कुशल प्रबंधक (लघुकथा)

उमेश मोहन धवन

नीरज ने शनिवार के मेटिनी शो की टिकटें अपनी पत्नी के हाथ में रखी ही थीं कि मोबाइल की घंटी बज उठी। उधर से चाचाजी की मृत्यु का दुखद समाचार मिला। चाचाजी का चौथा भी शनिवार को ही तीन बजे था। दोनों का समय तो एक ही है।

अब तो फिल्म देखने जा नहीं सकते? पत्नी के स्वर में चाचाजी की मृत्यु से अधिक फिल्म न जा पाने का दर्द व निराशा स्पष्ट थी। वह कई दिनों से इस फिल्म को देखने का इंतजार जो कर रही थी।

नीरज भी अजीब असमंजस में पडा बस इतना ही कह पाया हां अब कैसे जा सकते हैं? शनिवार को तीन बजे पति पत्नी चाचाजी के घर पहुंच गये। अभी उन्हें बैठे हुए दस मिनट ही हुए थे कि नीरज ने चाची को कान में कहा चाची दरअसल मेरे एक दोस्त के पिताजी का चौथा भी आज ही तीन बजे है।

हमने सोचा दोनों जगह हो लेंगे। इसलिये हमें जरा जल्दी जाना होगा रास्ते में पत्नी ने हैरानी से पूछा अब ये चौथा किसका निकल आया? अरे जल्दी करो, सिनेमा हाल यहां से दस मिनट की दूरी पर है। हम लोग टाइम से पहुंच जायेंगे।

नीरज ने स्कूटर तेज करते हुये कहा। दस मिनट बाद दोनों हाल के अंदर थे। पत्नी अपने योग्य पति की कुशल प्रबंध क्षमता पर मुग्ध थी।

उमेश मोहन धवन

13/134, परमट, कानपुर

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to कुशल प्रबंधक (लघुकथा)

  1. एम बी ए तो नहीं था नीरज?…

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