दलालों का अड्डा है विदेश मंत्रालय का विभाग

दिल्ली में पटियाला हाऊस कोर्ट स्थित विदेश मंत्रालय का विभाग दलालों का अड्डा बना हुआ है। इस विभाग में कागजातों के साथ पैसे उड़ रहे हैं। विदेश मंत्रालय के इस केंद्र पर देश के हर प्रांत से लोग आ कर चक्कर लगा रहे हैं । जिस पल विदेश जाने का सपना साकार रुप ले रहा होता है, व्यवस्था के चक्र में घुम कर लोगों को यहां पहुंचना है जहां दलालों की पूरी फौज उनका स्वागत कर रही होती है। दलालों का पहला काम है गुमराह करना और काम की कठिनाई को प्रस्तुत करना। सरकारी दफ्तर के तानाशाही स्वरुप को ये सामने रखते हैं। बाहर से आए हुए लोगों को ये बताया जाता है कि अगर आप खुद से काम करोगे तो कम से कम दस पंद्रह दिन का चक्कर लगेगा। सीधा सा तरीका है दलालों के शरण में चले जाओ, काम फटाफट हो जाएंगे।
विदेश जाने के लिए तथा साथ में अपने शैक्षणिक और व्यवसायिक कागजों को ले जाने के लिए विदेश मंत्रालय के इस केंद्र से अनुमति लेनी होती है। विदेश मंत्रालय उन सारे कागजों पर अपनी मुहर लगाता है। शादी और तलाक के कागजों को भी विदेश में चलाने के लिए यहां मुहर लगावानी पड़ती है। लेकिन यह काम होने के लिए पहला शर्त है कि ये कागज उस राज्य के शिक्षा विभाग और गृह मंत्रालय से पास होने चाहिए जहां से इनको जारी किया गया है। राज्य के वे विभाग पहले अपनी शील-मुहर लागएंगे तब यह कागजात दिल्ली के इस केंद्र पर आना है। इन कागजातों को जमा करने के लिए खिड़की बनी हुई हैं जिस पर लंबी लाईन लगी रहती है। अपने कागजों को लेकर हर आदमी जल्दी में है क्योंकि उसे विदेश में शिक्षा या नौकरी के ऑफर आए हुए हैं। इस काम के लिए जहां सही खर्च पचास रुपय का है, वहीं दलाल इसके लिए कभी – कभी पचास हजार तक खींच लेते हैं। जिनका मुहर अपने प्रांत से नहीं लागा होता उनका मुहर यहां बैठे – बैठे लग जाता है।
पटियाला हाऊस कोर्ट के कुछ वकील भी दलाली के इस काम में लगे हुए हैं जो मोटी रकम बना रहे हैं। अपने काम के लिए आने वाले लोग उन पर वकील होने के कारण आसानी से विश्वास कर लेते हैं। कितनों की तो वकालत छूट गई है और मुहरबाजी का यह काम चल रहा है जिसमें दिमागी तनाव भी नहीं है और चांदी भी कट रही है। कुछ ने तो विभाग के अंदर अपनी सेटिंग कर रखी है और सेट अफ्सर को तय पैसा कागजातों के हिसाब से पहंच जाते हैं। दुसरे वकीलों के कागजात इस सेटिंग सेंटर पर आते हैं। कुछ वकीलों के लिए तो यह काम पैसा छापने की मशीन की तरह है। अपने जरुरत के हिसाब से दलाल और वकील एक दुसरे का पूरा सहयोग भी कर रहे हैं। मिलजुल कर खाने – पीने की परिपाटी चल रही है। इस काम के लिए कितने वकीलों ने अपने दलाल अदालत के गेट पर छोर रखे हैं क्यों कि लोग पटियाला हाऊस खोजते हुए ही विदेश विभाग के पते पर पहुंचते हैं।
दलालों के माध्यम से जाने वाले कागज सीधा दफ्तर के अंदर पहुंच जाते हैं और समय पर वापस मिल भी जाते हैं जिसके कारण अमीर लोग उनसे काम कराना पसंद करते हैं। कौन लाईन में लगे और दफ्तर का चिक-चिक झेले। मध्यम तबके के लोगों की मजबूरी बन जाती है कि वे दलालों से काम कराएं क्योंकि विदेश पहुंचने का उनका समय तय रहता है। एक साजिस के तहत दलालों के काम को तरीके से चलाया जा रहा है। आश्चर्य तो इस बात में है कि यहां के दलालों की दिल्ली में अपनी कोठियां और जमीन हैं और अपने लंबे समय से यहां होने का वे गर्व भरते हैं।
विदेश विभाग में दलाली का यह खेल सरकार की लापरवाही और व्यवस्था के खोखलेपन की कहानी कह रहा है। लोगों के जेहन में सरकारी कामकाज और दफ्तर के प्रति नफरत भरती जा रही है। देश के हर कोने से यहां आने वाले लोग यह समझने लगे हैं कि दिल्ली में हर काम पैसा से हो रहा है और यह देश की नहीं भ्रष्टाचार की राजधानी है। इस प्रक्रिया में लोगों के पास जानकारी का अभाव होता है जिसे दूर करने के लिए कोई सरकारी कोशिश नहीं की गई है।

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