डोंट शूट मी , … और मारा गया गद्दाफी

चार दशकों मे भी अधिक समय से लीबिया की सत्ता पर काबिज रहे तानाशाह कर्नल मुअम्मर गद्दाफी का अपने गृह नगर सिर्ते में नाटो के हमले में अंत हो गया । इसी सिर्ते शहर में जन्म लेने और अपना बचपन गुजारने वाले कर्नल गद्दाफी को मौत भी यहीं मिली । महज 27 वर्ष की उम्र में 1969 से लीबिया की सत्ता पर काबिज कर्नल गद्दाफी ने करीब बयालीस बर्षों तक तानाशाही से लीबिया और उसकी जनता पर शासन किया । क्रांतिकारी सुधारक के रुप में लीबिया को राजशाही से मुक्ति दिलाने का दावा कर सत्ता में आने वाले कर्नल गद्दाफी स्वयं एक तानाशाह बन  गये । शुरुआत में एक सुधारक के रुप में उन्होंने लीबिया को तेल कंपनियों के माध्यम से काफी फायदा पहुँचाया और बहुत हद तक लीबिया की तकदीर बदल कर रख दी । इसी तेल से मिली अकूत संपत्ति ने कर्नल गद्दाफी और उसके परिवार को भी काफी अमीर बना दिया । कहते हैं सत्ता और संपत्ति का नशा जब सर चढ़कर बोलता है तो किसी भी शासक को उसकी तानाशाही से नहीं रोका जा सकता । क्योंकि तब सत्ता जाने का भय उसे तानाशाह बना ही देता है । कर्नल गद्दाफी के तानाशाही रवैये और विश्व पटल पर दूसरे देशों की बदलती स्थिति ने लीबिया की जनता को निराश करना शुरु कर दिया । इसी निराशा और हताशा की कोख से विद्रोह ने जन्म लिया । जिसकी परिणति के रुप में कर्नल गद्दाफी से मुक्ति की विवशता थी । साल 11 के फरवरी महीने से लीबिया में गद्दाफी की दमनकारी नीति और क्रूरता से आजिज आयी जनता ने विद्रोह का विगुल फूक दिया । कर्नल गद्दाफी की गलत कूटनीतिक कौशल और राज करने के तानाशाही अंदाज ने वहां की जनता खासकर युवाओं और छात्रों को अत्यंत खिलाफ कर दिया । कर्नल गद्दाफी छात्रों को अपनी राजनीतिक विशेषतायें पढ़ने के लिये विवश करता था , तथा जब कभी उसे किसी राजनीतिक विद्रोह का अंदेशा होता वह उसे बेरहमी से कुचलने की कोशिश करता । इसमें निर्दयता पूर्वक विद्रोही की हत्या भी शामिल होती थी । और उसकी इस क्रूर नीति ने विद्रोहियों को उर्जा प्रदान किया । इस सबके बावजूद गद्दाफी ने अपनी सैन्य और दमनकारी नीति से इस विद्रोह को कुचलने का अपना प्रयास आखिरी दम तक जारी रखा । बर्बरता से अपने आंदोलन को कुचलने वाले कर्नल गद्दाफी और उसके परिवार को इस बात का अंदेशा था कि वे पकड़े जाने पर विद्रोहियों के हाथो मारे जा सकते हैं । इसलिये उसकी पत्नी और दो बेटों ने लीबिया से पहले ही भागकर अल्जीरिया में शरण ले रखी थी । फिर भी उसकी दिलेरी और उम्मीद ने उसे आखिरी दम तक लीबिया न छोड़ने के उसके प्रण पर कायम रखा । सूत्रों की माने तो अपने आखिरी दम में यह तानाशाह घायलावस्था में भी अपनी जान की भीख मांग कर कायरता पूर्वक मौत के अंजाम तक पहुंचा । कर्नल गद्दाफी की मौत पर पश्चिमी देशों की खुशी का इजहार भी अलग अलग बयानों में जारी हुआ है । लगभग सभी देशों ने तानाशाही और निरंकुशता के अंत पर संतोष व्यक्त कर यह उम्मीद जतायी है कि अब वहां सिरे से लोकतंत्र को कायम किया जा सकता है । भारत ने भी लीबिया के नवनिर्माण में सहयोग की बात कही है । उम्मीद जतायी है कि जल्द ही वहां राजनीतिक स्थिरता कायम हो जायेगी और उसमें भारत हर संभव मदद देगा ।

बहरहाल पिछले आठ महीनों से लीबिया में चले इस विद्रोह की आगाज ने निरंकुश और तानाशाही के  प्रतीक बने कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की मौत और सिर्ते पर फतह के साथ इसे अंजाम तक पहुंचा कर लीबिया की जनता के एक कठिन दौर का अंत अवश्य कर दिया है । क्रांति के मार्गदर्शक बनने की चाहत रखने वाले कर्नल गद्दाफी की निरंकुशता के खात्में के साथ ही लीबिया के इतिहास के इस लंबे एवं दुखद अध्याय की समाप्ति ने वहां लोकतांत्रिक भविष्य का रास्ता खोल दिया है।

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2 Responses to डोंट शूट मी , … और मारा गया गद्दाफी

  1. गद्दाफी का मरना अमेरिकी साम्राज्यवाद का एक कदम है, इसे ऐसे लेने की जरूरत नहीं है…अमेरिका जिसे चाहे उसे तानाशाह कहकर काम बना लेता है…

  2. आपने शायद गद्दाफ़ी के बारे में अध्ययन नही किया है । मैम उस पर काम कर रहा हूं । एक शब्द में कह सकता हू। काश भारत में भी कोई गद्दाफ़ी होता ।

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