। क्या अद्भुत विचार है !

अब देखिए चमत्कार। अगर स्विस बैंकों में पैसा लूट कर जमा करने वाले के लिए या भ्रष्टाचारी के लिए फाँसी की मांग की जाय तो फिर इसका का क्या अर्थ हुआ? यानि एक भगवान (भ्रष्टाचारी) को दूसरे भगवान (जल्लाद) भगवान (फाँसी) पर भगवान(अच्छे लोग) के आन्दोलन छेड़ने के चलते एक अन्य भगवान(न्यायाधीश यानि जज) के आदेश से चढ़ाएंगे। या दूसरा उदाहरण देखिए। कोई बलात्कारी(भगवान) एक निर्दोष लड़की(भगवान) से बलात्कार करे तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि एक भगवान दूसरे भगवान के साथ कुछ भी करे, तो कोई बात नहीं। एक और उदाहरण और लेते हैं। मान लीजिए एक दो महीने का शिशु सोया है और घर में आग लग जाती है। बच्चा भी जलकर मर जाता है। यहाँ तो दोष बच्चे का ही था, क्यो? एक भगवान(आग) ने दूसरे भगवान(शिशु) को जलाकर मार डाला।
अब विज्ञान के नजरिए से इलेक्ट्रान ही सभी चीजों में हो सकता है या प्रोटान भी। लेकिन इलेक्ट्रान का ज्यादा बोलबाला है इसलिए हम यहाँ इलेक्ट्रान की बात करते हैं। और इलेक्ट्रान से किसी को झगड़ा भी नहीं है। इससे किसी को भी चाहे वह किसी धर्म का हो, कोई विरोध भी नहीं है। बिजली भी इलेक्ट्रान का प्रवाह मानी जाती है। यानि कण-कण में इलेक्ट्रान व्याप्त है। अब साबित तो यही होता है कण-कण में रहनेवाले भगवान या इलेक्ट्रान दोनों में कोई अन्तर नहीं है क्योंकि यही दोनों सर्वव्यापी कहे जाते हैं। अब एक इलेक्ट्रान दूसरे इलेक्ट्रान को कुछ भी करे किसी पर कोई फर्क तो पड़ता नहीं। बाकी बाद में……।
लेकिन अभी एक सवाल कहीं यह इलेक्ट्रान ही भगवान तो नहीं है?

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to कहीं यह इलेक्ट्रान ही भगवान तो नहीं है ?

  1. pankaj sagar says:

    vigat dino ‘ GOD PARTICAL’ ke kshetra me manavata ne jo virat uplabdhiyan prapta ki hain uspar itana ghatiya lekh maine aabhi tak nahi padha……

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