ईश्वर तुम्हें धिक्कार है! (कविता)

चंदन कुमार मिश्रा

निर्मल  हृदय की  प्रार्थना

निष्कपट मन की  भावना

कोई    नहीं   सम्भावना

फिर   भी तुम्हारी साधना

यह  कर  रहा  संसार है!

ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार है!

ये  चीख कैसी आज सुन

तनिक   ये  आवाज सुन

ले  सुनाता,   राज  सुन

तेरा  ही  ये  व्यापार  है!

ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार है!

कहीं  तंत्र है, कहीं मंत्र है

चमचा  तेरा   स्वतंत्र  है

क्या  खूब!  ये  षडयंत्र है

हर  जगह  अत्याचार  है!

ईश्वर  तुम्हें  धिक्कार  है!

है   एक   मेरी   चाहना

हो  अगर  मुझसे  सामना

एक  प्रश्न  मुझको  पूछना

क्या दिल में  तेरे प्यार है?

ईश्वर तुम्हें  धिक्कार  है!

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to ईश्वर तुम्हें धिक्कार है! (कविता)

  1. Radhey says:

    Very nice and powerful poem

  2. Anjali says:

    बहुत अच्छी कविता है।

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