तेरी रहनुमाई पर सवाल है (नज्म)

मुल्क तो आजाद है

मगर घर कहां आबाद है?

धुआं-धुआं है जिंदगी

हर तरफ बस आग है।

जल रही हैं ख्वाहिशें

लपटों में आसमान है

हवाओं की क्या बात करें

वो तो हर तरफ से खिलाफ है

सियासत की बिसात पर

यहां बिछा हर एक इंसान है

दुश्वारियों के इस दौर में

हैरान है, परेशान है-

कुछ कर गुजरने की जिद में

जिस डगर पर कदम बढ़े थे कभी

उस डगर पे ही अब सवाल है
तेरी महाजबानी कुबूल थी

सजदे में थे सब खड़े हुये

अब डुबी पड़ी हैं किश्तियां

तेरी रहनुमाई पर ही सवाल है।

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One Response to तेरी रहनुमाई पर सवाल है (नज्म)

  1. तू इधर उधर की न बात कर ये बता की काफिले क्यों लूटे
    मुझे रहजनी का गम नहीं, तेरी रहबरी का सवाल हैं।
    मैं बताऊँ कि काफिले क्यों लूटे, तेरा रहजनो से था वास्ता
    मुझे रहजनो से गिला नहीं, तेरी रहबरी पे मलाल है।।

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