किरण का किराया-बचत भ्रष्टाचार नहीं, जनसेवा है।

(मटुक नाथ चौधरी )

{ नोट ः- मैंने यह लेख किरण बेदी के समर्थन में लिखा है। उस किरण के समर्थन में जिन्होंने कहा था कि ( 1 ) मैं अपने होस्ट से जो बिजनेस क्लास का किराया लेकर इकोनॉमी क्लास में सफर करती हूँ , उसकी जानकारी उन्हें दे देती हूँ। ( 2 ) मैं पैसे की बचत कर उसे अपनी संस्था में लगाती हूँ जो जरूरतमंदों की भलाई के लिए है। ( 3 ) मैं कई बार गरीब संस्था के आमंत्रण पर अपनी संस्था के पैसे से यात्रा करती हूँ।

यह लेख मैंने परसों लिखा था। कम्पोज होने के बाद इसे पोस्ट करने वाला ही था कि एक नयी खबर आ गयी- ‘‘ किरण बेदी संस्थाओं को पैसा लौटाने के लिए तैयार।’’ इस खबर ने मुझे सन्न कर दिया। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं क्या वह अपराध बोध से ग्रसित हैं ? क्या उन्हें लगता है कि उन्होंने किसी को अंधेरे में रखकर काम किया है ? नहीं मालूम बात क्या है ? मैंने तो अपनी सीधाई के कारण उनकी बातों को सीधा ही समझा और पूर्ण विश्वास किया।

इसके बावजूद इस लेख का महत्व बरकरार है, क्योंकि यह पहले की किरण पर आधारित है और इसमें तथ्य को देखने की मूलभूत दृष्टि है जो वास्तविकता पर आधारित है, चली आ रही मान्यता और तकनीकी कारणों पर नहीं। इसलिए इसे विचारार्थ पोस्ट कर रहा हूँ। }

                        किरण बेदी के द्वारा हवाई यात्रा खर्च का पैसा बचाकर अपने संगठन में लगाना भ्रष्टाचार नहीं, समाज सेवा है। अगर जनकल्याण के निमित्त रखे धन का उपयोग अपनी सुविधा के लिए किया जाय तो वह भ्रष्टाचार है, इसके ठीक विपरीत अपनी सुविधा में खर्च के लिए मिले पैसे को बचाकर जनकल्याण में लगाना जनसेवा है। अगर किरणजी अपने संगठन के पैसे का दुरुपयोग करतीं, तब वह भ्रष्टाचार कहलाता। लेकिन उनके भ्रष्टाचार की खोज करने वाले ऐसा अभी तक नहीं खोज पाये हैं।

किरण बेदी को जो वीरता पुरस्कार मिला है, वह उनकी कमाई है, वह उनकी सेवा का प्रतिफल है। उनके कर्म कौशल, लगन, निष्ठा और ईमानदारी की देन है। हवाई यात्रा में पचहत्तर फीसदी की छूट उनका अर्जन है। कोई उनको बिजनेस क्लास में यात्रा के लिए पैसे देता है, तो यह भी उनकी अपनी कमाई है। यह उन पर निर्भर करता है कि वह उसी क्लास में सफर कर उस पैसे को व्यर्थ में गँवा दे या उसे अपने एनजीओ में लगा दे। इस पर किसी को उँगली उठाने का कोई हक नहीं है। उनके विरोधियों का तर्क है कि अगर आप डकैती करके पैसा लाते हैं और उससे जनकल्याण करते हैं तो इससे डकैती को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन डकैती से इसका साम्य दिखलाना सरासर गलत है; क्योंकि डकैती में किसी की इच्छा के विरुद्ध जबर्दस्ती उसका धन छीना जाता है और विरोध करने पर हत्या तक कर दी जाती है। यहाँ किरणजी को लोग स्वेच्छा से किराया दे रहे हैं। उन्होंने किसी से कुछ उसकी इच्छा के विरुद्ध छीना नहीं। लोग आह्लाद से देते हैं। उन्हें बुलाकर गौरवान्वित और लाभान्वित होते हैं। इसे डकैती कहने से यही सिद्ध होता है कि विरोधियों के पास उचित तर्क नहीं है।

प्रश्न उठता है किरण बेदी, अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल आदि के भ्रष्टाचार के उद्घाटन के लिए अनुसंधानकत्र्ता अचानक क्यों तत्पर हो गये हैं ? उनका उद्देश्य क्या है ? उनका उद्देश्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को तोड़ना है जो अपने आप में सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए आप जो भी करते हैं वह भ्रष्टाचार का समर्थन है। ऐसे लोगों के आरोपों को अगर सच भी मान लिया जाय तो क्या यह निष्कर्ष उचित है कि किसी खराब आदमी को अच्छा काम करने का अधिकार नहीं है ? कांग्रेस प्रवक्ता राशिद अल्वी ने अपने बयान में अपने नेक इरादे स्पष्ट कर दिये हैं ! उनका कहना है कि भ्रष्टाचार का विरोध करने वाले पहले अपने दामन को पाक साफ कर लें तब भ्रष्टाचार का विरोध करें। इसके पहले उन्हें भ्रष्टाचार का विरोध करने का हक नहीं है। वर्तमान केन्द्र सरकार के छिपे और खुले घोटालों का अंतहीन सिलसिला देखकर यही कहा जा सकता है कि यह अब तक की भ्रष्टतम सरकार है। क्या इस भ्रष्ट सरकार को इसी आधार पर भ्रष्टाचार का विरोध करने का अधिकार नहीं है ? क्या इसी कारण से केन्द्र सरकार भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने का अधिकार खो बैठी है ? अगर आपका मोटिव शुभ है तो भ्रष्टाचारविरोधी आंदोलन का वर्तमान देखें। वर्तमान अगर सही है, तो सब सही है। भ्रष्टाचारियों के द्वारा आंदोलनकारियों का अतीत कुरेदना सिर्फ यही बतलाता है कि उनको वर्तमान आंदोलन में कोई दोष नहीं मिला।

दूसरी दृष्टि से भी इसे देखा जा सकता है। इस संसार में क्या कोई ऐसा व्यक्ति मिल सकता है, जिसके जीवन में छोटा-सा भी गलत काम न हुआ हो ? क्या हमारे भगवान राम और कृष्ण भी ऐसा दावा कर सकते हैं ? क्या बुद्ध और महावीर दावा कर सकते हैं ? क्या गाँधी, भगत सिंह, सुभाष, लोहिया, जयप्रकाश ऐसा दावा कर सकते हैं ? जाहिर है, कोई नहीं कर सकता। सबके जीवन में कुछ न कुछ भूलें मिलती हैं। तो क्या उन भूलों को आधार बनाकर कहा जा सकता है कि उनको भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करना चाहिए ? जो ऐसा कहता है, वह साक्षात् जनता का दुश्मन है। उसे पकड़ कर समझाना चाहिए। न समझे तो जनता को उसके विरुद्ध खड़ा कर देना चाहिए। उसे दुबारा कभी भी जनप्रतिनिधि नहीं होने देना चाहिए। अगर कोई पार्टी ऐसे लोगों को टिकट दे तो उसे चुनाव में हरा

देना चाहिए और अगर कोई पार्टी ही ऐसा करे तो उसे भी हराने के लिए जनता के पास जाना चाहिए।

बड़े मजे की बात है कि एक चैनल पर मैंने देखा बहस के दौरान एक आयकर उच्चाधिकारी कह रहे थे कि चुनाव कानून के अनुसार आप किसी उम्मीदवार का समर्थन तो कर सकते हैं, विरोध नहीं कर सकते। ऐसा अगर करते हैं तो एक साल की सजा का प्रावधान है। मेरे ख्याल से ऐसा नियम होना नहीं चाहिए। अगर वास्तव में ऐसा नियम है तो यह जनतंत्र की भावना के विरुद्ध है। लोकतंत्र में किसी भी गलत आदमी को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है। उसके विरुद्ध प्रचार कर उसको हराया जा सकता है। और अगर जनता को ऐसे उम्मीदवार या पार्टी का विरोध करने का अधिकार नहीं है तो वह लोकतंत्र नहीं ! इसलिए वास्तविक लोकतंत्र लाने के लिए लड़ाई और तेज की जानी चाहिए। क्रांतिकारी शायर फैज की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं-

                                                 रक्शेमय तेज करो साज की लय तेज करो

                                                 सूए मैखाना सफीराने हरम आते हैं।

यहाँ तकनीकी कारणों से किरणजी को दोषी ठहराया जा रहा है। विरोधियों का कहना है कि अगर किराया के नाम से पैसा लिया जाता है तो उसे खर्च किया जाना चाहिए अगर उतना खर्च नहीं किया जाता है तो उससे ज्यादा लेना अनुचित है। वे यह भी कह सकते हैं कि अगर आपको संस्था के लिए धन इकट्ठा करना है तो चंदा के रूप में लंे। लेकिन यहाँ सोचने योग्य बात है कि किसी के लिए तकनीकी कारणों से किराया देना ही आसान हो सकता है, चंदा देना कठिन। इसलिए अगर किराये के रूप में ही चंदा आ जाय तो कोई बुराई नहीं है। बुराई सिर्फ इस धन का दुरुपयोग करने में है। भ्रष्टाचार दूर करने के लिए जो लोग गंभीर होंगे, वे भ्रष्टाचार के वास्तविक कारण की खोज करेंगे और उसे दूर करने के उपाय समझायेंगे। वे सिर्फ यह कहकर नहीं रह जायेंगे कि जो खुद भ्रष्टाचारी है , उन्हें भ्रष्टाचार का विरोध करने का हक नहीं। तकनीकी कारण वास्तविक कारण के समर्थन में होना चाहिए, विरोध में नहीं। सरकारी छूट का लाभ उठाकर धनी मानी होस्ट का पैसा बचाना क्या उचित होगा ? इसलिए मेरे देखे किरण जी की किराया-बचत भ्रष्टाचार नहीं, जनसेवा है।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to किरण का किराया-बचत भ्रष्टाचार नहीं, जनसेवा है।

  1. Dr M Faiyazuddin says:

    The corruption in government cannot be compred to that of Kiran bedi’s petty air fare. It is ridiculous on the part of the government. Kiran Bedi has the gutts to accept it. Can the leaders of India accept their wrongdoings like that of Kiran Bedi?

  2. यह कोई तर्क नहीं कि, कोई कहे कि आप चोर हैं तो हम कहें कि आप भी तो डाकू हैं…भगतसिंह पर वैसे कोई आलोचना नहीं सुनी कभी…कहीं लिखा था मैंने कि…क्या हम रास्ते पर किसी अमीर(अमीर होने का मतलब ही होता है भ्रष्ट और शोषक होना) से सारे पैसे छीन कर किसी भिखारी को दे दें तो हम पर मुकद्दमा नहीं चला चाहिए?

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