बेबसी ( कहानी )

   “  मुबारक हो जय बाबू ! नयी जिन्दगी बहुत बहुत मुबारक हो।”

आत्मविश्वास से भरे डॉक्टर अनिल के ये शब्द जय बाबू के कानों में पड़े तब उन्हें अपने जीवित होने का अहसास हुआ, अन्यथा हृदयाघात के दूसरे दौरे ने तो उन्हें लगभग मौत के आगोश में ही सुला दिया था ।

जीवन और मृत्यु से जूझते जय बाबू के हृदय का ऑपरेशन सफलता पूर्वक हो जाने के बाद उनके कॉलेज के दिनों के सहपाठी रहे डॉ. अनिल ने आज उन्हें घर जाने की अनुमति दे दी थी। उनकी पत्नी एवं बेटे के चेहरे पर खुशी स्पष्ट झलक रही थी । उनकी पत्नी मोहिनी सर्वाधिक खुश थी , आखिर उसकी दिन रात की प्रार्थना ने उसके पति को यमराज के मुँह से वापस पाया था ।

 दिल की बीमारी ने 55-56 साल के जयबाबू को उनकी उम्र से ज्यादा ही बूढ़ा बना दिया था । एक राष्ट्रीय बैंक में शाखा प्रबंधक के पद पर कार्यरत जयबाबू के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो बेटे ,बहू एवं पोते पोतियां भी थे । कुल मिलाकर जयबाबू एक भरे पूरे परिवार के मालिक थे । इन सारी खुशियों के बावजूद उनके चेहरे पर सदैव एक दर्द की रेखा तैरती रहती थी , जिसका अहसास उनके बच्चों को कम  उनकी पत्नी मोहिनी को हमेशे हुआ करती थी।

आज भी जयबाबू को घर लौटने की इजाजत मिल जाने के बावजूद उनके चेहरे पर अपेक्षित खुशी न देखकर मोहिनी ने पूछा ।

  “ क्या बात है जी , आप हमेशे खोये खोये से क्यूं रहते हैं। मैं महसूस करती हूं कि आज हमारी शादी को करीब 32 साल होने को आये लेकिन मैंने कभी भी आपको पूरी तरह से खुश नहीं देखा । यह अलग बात है कि आपको मुझसे भी कोई शिकायत नहीं है। आप परिवार का भी पूरा ध्यान रखते हैं, फिर ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको सबकुछ पाकर भी कभी खुश नहीं होने दिया । ”

 “कोई बात नहीं मोहिनी, बस जरा सी तबीयत ठीक नहीं लग रही है, लेकिन चिन्ता की कोई बात नहीं, अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ । ”

जय बाबू ने मोहिनी को आश्वस्त किया ।

   “ माँ , मैं ट्रेन के प्रथम श्रेणी के तीन टिकट ले आया हूं। आज शाम हम सब वापस चल रहे हैं।घर पर भी मैंने सुचित कर दिया है। वहां भी सभी हमारा इंतजार कर रहे हैं। ”

 जय बाबू का छोटा लड़का रोहित जो उनके साथ ही दिल्ली तक उनका ऑपरेशन कराने आया था, को भी सकुशल अपने पिता को परिवार के बीच ले जाने की खुशी थी।

लगभग सारी तैयारिया हो चुकी थीं । ट्रेन रात के आठ बजे थी इसलिये तीन बजे तक सारे सामानों की पैकिंग के बाद जय बाबू मोहिनी एवं बेटे के साथ बिस्तर पर आराम की मुद्रा में लेटकर शाम होने का इंतजार कर रहे थे।तभी घबराये हुये डॉ. अनिल के साथ तीन चार नर्स एवं वार्डन एक वृद्ध महिला को स्ट्रेचर पर धकेलते हुये आपात कक्ष की तरफ तेजी से भागे चले जा रहे थे ।

अनायास जब जयबाबू की नजर उस वृद्ध महिला पर पड़ी , उनके चेहरे पर कई भाव आते चले गये । उन आते जाते रंगों को सिर्फ मोहिनी ने अनुभव किया परंतु अफरा तफरी के बीच वह भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे सकी।

    हाँ, ये फरहीन ही थी, उनकी अपनी फरहीन जिसके साथ उन्होंने कभी साथ जीने मरने की कसमें खायी थी । कभी न तोड़ने के वादे किये थे और वे अतीत में खोते चले गये ।

 कॉलेज में फरहीन से वह पहली मुलाकात और थोड़ी नोक झोक के बाद दो विभिन्न धर्मों के बावजूद उन दोनों का प्यार परवान चढ़ता गया । आज के डॉ. अनिल तब उनके मददगारों में एक हुआ करते थे परंतु तमाम सहयोग के बाद भी अमीर पिता की एकलौती संतान फरहीन से उनकी शादी नहीं हो सकी थी ।उन्हें अभी भी याद था वह दिन जब फरहीन के पिता से गिड़गिड़ा कर उन्होंने उसका हाथ मांगा था तथा अपना धर्म भी छोड़ने को तैयार थे। उनकी एक न सुनी गयी क्योंकि तब अंतरजातीय विवाह ही मुश्किल थे फिर यह तो दो संप्रदायों की बात थी। बहुत समझाने के बाद भी धर्म और मजहब की ऊँची दीवार के सामने उनका प्यार बौना पड़ गया , जिसे तोड़ पाने में फरहीन भी कमजोर पड़ गयी थी । कितने बेबस से हो गये थे वे।

कॉलेज की पढ़ाई खत्म हो गयी और सभी दोस्त बिछड़ गये । फरहीन भी कहीं खो गयी । आज उम्र के इस पड़ाव पर जब शरीर भी उनका साथ छोड़ने को आतुर है, अनायास फरहीन उनके सामने थी। उनका जी चाहा , वे आगे बढ़कर उसे गले लगा लें और सारे बंधन तोड़कर अपनी फरहीन को अभी भी अपना बना ले पर वे ऐसा नहीं कर सके ।पत्नी और बेटे का अहसास उन्हें हुआ। लगा अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल गयी हैं और आज की मर्यादा की दीवार उस मजहब की दीवार से भी ज्यादा ऊंची है।

“पिताजी , आप कहाँ खो गये । डॉक्टर ने आपको ज्यादा सोचने के लिये मना किया है।  ”

 रोहित ने पिता को संभालते हुये कहा।

जय बाबू की तंद्रा टूटी और उनके चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान फैलती चली गयी ।

मैं बिल्कुल ठीक हूँ। कहते हुये वे अपनी चारपायी से उठकर डॉ. अनिल के कक्ष की ओर बढ़ गये ।

काफी देर की बातचीत के बाद जब वे वापस आये तो मोहिनी ने उनके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी का अनुभव किया जिसके लिये वह पिछले 32 सालों से तरस रही थी ।

“वापस लौटने की सारी तैयारियाँ हो गयी ?” जयबाबू ने मोहिनी से पूछा ।

हाँ, क्यों अभी वापस चलने की इच्छा नहीं है क्या ?

मोहिनी ने आश्चर्य से पूछा ।

    “ हाँ  मोहिनी, यदि हमलोग आज नहीं जाकर दो तीन दिनों बाद चले तो कैसा रहेगा।”

जयबाबू ने आग्रह भरे शब्दों में मोहिनी से कहा।

    “ क्या… टिकट कटाये जा चुके हैं । सारी तैयारियाँ हो चुकी हैं और फिर घर पर सभी हमारा इंतजार कर रहे हैं।”

मोहिनी ने चौंकते हुये कहा।

       “  प्लीज मोहिनी, मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है और फिर मैं अभी अभी डॉ. अनिल से मिल कर आ रहा हूँ। उन्होंने भी अभी लंबी यात्रा से मना किया है । दो दिनों की तो बात है।”

जय बाबू बच्चों की तरह अपनी बात दोहराते चले गये ।

आज पहली बार अपने पति के चेहरे पर खुशी के भाव को महसूस कर मोहिनी खामोश हो गयी और उसने लगभग अपनी मौन स्वीकृति दे दी।

बिस्तर पर पड़े जय बाबू के पास बैठी मोहिनी उनके दर्द से बेखबर इस बात पर संतुष्ट थी कि नयी जिंदगी के साथ उनकी खुशियाँ भी लौट आयी हैं।

डॉ. अनिल ने जयबाबू को अपने पास बुलाया और दोनो घंटो बाते करते रहे । जयबाबू ने फरहीन से संबधित कई सवाल पूछे । उन्हें आश्चर्य था कि फरहीन भी दिल की मरीज थी पर उसके साथ कोई नहीं आया था। पूछने पर डॉ. अनिल ने उन्हें बताया कि फरहीन ने तुम्हारे जाने के बाद शादी ही नहीं की । अपने पिता के लाख समझाने के बावजूद वह किसी और से निकाह करने को तैयार नहीं हुयी। अपने पिता द्वारा छोड़ी गयी अकूत संपत्ति भी उसने इस अस्पताल के नाम कर दी और अब हम सब लोग ही उसकी देखभाल करते हैं।

सारी बातें सुनकर जयबाबू का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया और उनकी आँखें श्रद्धा से झुक गयीं ।उन्हें अपनी बेबसी पर तरस आ रहा था ।

  … फरहीन तुम धन्य हो ।

अपनी डबडबायी आँखों को पोछने के बाद जय बाबू बुदबुदाते चले गये।

शाम में फरहीन का ऑपरेशन था । डॉ. अनिल ने जयबाबू को कंधे से थपथपाया और आशा भरी मुश्कान बिखेरते हुये कहा-“ धीरज रखो , सब कुछ ठीक हो जायेगा । मैंने तुम्हे ठीक कर दिया ,उसे भी ठीक कर दुँगा। ”और ऑपरेशन कक्ष की ओर बढ़ चले ।

उदास से जयबाबू अपनी पत्नी के पास बैठ गये । उनके अचानक गंभीर हुये चेहरे को देखकर मोहिनी घबरा गयी । उसने उनके दिल की बात जानने की बहुत कोशिश की परंतु जिस काम में वह पिछले बत्तीस सालों में सफल नहीं हो सकी वह भला आज कैसे सुलझती ।

दूसरी सुबह आँख खुलते ही जयबाबू की आँखें डॉ. अनिल को तलाश रही थी । उन्हें आश्चर्य था कि डॉ. अनिल ने फरहीन के लिये उन्हें मुबारक बाद क्यों नहीं दी, जैसा उनके नये जीवन पर दिया गया था ।अचानक उनका चेहरा भयाक्रांत हो गया परन्तु फिर उन्होंने डॉ. अनिल की कुशलता पर पूरा भरोसा कर अपने आप को संभाला ।

  “ कैसे हैं जयबाबू , डॉ. अनिल ने पीछे से आवाज दी

“मैं ठीक हूँ , तुम वह बताओ जो मैं जानना चाहता हूँ ।” डॉ. अनिल से थोड़ा रुठते हुये जयबाबू ने पूछा।

डॉ. अनिल जजबात में बहकर यह भूल गये कि अब जयबाबू वे जय बाबू नहीं हैं जो कभी उनके साथ कॉलेज में पढ़ा करते थे । आज इतने सालों बाद वे भी एक मरीज की तरह उनसे रुबरु हुये हैं।

    “ आइ एम सॉरी जय , कल रात चले चार घंटों के लंबे ऑपरेशन के बाद फरहीन ने एक बार अपनी आँखे खोली और सिर्फ तुम्हारे बारे में इतना कहा कि, मेरा जय मुझे इस जन्म में नहीं मिला मैं आगे भी उसका इंतजार करुंगी।” और उसने दम तोड़ दिया ।

    “ मुझे माफ कर दो जय , मैं तुम्हारी फरहीन को नहीं बचा सका। ” डॉ. अनिल की आखों में कहते कहते आँसू छलक आये और उन्होंने अपनी नजरे घुमा ली।

   “क्या… मेरी फरहीन मर गयी । ”

जयबाबू चौंक पड़े , अनायास उन्हें डॉ. अनिल की बातों पर यकीन नहीं हुआ।

“मेरी फरहीन अभी भी मेरा इंतजार कर रही है। ”

जय बाबू बुदबुदा पड़े और उनकी आँखे पथराने लगीं।

मैं भी वहाँ आ रहा हूँ फरहीन , जहाँ धर्म , मजहब , समाज एवं मर्यादा जैसी कोई दीवार शायद नहीं है।

इन्हीं शब्दों के साथ दो हिचकियों के बीच जयबाबू का निर्जीव शरीर बिस्तर पर लुढ़क गया ।  

                                         ***

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32 Responses to बेबसी ( कहानी )

  1. Radhey says:

    सामाजिक जीवन के स्वरुप की विशालता में दबी एक गहन मानवीय संवेदना को उजागर करती एक बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति है यह कहानी……

  2. nilabh nayan says:

    it was simply awesome………………

  3. Raj Shekhar says:

    Well, you will please write a story(based on love), brief on who can’t look each other after marriage

  4. birendra yadav patna says:

    bahut badhiya.

  5. ashim shekhar says:

    OSAM STORY ANITA JI keep it up. I like to say
    Jab chhote the tab bade hone ki Tamanna thi par ab pata chala ki adhure Ehsaas aur toote sapno se accha adhure homework aur toote khilone the… :( ((

  6. appu says:

    Heer – Ranjha in the disguise of Jaibabu & Farheen were ahead of their times and i think the author is also ahead of her time :) .But good and soul touching story with a message of harmony…….

  7. Anand kumar jha says:

    very good attempt for castless society……..anita
    peoples in the bihar still live for the cast and dont leads the life as human…….
    marriages in castless very very far away, but i observed functions,invitation is based
    on cast. i think is bihar is only state where un-touchability is still there.
    The end of the two true lovers are tragedy……..
    The two true lover must had achieved their love……
    keep it up

  8. Dr M Faiyazuddin says:

    The very touchy story highlighting the social evils that prevent inter religious marriage on hollow grounds. The style of writing is very appealing and the title of the story aptly suits to the story. The thematic context is very useful . Our society does not alloe inter caste marriage within same religion, how can it permit outside religion? But love cannot be limited to religious boundaries. Overall a very nice story.

  9. rakesh singh says:

    nice story .

  10. ek achhi lekhika to sat-sat naman.
    dil ko chu lene wali ek kahani,
    मैं तुम्हारी फरहीन को नहीं बचा सका। ” डॉ. अनिल की आखों में कहते कहते आँसू छलक आये और उन्होंने अपनी नजरे घुमा ली।
    ye is kahani ki hasile mahfil line he.

  11. Alok Augustine says:

    Kaash Aaj ke Zamane m Pyar ki keemat hoti….

  12. सदृश्य लेखनी, बधाई

  13. “बेबसी” एक सारगर्भित कहानी है, लेखिका अनीता जी को बहुत बहुत बधाई .

  14. chandru says:

    nice

  15. reezoo says:

    bahut hi achchhi kahani hai. prem kabhi nahi marta yah siddha ho gay is kahani se.

  16. vicky says:

    लगभग यही कहानी थी शायद मेरी और उनकी एक अधूरी दास्ताँ जो शायद कभी पूरी न हो ! जय बाबु को उनकी फरहीन कमसे कम रूबरू तो हुयी पता नहीं वो कहा होंगे

  17. vijai mathur says:

    ‘सच्चा प्यार’ और ‘दिली मोहब्बत’ को ‘बेबसी’ के रूप मे मार्मिक ढंग से पेश करके आपने समाज मे व्याप्त ढ़ोंगी -पाखंडी धार्मिक रूढ़ियों के जिंदंगियों पर पड़ने वाले ‘मनोवैज्ञानिक प्रभाव’ को बखूबी रेखांकित किया है।

  18. pawan jain says:

    shyad lekhika ne is kahani ko ek prateek ke rup mein likh kar aaj ki naujawan peedhi ko sandesh dena chaha hai…ki woh jativad…….dharam ki janjerro se khud ko mukt kar…sirf yeh soche…ki ham sab insaan hai….insanao ke beechjati…dharm ki duriyan sheersh aur satta par baithe huye sadio purane tathakatith thekedaro ki sochi samji sajish hai aur aaj bhi is soch mein koi parivartan ke liye taiyar nahi……..rozana ncr mein aaj bhi premi yugal…ko bhari panchyat mein sazaye maut sunayi ja rahi hain….naye farman jari kiye ja rahe hain…aur hamare desh ke shashak aur kanoorn bas khamosh dekh rahe hain…bebasi se…voto ke lalach mein………Anita……ham is abhiyan mein sada tumhare sath hai……….shubhkamnaye…..

  19. kamlesh kumar says:

    story bahut achhi lagi.dil ko chhu gayi sath hi kai bhuli bisri yade bhi aayi.very nice story thanks anita je.

  20. dinesh says:

    awsome…..
    sad story…..
    reality of our society…
    can’t stop my tears

  21. Probably it may give lesson to those who are confined to the religion only.

  22. naresh pandey says:

    बहुत ही बढ़िया

  23. ohm verma says:

    यह कहानी धर्म और जाति के बंधन पर चोट है। आखिर हम क्‍यों धर्म के नाम पर एक दूसरे से नफरत करते हैं। क्‍या रखा है धर्म और जाति में। यह कहानी उन नेताओं और समाज के ठेकेदारों को भी पढ़ना चाहिए जो जाति के नाम पर सड़कों पर डंडा भांजने निकल पड़ते हैं। इतनी मेहनत नेकी में और प्रेम को बढ़ावा देने में लगाया जाए तो सचमुच रामराज आ जाएगा। तब किसी जय बाबू को यूं नहीं सिसकना होगा।
    ये पंक्‍ित दिल को छू गई- मैं भी वहाँ आ रहा हूँ फरहीन , जहाँ धर्म , मजहब , समाज एवं मर्यादा जैसी कोई दीवार शायद नहीं है।

  24. arjun sharma says:

    Behad sanjida, dil ko choo lene wali story. writer ko badhai

  25. ajamil says:

    अनीता जी आपकी कहानी बेबसी पढ़ी. बहुत अच्छी लगी .खास तौर पर कहानी की बुनावट .कथानक के पीछे का उद्देश्य हमे सोचने पर विवश करता है…आपकी कुछ और रचनाएँ भी इसमेँ पढकर आपको आपनी प्रतिक्रिया दूंगा ……इस कहानी के लिए बधाई…….

  26. pawan upadhyay says:

    आज की मर्यादा की दीवार उस मजहब की दीवार से भी ज्यादा ऊंची है।
    ………..behtareen line

    मैंने तुम्हे ठीक कर दिया ,उसे भी ठीक कर दुँगा। …….yahaan tak pahunchte pahunchte dil se nikla taral aankhon se chhalak aya sach…abhi khoobiyan bataa rahaa hu khamiyon ko darkinaar kar mam ji..is mamle me kathor hu, jhoothi prashansa nahi karunga isase nischint rahiye

    “मेरी फरहीन अभी भी मेरा इंतजार कर रही है। ”

    जय बाबू बुदबुदा पड़े और उनकी आँखे पथराने लगीं।

    मैं भी वहाँ आ रहा हूँ फरहीन , जहाँ धर्म , मजहब , समाज एवं मर्यादा जैसी कोई दीवार शायद नहीं है।
    ………….nihaayat hi khoobshoorat kahani. koi kasam nahi khayi hai ki kami hi nikalni hai

    मेरे जज्बातों से इस कदर वाकिफ है मेरी कलम
    मैं”इश्क” भी लिखना चाहूँ तो”इंकलाब”लिख जाता है…
    …….iske baavjodd ek hi prawaah me parhne laayak kahani….yah baat alag hai ki aise lag rahaa jaise ek dam se khat kyu huyi kahani…matlab ji nahi bharaa lagta hai ….

  27. very touching and emotional .

  28. Sanjeev Shanti Mehta says:

    Ek khub surat afsana jo mohabbat ki gahrai ko darsata hai. lekin durbhagya se anita jee dwara gadha gaya patra jaibabu aur farhana ko bajar wad ki vyawastha nigal gaya. kaash aisa pyar aaj dekhne ko kahin mil jata.

  29. rajsingh pal says:

    sachche pyar, jati-dharam ki bediyon ke karan do aatmaon ka bichhdna, farheen ka tyag, jai babu ki bebasi and do pavitra jismo ka ek sath duniya chhodna, wah………kya bahut achchhi story hai, likhti rahiye, aapki kalam ko sadhuwad

  30. bhashkar jha says:

    I LIKE THIS STORY

  31. VINOD SHARMA says:

    A love story radiating the genuine spirit of love n love alone with a deep insight into the crux of unfilled longings n emotions of heart n soul of TRUE LOVERS that was sandwitched n crushed within the walls of religion…..A beautifully scripted story giving a subtle message to religious hawks who don’t know what RELIGION is.Love is supreme n Religion become a non entity when it is devoid of Love.Kudos to the Author for this lively story of “TWO DEATHS” on altar of RELIGION!!

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