वेब मीडिया की सीमा क्या हो ?

प्रसन्न कुमार ठाकुर, नयी दिल्ली,

सायं 3 बजे से आयोजित “मीडिया खबर” के तत्वाधान में “प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया” के आज के कार्यक्रम में अपने एक मित्र के साथ शिरकत हुआ | अवसर था ”मीडिया खबर” के दो वर्ष सफलता पूर्वक पुरे होने का और बातचीत के केंद्र में मुद्दा था “इलेक्ट्रोनिक मीडिया के अन्दर की गतिविधि पर ब्लोगिंग के माध्यम से जो कुछ लिखा जा रहा है उसमे क्या सही है और क्या गलत”। कार्यक्रम में कुछ नामचीन लोग मंच की शोभा बढ़ा रहे थे तो कुछ श्रोता की भूमिका में बैठे तल्लीन होकर विषय की गंभीरता को समझने का प्रयास कर रहे थे ।  अपने मित्र के बताए स्थान पर जगह ज़माने के बाद मैं भी खुद को परिवेश में ढालने लगा । मंच संचालक प्रिय विनीत जी कार्यक्रम को एक आयाम पर लाने की लगातार कोशिश करते रहे और वक्तागन अपनी वाह-वाही के लिए शब्दजाल से मुद्दे को कम अपने को ज्यादा परोसते रहे । इन सब के बीच कुछ अच्छी बाते भी मंच पर सफलता पूर्वक रखी गयी और कुछ बेहद पेंचिदे मसले भी सामने लाये गए ।

ज्ञात हो कि ”मीडिया खबर” अपने प्रोमोटर पुष्कर पुष्प के मार्गदर्शन में कुछ खबरिया चैनलों की अनियमितताओं के खिलाफ जो मिशन चला रहा था उसकी वजह से पुष्प जान से मारने की धमकी दी गयी और कई एक मसले में झूठा फसाने का सरंजाम भी रचा गया। इस घटना से उठ रहे एक सवाल कि वेब मीडिया की सीमा क्या हो ? -पिछले कुछ दिनों में एक विषय बन चूका है ।

बात बस इतनी-सी नहीं है कि पुष्कर पुष्प ने भारत के वर्तमान न्यूज़ मीडिया की तथाकथित “चाइना क्रीम – …और लाल-सलाम” की नीति और इसके परदे के पीछे की पेपर्द सच्चाई को देश-दुनिया के सामने रखने की सच्ची कोशिश की है; या न्यूज़ चैनल के नाम की चादर ओढ़े दलाली करने वाले दल्लों के कार्यालय में कार्यरत पत्रकारों की पेशेगत दर से दरकती और खौफ से दबी आवाज को एक आवाज दी है या रोबदार मूंछों के कलंकित छत्रपों की रोबदारी को ललकारने का सकारात्मक और साहसपूर्ण कार्य किसी अंजाम की परवाह किये बगैर बेखौफ होकर किया है…..बल्कि मुद्दा तो कुछ और है । जो कार्य पुष्कर पुष्प ने किया है वह मीडिया के स्वाभाविक कार्यों का हिस्सा मात्र है । भारतीय बाजारबाद को निगलती विश्ववाद की जटिलता में फँसी राजनैतिक बिद्रुपता और आपातकाल के बाद की बेहद कमजोर मीडिया की परिपाटी से पनपी/जन्मी वर्तमान “इलेक्ट्रोनिक-न्यूज़-मीडिया” की कमजोर नीति एवं इस कालखंड की दिशाहीन पत्रकारिता ने जिन पारिस्थितिकी का सरमाया पिछले कुछ वर्षों में गढ़ा-बुना है, उसने घृणात्मक माहौल पैदा कर दिया है | इस माहौल में घट रही ढेर-बेवाजिब घटनाएँ; जो पत्रकारिता की पेशेगत जटिलताओं की वजह से आज तलक छुपी थी या छुपायी जा रही थी – का सरेआम होना; एक बड़ी घटना है| यह कितना मुश्किल है इसका अंदाज़ा केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि बगैर वेब-पत्रकारिता इसे किसी और माध्यम से प्रकाश में लाना संभव नहीं था। अन्य माध्यमो में इतनी हिम्मत जुटाने वाला कोई विरला ही होगा जो न्यूज़ चैनलों में पत्रकारों के साथ हो रहे यथार्थ को ज्यूँ का त्यूं प्रस्तुत कर सके| ( इन घटनाओं का जिक्र मीडिया के बाहर नहीं किया जाता क्यूंकि दूसरों को न्याय दिलाने की वकालत करने वाली यह कौम आखिर अपने लिए न्याय कहाँ से मांगे ?)

जिन्दगी जीने की मज़बूरी में दब जाने वाले खबर के कुछ कमजोर सिपाहियों और न दबने वाले बेखौफ खबरचियों के दर्दे-गम को अपना गम समझने वालों में चंद नाम उँगलियों पर गिने जा सकते हैं। लेकिन इतना काफी नहीं है….मैं जिस मुद्दे की बात कर रहा हूँ वह कुछ और है । ध्यान देने वाली बात है कि भारत जैसे देशों में लोकतंत्र यदि जिन्दा है तो वह मीडिया ही है जो नेताओं, नौकरशाहों और  तानाशाहों के चंगुलों से इसे बचाती रही है । वर्ना इसकी कब्र हमेशा खोद कर बैठे इंतजार करने वालों की कमी नहीं।आजकल की चंद घटनाओं से उपजी कुछ गतिविधियों ने स्पष्ठ कर दिया है कि मीडिया संस्थानों का संचालन किसी परोपकार या लोक कल्याण के लिए नहीं बल्कि विशुद्ध व्यापारिक हितों को साधने को लेकर हो रहा है । वर्तमान मीडिया पर व्यापर जगत (कोर्पोरिज्म) कुछ इस तरह हावी हो चूका है कि विशुद्ध पत्रकार समझे जाने वाले एक नामचीन खबर के सिपाही के दिशा निर्देशों पर चल रहे समाचार चैनल पर पिछले कुछ वर्षों में जादू- टोना, सांप-बिच्छू, भुत-प्रेत और स्वर्ग-नरक के अलावे कोई समाचार नहीं दिखाया गया । यह दीगर बात है कि हमारे देश में कोई कानून नहीं कि इस तरह के चैनल पर नकेल लगाया जा सके । न्यूज़ चैनल के लाइसेंस के तहत जादू का खेल दिखाने की छुट यदि मिल रही है तो मेरे ख्याल से तह तक जाने की जरुरत है। हम पत्रकारों को एकजुट होकर इसके खिलाप आवाज बुलंद करनी होगी । लोकतंत्र खतरे में है जिसे बचाने के लिए नियोजित मुहीम की मांग मैं नहीं वक़्त कर रहा है और इसे समझना होगा । यह वक़्त अतिक्रमण का है – व्यवस्था गंभीर संकट की दौर में है; जिसकी गंभीरता को समझना होगा । पत्रकारिता फिर से चीख-चीख कर निर्भय और सच्चे सिपाहियों की मांग कर रहा है।

इस मुद्दे का दूसरा पहलु जिसपर चर्चा जारी है कि वेब जर्नालिस्म के माध्यम से क्या प्रस्तुत किया जाय और क्या नहीं तो अपने अनुभवों के आधार पर केवल इतना कहना चाहूँगा कि एक “कंटेंट प्रोटोकोल” का विकास जरुरी है लेकिन निर्भीकता और न्याय को बनाए रहना होगा । हमें अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को समझकर वर्तमान के अतिक्रमण के इस बेहद पेंचिदे वक़्त में सत्यता को एक मात्र सबल सहारा बनाना होगा । यही हमारी ताकत भी होगी और यही पत्रकारिता का धर्म भी है ।

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4 Responses to वेब मीडिया की सीमा क्या हो ?

  1. Shishir koundilya says:

    Wah!!!!! Kya likha hai aapne… Pahle ek kahabat Chalti thi “ki raz ko raz rehane do” Lekin Aaj jarurat hai Raz ko kholne ki… Aur Shayad yehi koshish P K Thakur ne ki hai…Jo ki Kabil-E-TariF hai…..

  2. Manoranjan Kumar says:

    Whatever comment has been wrrtiten by u is very……2 readble, superior and tremendous. I think u have tried to spread awareness among the people. U have showed in this comment that liberty or freedom is for the people, by the people and of the people.
    One thing more u have created meaning in this comment that `jis paair ke niche gurden dabi ho use sahlana hee achha hota hai`. This is my comment on this… Na talbar ki dhar se, na golio ki bouchar se, samaj me jagriti aygi aupke kalam ki raftar se, likhte rhai, lagi rahi or bhejtai rahai.
    I Wish u grand success in every walk at ur life.

  3. RAJ SINH says:

    प्रसन्न ठाकुर जी आपको कोटिशः धन्यवाद.

    जल्दी ही इन दलालों की दलाली ख़त्म होगी जब नेट की , टीवी की तरह लोकप्रियता और उपलब्धता , आम जन या मध्यम वर्ग तक ही सही ,पहुँच जायेगी .

    हाँ अभी से ही कितने दलाल पोर्टल उभर आये हैं ,आगे क्या होगा नेट का भी , यह भी सोचें .

  4. Pink Friday says:

    Well, I don’t know if that’s going to work for me, but definitely worked for you! :) Excellent post!

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