लालू के नाम उनकी गलतियों को लेकर एक पाती

(यह पत्र बिहार के ही एक व्यक्ति ने लिखा है, इस शर्त पर कि उनका नाम प्रकाशित न करूं। चूंकि लालू प्रसाद बिहार की जनता से खुद पूछ रहे हैं कि उन्होंने क्या गलती की थी। उम्मीद है गुमनाम व्यक्ति के इस खत को पढ़कर लालू प्रसाद की नजरों में उनकी गलतियां आये। कांट्टेस् बाक्स में भी लालू की गलतियों की ओर  लिखकर उनकी जानकारी में इजाफा कर सकते हैं। )

आदरणीय लालू जी

आप जानना चाहते हैं कि आपने क्या गलतियां की। बेशक आपके दल का कोई भी कार्यकर्ता आपको यह नहीं बताएगा कि आपसे क्या चूक हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि आप किसी को बोलने ही नहीं देते हैं अपने सामने। यही वजह है कि आप कब लोगों से दूर हो गये आपको पता भी नहीं चला। कुछ लोग जिन्हें आपसे फायदा लेना था आपके कान में फुसफुसाते रहे और आप लोगों से दूर होते चले गये। आप जेपी मूवमेंट की उपज थे। इंदिरा गांधी के खिलाफ आपकी राजनीतिक शैली चमककर सामने आयी थी। आपको समझना चाहिये था कि इंदिरा गांधी भी उस दौर में वही गलती कर रही थी जो आपने किया है। बस कुछ लोगों के सुनती थी और अपने मन का करती थी।

आपको अच्छी तरह से याद होना चाहिये कि आपकी एक आवाज पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था। उन दिनों आरक्षण के मसले ने समाज को सीधे तौर पर दो भागों में विभाजित कर दिया था। और आप एक तबके के धाकड़ नेता बनकर उभरे थे। अगड़ी जाति के प्रति आपके शब्द बिष में बुझे हुये से लगते थे। नफरत के आधार पर आप समाज को गोलबंद करके राजनीतिक सत्ता पर अपनी मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश करते रहे और इसमें आप सफल भी हुये। लेकिन जिन लोगों को आपने गोलबंद किया उनके कल्याण की तरफ आपने तनिक भी ध्यान नहीं दिया। आपके दल के कार्यकर्ता और नेता बेलगाम होते गये। राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल नोट बनाने के लिए करने लगे। यहां तक उनलोगों को भी नहीं छोड़ा गया जो आपके समर्थक थे, जो आपको एक क्रांतिवीर के तौर देखते थे। आपके दल का हर कार्यकर्ता लोगों को गुंडा लगने लगा, और आप गुंडों के सरताज। आपके इस नये स्वरूप के सामने आपकी जननेता की छवि धूमिल होती चली गई। रहा सहा कलक आपके सालों ने पूरा कर दिया।

आपके दोनों साले सुभाष और साधू राज्य में बेलगाम सांड की तरह हथियारबंद गिरोह के सरगना के रूप मे नजर आने लगे। इन दोनों ने चारो तरफ खौफ का माहौल खड़ा कर दिया और आप इन गिरोहों के बीच में एक दानव के रूप में नजर आने लगे। आप माने या ना माने लेकिन आपकी छवि एक दानव की बनने लगी।

सत्ता पर काबिज होने के लिए कोई भी साधन का इस्तेमाल किया जा सकता है, सत्ता में आने के लिए आपने इसी सिद्धांत का पालन किया। बेशक आपको मैकियावेली के प्रिंस से सबक लेना चाहिये था। मैकियावेली ऐसे प्रिंस के लिए जो क्रूर संसाधनों का इस्तेमाल करके सत्ता में आता है सलाह देता है कि सत्ता पर काबिज होने के के बाद उसे छवि सुधारने के लिए जनहित के कार्यों की ओर पूरा ध्यान देना चाहिये। आप तो डेमोक्रेटिक तरीके से सत्ता में आये थे, फिर भी आप चूक गये। देखते देखते आप जनता को राक्षस नजर आने लगे।

अपनी निरक्षर पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री के पद पर बैठाकर आपने अपने जीवन की सबसे बड़ी  राजनीतिक भूल की। कभी आप कांग्रेस के परिवारवाद के खिलाफ जोर शोर से आवाज बुलंद करते थे, लोग आपकी बातों को सुनकर तालियां बजाते थे और कांग्रेस के परिवारवाद को देश में नेस्तनाबूत करने की भावना से ओत प्रोत हो जाते थे। लेकिन अचानक राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाकर आपने भी वही किया, जो कांग्रेस करती आ रही थी। सत्ता पर तो आपकी पकड़ बनी रही, लेकिन आपके दल के अंदर ही असंतोष की एक तेज लहर दौड़ी, पर आपके बगलगीरों ने उस लहर का अहसास आपको नहीं होने दिया। आप किसे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे थे?

भारत के सेक्यूलर शासक अकबर समय रहते ही यह समझ चुका था कि प्रजा की भलाई के लिए उसका किचेन कैबिनेट के प्रभाव से बाहर निकलना जरूरी है। बिहार में माई (मुस्लिम प्लस यादव) को आधार बनाकर अपनी राजनीतिक नींव मजबूत करने के बावजूद आपकी समझ में यह बात नहीं आई और आपने राबड़ी देवी को सत्ता की लगाम थमा दी। क्या आपके दल में योग्य नेताओं का अभाव था? या फिर आपको अपने दल के अन्य किसी नेता पर यकीन नहीं था ? कारण चाहे जो भी हो आपके विचार और आपकी विश्वसनीयता दोनों को बिहार की जनता संदेह की नजरों से देखने लगी। आपको समझना चाहिये कि दुनिया का कोई भी साम्राज्य एक दिन में नहीं लड़खड़ाता है। इसमें कोई शक नहीं है कि आपने एक बेहतर साम्राज्य खड़ा किया। मनोवैज्ञानिक तौर पर गरीब गुरबों को राजनीतिक शक्ति का अहसास कराया। लेकिन खुद की गलतियों की वजह से सारा साम्राज्य तिनके की तरह बिखर गया।

बिहार में गरीबी कोढ़ की तरह चिपकी रही और आप अपनी बेटियों की शादी आलिशान तरीके से करते रहे। कारों का कारवां लगाते, और पानी की तरह पैसे को बहाते रहे। आपके जेहन में यह बात क्यों नहीं आयी कि आप गरीबों के नेता हैं, और इस तरह से खर्चीले अंदाज में अपनी बेटियों की शादी करके कहीं न कहीं आप गरीबों से कटेंगे ही। आपने पिता का फर्ज तो बेहतर तरीके से निभाया, लेकिन आवाम के पिता नहीं बन सके। आप एक राजा के तौर तरीकों को अपनाते चले गये और इसका गुमान तक आपको नहीं हुआ।

ब्यूरोक्रेसी को भी आपने बुरी तरह से कुचला। आपकी देखा देखी आपके सालों ने भी ब्यूरोक्रेसी की पैंट उतारने में कोई कोताही नहीं बरती। सरेआम किसी भी अधिकारी को गाली देना आम बात हो गई थी। ब्यूरोक्रेट की मानसिकता आपके शासन में चल रही नंगई से अपने आप को बचाने तक सीमित हो गया था। लूट-खसोट, डकैती और उगाही जोर शोर से चलती रही। अपरहण भी कमाई का एक जरिया बन गया। भले ही अपहरण का धंधा बेतरतीब ढंग से चल रहा था लेकिन लोगों के बीच में मैसेज यही गया कि इस धंधे का तार कहीं न कहीं आपके किचेन कैबिनेट से जुड़ा है।

रामविलास पासवान से हाथ मिलाना भी एक राजनीतिक भूल ही है जो अभी आपको समझ में नहीं आ रहा है। आप दोनों की दोस्ती को सांपनाथ और नागनाथ की दोस्ती के रूप में देखा जाता है, जो बिहार की जनता को डसने के लिए बैठे हैं। मौकापरस्ती की इस दोस्ती को बिहार की जनता अच्छी तरह से समझ चुकी है। आपकी एक और भूल रही चुनाव के अंतिम पहर में अपने बेटे तेज प्रताप को राजनीति में लाना। आपकी गलतियों को लिखने के लिए एक ग्रंथ भी कम पड़ेगा। इन गलतियों को आप को खुद ही समझ लेना चाहिये था। बेहतर होता आप बिहार की जनता से ये पूछते कि अब आप को क्या करना चाहिये। इस सच्चाई को आप स्वीकार कर लीजिये कि आपके नेतृत्व में अब राजद आगे नहीं बढ़ेगा। बेहतर यही होगा कि नये नेतृत्व को नये एजेंडो के साथ आगे आने दीजिये, जो वाकई में बिहार को एक चमकते हुये राज्य के रूप में तब्दील करने का हामी हो। संक्रमण काल के इस दौर में विपक्ष की जिम्मेदारी सत्तापक्ष से कहीं ज्यादा है। उम्मीद है इस पत्र पर खुले दिमाग से विचार करेंगे, आगे आपकी मर्जी।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to लालू के नाम उनकी गलतियों को लेकर एक पाती

  1. यह पत्र निश्चय ही सब कुछ सही बयान करता है लेकिन मुझे ऐसा लगता है किसी नीतीश-प्रेमी ने लिखा है। ये सारे गुण नीतीश में भी हैं, एक भी अपवाद नहीं। अपहरण पर साहब, इसी साइट पर एक लेख लिखा था, पढ़ लिया जाय। लालू की तानाशाही के समय बौराये और नशे में धुत्त नीतीश नहीं दिखते? जो 200 से अधिक सीट जीतकर तानाशाह बन गए हैं और कोई खिलाफ़ में बोले तो सीधे बाहर। शिक्षा के क्षेत्र में रद्दी से रद्दी प्रयोग जो हो सकता है वह बिहार में नीतीश के द्वारा किया जा रहा है। लगता है सारे सड़े-गले घटिया व्यवस्था-ग्रन्थ इन्हीं के हाथ पड़ गए हैं। यह तो है ही कि लालू इतिहास में अपना नाम चमका सकते थे लेकिन लालची किस्म के लोगों को यह थोड़े ही दिखता है।

  2. अंतत: बॉल तो जनता के ही पाले में आनी है…

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