बिहार में मीडिया नियंत्रित, नौकरशाह बेलगाम

मंच को संचालित करने की जिम्मेदारी रंगकर्मी, एक्टिविस्ट, प्रोफेसर एवं पत्रकार ध्रुव कुमार को मिली थी और माइक संभालते ही उन्होंने संयम के साथ भूमिका तैयार कर दी। बिहार में बदलाव की रट हर जगह सुनाई दे रही है और एक लंबे अरसे से सुनाई दे रही है। नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (इंडिया) बिहार और नाइटशेड मीडिया प्रोडक्शन प्राइवेट लिमिटेड की ओर से पटना के तारामंडल के आडिटोरियम में आयोजित सेमिनार का विषय था “कितना बदला बिहार”। कुछ फार्मलिटी करने में जैसे सेमिनार में आमंत्रित वक्ताओं को गुलदस्ता प्रदान करने, सम्मान के प्रतीक के तौर पर उनके कंधे पर शाल रखने और द्वीप प्रज्जवलित करने में थोड़ा बोरिंग वक्त जरूर निकला, हालांकि इसके लिए ध्रुव कुमार ने पहले ही कह दिया था कि ये फार्मेलिटी हमारे लिए जरूरी है, जिसे करना ही था।

कितना बदला बिहार..?  मंच पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा यह वाक्य पहली नजर में मुझे थोड़ा इनकम्पलीट लगा। सीधी सी बात है बदलाव सापेक्ष नहीं हो सकता, बदलाव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता है। जब बदलाव की बात होगी तो किसी खास काल खंड की बात होगी, और फिर उस खास काल खंड की तुलना किसी अन्य काल खंड से होगी। बदलाव के साथ आइंस्टिन की सापेक्षता का सिद्धांत काम करता है। बाद में कई वक्ताओं ने इस पहलू को मजबूती से उकेरा, और धीरे-धीरे जेहन में बहुत कुछ साफ होने लगा।

बहरहाल ध्रुव कुमार ने सीधे और सपाट शब्दों में सहजता के साथ परिचर्चा की जमीन तैयार कर दी थी। मौजूद वक्ताओं का परिचय भी वे पूरी मजबूती से दे रहे थे। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि उन्होंने माहौल बना दिया था। उन्होंने सबसे पहले हमार टीवी के अगुआ राकेश प्रवीर को आमंत्रित किया। ध्रुव कुमार की तुलना में राकेश प्रवीर कुछ ज्यादा प्रखर नजर आये। कितना बदला बिहार से संबंधित हर पहलु को उन्होंने छूते हुये यहां तक कहा कि यदि बिहार में बदलाव नहीं हुआ है तो इसे बदलने के लिए क्या-क्या किया जा सकता है। वहां मौजूद तमाम वक्ताओं से वे आग्रह करते हुये नजर आये कि वे खुलकर अपनी बातों को रखें ताकि बिहार को सही दिशा में ले जाने में सहूलियत हो। राकेश प्रवीर ने बड़े सलीके से कितना बदला बिहार विषय के फलक को सही मायने में पूर्ण रूप में विस्तारित कर दिया। शायद यही वजह रहा कि बाद के कई वक्ता यह बोलने पर मजबूर हो गये कि वे यहां बोलने के लिए कुछ और सोच कर आये थे लेकिन अब उन्हें कुछ और बोलना पड़ रहा है। ध्रुव कुमार ने जहां भूमिका तैयार की वहीं राकेश प्रवीर ने माहौल को पूरी तरह से खोल दिया।

नाईटशेड के निदेशक प्रभात रंजन ने सभी वक्ताओं और सभागार में मौजूद श्रोताओं का स्वागत करते हुये विषय को कुछ और विस्तारित किया। बिहार में एक गंभीर मुद्दे पर विमर्श की परंपरा की शुरुआत करने का सुकून उनके चेहरे पर साफतौर से झलक रहा था। इस बहादुरी के लिए बाद के वक्ताओं ने भी उनकी काफी तारीफ की और ऐसे बहस को जारी रखने का अनुरोध भी किया।

इसके बाद बिहार न्यूज डाट काम के संपादक अजय कुमार ने बिहार से संबंधित कुछ रोचक  तथ्य रखकर विमर्श की दिशा को एक नई रोशनी प्रदान की। उन्होंने कई संस्थाओं के शोध पत्र का हवाला देते हुये कहा कि बिहार के ग्रामीण इलाके देश में सबसे अधिक महंगाई वाले इलाकों में शुमार हो रहे हैं। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के मामले में भी बिहार के ग्रामीण इलाके देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अव्वल में हैं। ऐसे बिहार कितना बदला है सोचने की बात है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के ग्रामीण इलाके कुपोषण के शिकार हैं। शिक्षा की रोशनी सही मायने में अभी भी बिहार से दूर है। चलताऊ मीडिया पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हुये उन्होंने वैकल्पिक मीडिया पर जोर दिया, जो बिहार की सही तस्वीर पेश करने में सक्षम हो सकते हैं। बिहार सरकार बिहार को 2015 तक विकसित राज्य बनाने का दावा कर रही है। पटना का उदाहरण देते हुये उन्होंने कहा कि विकास की जो तस्वीर पटना में दिख रही है उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि 2015 तक यहां पर पैर रखना भी मुश्किल होगा। रियल स्टेट के धंधे में जोरदार उछाल आया है, यहां अपार्टमेंट में बिकने वाली फ्लैटों की कीमत मुंबई और दिल्ली से कम नहीं है। यदि यही हाल रहा तो पटना से बुद्धिजीवी तबके का सफाया हो जाएगा। यह एक गंभीर मसला है जिस पर सोचने की जरूरत है।

विमर्श को आगे बढ़ाते हुये भाजपा नेता रवि शंकर की पत्नी प्रोफेसर माया शंकर ने कहा कि आज भी बिहार बाढ़ की विभिषिका झेलने के लिए अभिशप्त है। बिजली की स्थिति यहां पर काफी दयनीय है। ऐसे में यह बेहतर होगा कि केंद्र सरकार नेपाल के साथ समझौता करे और नदियों से निकलने वाले पानी से बिजली बनाने की दिशा में आगे बढ़े। व्यवहारिक तौर पर यह संभव है। चूंकि नेपाल के पास मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी है। ऐसे में बिहार को पहल करनी चाहिये। केंद्र सरकार को विश्वास में लेकर नेपाल के साथ पीपीपी के तर्ज पर काम किया जा सकता है। उन्होंने बिहार को आर्थिक रूप से मजबूत करने के लिए एग्रोइंडस्ट्री पर भी खासा जोर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि जिस तरह से बिहार सरकार

एक के बाद योजनाएं बनाएं रही हैं और उनकी घोषणा कर रही है उससे लिए धन की आवश्यकता है। ऐसे में यह जरूरी है कि इन योजनाओं को सुचारू रुप से चलाने के लिए अर्थपरक योजनाएं बनाई जाये।

तिलका मांझी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डा. विजय ने कितना बदला बिहार विषय को समय के फ्रेम में बांधने की वकालत की और इस विषय से अपनी असहमति खुल कर जाहिर की। उन्होंने जोर देते हुये कहा कि यहां के शहरों के बारे में तो मैं कुछ नहीं बता पाऊंगा लेकिन जहां तक बिहार के गांवों की बात है तो तस्वीर बद से बदतर ही हुई है। ग्रामीण इलाकों में लोगों के भोजन में से पौष्टिक तत्वों का अभाव तेजी होता जा रहा है। रोजगार का अभाव है। ग्रामीण आबादी और भी गरीब होती जा रही है। बिहार ने हर 30 साल पर परिवर्तन की अंगड़ाई ली है। बिहार में सामाजिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है। लेकिन यह परिवर्तन इसी सरकार की देन है कह पाना मुश्किल है।आरक्षण के मसले को लेकर बिहार का समाज आंदोलित हुआ था। पिछड़े, दलितों और महिलाओं में एक जागृति आई थी। अब समाज थोड़ा स्थिर हो रहा है, लेकिन गरीबी आज भी बिहार को जकड़े हुये है। सरकार बदलाव को भ्रमित करने का काम करती है।

सी प्लस 36 के एडिटर इन चीफ रितेश ने कहा कि वह बिहार को अब तक दूर से ही समझते रहे हैं। दूर बैठकर ऐसा लगता है कि बिहार में बदलाव हुआ है, लेकिन इस सभागार में तमाम वक्ताओं को सुनने के बाद उनका ख्याल बदल रहा है। बिहार के ब्रांड इमेज पर काफी काम किया गया है, लेकिन हकीकत कुछ और नजर आ रही है। दूसरे राज्यों में काम कर रहे बिहार के मजदूरों की प्रसंशा   खास अंदाज में करते हुये उन्होंने कहा कि बिहार का मजदूर खासकर जो कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में लगे हुये हैं काफी कुशल है। समय से अधिक काम करने के बावजूद वे ओवर टाइम की मांग नहीं करते हैं।

चन्द्रमुखी ने कहा कि बिहार बदला है। खासकर महिलाओं में एक नई जागृति आई है। अब ग्रामीण इलाके की महिलाएं भी आरटीआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से कर रही हैं और सरकारी दफ्तरों में दबे अपने कागजातें के बारे में जानकारी मांग रही हैं।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष गोपाल नारायण सिंह इस मौके पर अपने आप को भावुक होने से नहीं रोक सके। उन्होंने जोर देते हुये कहा कि आज मैं जो कुछ बोलूंगा वह एक नेता की हैसियत से नहीं बल्कि एक आम बिहारी की हैसियत से बोलूंगा। बिहार की राजनीतिक संस्कृति में बदलाव  आया है। अब उन्हीं लोगों को नुमाइंदगी दी जा रही जो नेता के पीछे चले। बिहार में विधायिका का स्तर काफी गिर गया है। बिहार में यह बदलाव हुआ है। विधान सभा में सिर्फ हल्ला होता है बहस नहीं। लोग इसलिए विधायक बनना चाहते हैं ताकि उन्हें सुख सुविधा मिले। बिहार के बारे में कोई नहीं सोंचता सब अपने व्यक्तिगत हित का ही ख्याल रखते हैं। मीडिया नियंत्रित है और नौकरशाही बेलगाम। पहले बिहार खुला था, लोग स्वतंत्र तरीके से सोचते थे, लेकिन अब नई रोशनी के लिए दरवाजा पूरी तरह से बंद हो चुका है। बिहार कितना बदला है जैसे विषय को उठाने के लिए उन्होंने आयोजकों को बधाई दी और साथ ही यह भी कहा कि विमर्श का यह सिलसिला आगे भी जारी रहनी चाहिये। नई रोशनी देने का काम बुद्धिजीवियों का है, स्वतंत्र होकर उन्हें अपनी भूमिका स्वीकारनी चाहिये और सरकार में भी अपनी आलोचनाओं को सुनने की कुव्वत होनी चाहिये। तभी बिहार में सही मायने में बदलाव आएगा। फिलहाल बिहार में मीडिया की जो तस्वीर है उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि मीडिया पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हां ने कहा कि अभी हाल में औरंगाबाद में एक परिवार के सारे सदस्यों ने सिर्फ इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि इंदिरा आवास के लिए उनके नाम पर किसी ने लोन ले लिया था। यह रकम महज 20 हजार थी। महज 20 हजार के लिए एक पूरा परिवार स्वाहा हो गया। यह है बिहार की असली तस्वीर। मीडिया भी इन खबरों को दबाने में लगा हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि अभी अभी मेरे मोबाइल पर एक मैसेज आया है। नेहा नाम की एक लड़की का, क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगे। लगभग सभी अखबारों में ब्यूटी पार्लर, मसाज सेंटर, फ्रेंडशिप सेंटर के विज्ञापन छपे होते हैं। यह सीधे तौर पर वेश्यावृति के विज्ञापन होते हैं। यह है बिहार का बदलाव।

पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मंशा को तो पाक साफ करार दिया लेकिन यहां की ब्यूरोक्रेसी पर उंगली उठाते नजर आये। उन्होंने कहा कि सबकुछ ब्यूरोक्रेट के हाथों में सिमट गया है, ऐसे में सरकार की जन कल्याणकारी योजनाएं जमीन पर नहीं उतर पा रही है।

आर के विकास का समापन भाषण बहका हुआ सा लगा। बोलने के क्रम में वह विषय से बार बार भटक रहे थे। हालांकि वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद दत्त ने अंत में सबको सलीके से धन्यवाद पेश करके इस विमर्श की संजीदगी एक बार फिर से बहाल कर दी।

 

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One Response to बिहार में मीडिया नियंत्रित, नौकरशाह बेलगाम

  1. अच्छी रिपोर्ट। वह संदेश तो आता है ही लेकिन उसका बिहार से क्या संबंध? कुछ हुआ नहीं वहाँ, बस भाषणबाजी ही हुई? वैसे फिर कुछ कहता हूँ इस पर।

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