डोली में बिठाई के कहार…

स्वयंबरा बक्शी

हुनहुना रे हुनहुना, हुनहुना रे हुनहुना का समवेत स्वर  ………..लाल जोड़े में शरमाई सकुचाई सी दुल्हन …….और डोली……  कैसा रूमानी सा दृश्य लगता है । है  न!!!!  डोली और दुल्हन……..इनके बीच का नाता इतना गहरा है कि एक का नाम लेते ही  दूसरे का चित्र आँखों के सामने खिंच जाता है.  कहारों के ललकारे  व  मधुर गीत, कंधे पर डोली और डोली में बैठी दुल्हन, जैसे किसी दूसरी दुनिया में ही ले जाते हैं ……. सपनों की दुनिया ……..जिसे कभी हमने यथार्थ में भी देखा था ।  मुझे याद है बचपन के वो दिन जब किसी के घर शादी होती तो बारात लगने और बिदाई होने का हम घंटों इंतजार किया करते थे , ताकि डोलियों पर लुटाये जानेवाले पैसे हम लूट सकें । डोली हमारी समस्त उत्सुकता का केंद्रबिंदु होता था ।  उसमे बैठे  दूल्हा और दुल्हन को पहले देख लेने की होड़ लगी रहती थी । डोलियों के पीछे दौड़ना हमारा प्रिये शगल था । वो वक़्त था कि दूल्हा अपनी दुल्हन से शादी करने डोली में बैठ कर ही जाता था और उसे डोली में बिठाकर घर लाता था । कई किलोमीटर की ये यात्रा कहारों के गीत, कहानियां और ललकारों से पल भर में कट जाती थी । शादी की कई परंपरा डोलियों से जुड़ी होती थी ।

किन्तु आज इन डोलियों के दर्शन गाँव में भी यदा- कदा ही होते है । आधुनिकता के भंवर में परम्पराए लुप्त हो रही है । डोली उठाने का काम करनेवाले कहारों की मांग की कमी का असर इनलोगों पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ा है । ये लोग या तो इसे बनाये रखने की कोशिश में उचित जीवन स्तर को तरसते हैं या इस काम को  छोड़कर नयी दिशा में मुड़ जाते है । महंगाई की मार ने भी कहारों को इससे विमुख किया है । शादी का लगन कुछ महीने ही रहता है ऐसे में जीविकोपार्जन मुश्किल हो जाता है । आज कहीं डोलियाँ नहीं दिखती । परंपरा निर्वाह के लिए कार को ही धक्का देकर डोली को कन्धा देने का संतोष पा लिया जाता है । हालाँकि गाँव में कहीं कहीं इसका पालन किया जाता है …वहाँ कहारों को बाकायदा न्योता दिया जाता है…उन्हें  नए कपडे, पगड़ी, गमछा और रुपये दिए जाते हैं ।

स्थिति चाहे जैसी भी हो पर डोलियाँ हमारे मन: मस्तिष्क में इस कदर बस चुकी हैं कि हम किसी न किसी रूप में इसका प्रयोग करते है । शादी के कार्ड पर डोली में बैठी दुल्हन का चित्र छपा होता है । सिनेमा के असंख्य गीतों के दृश्य रचना में इसका प्रयोग होता है । कहारों द्वारा गाये गये गीत एक विशेष धुन पर आधारित होते हैं, जिसे कितने ही फिल्मों के गीतों में इस्तेमाल किया गया ।

बहरहाल डोलियों का लुप्त होना प्रकारांतर से हमारी संस्कृति के एक अंश का अतीत बन जाना है । अब तो लगता है कि एक खूबसूरत परंपरा इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी ।

[ललकारा : हौसला बढ़ाने के लिए कहारों द्वारा बोले जाते समवेत स्वर]

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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6 Responses to डोली में बिठाई के कहार…

  1. Rishi says:

    Wait wait wait…! Which way you are going Ma’m?Your eyes may be filled with tears out of nostalgia but there is a different story underneath it. Its a sign of upliftment of our culture, refinement of our ‘values’ as human beings. You should be rather happy that an age long ‘inhuman’ practice has come to an end.
    See the logic and how it works.Simple Arthashastra.
    When you are hungry, you look around for bread which we dont give for free.Those poor people were not allowed,perhaps unlike you,to get money just like that.I mean they were not as privileged that they could get means of their living by looting notes and coins in a marriage ceremony.Damn! They had no choice to bear the pain of lifting your DOLIs.Then, I presume, you were too little to understand the pain of those people.The kind of job they were doing was not out of joy.They didnt have a choice.
    Now when the world is seeing them like they see you.Like they too are considered at par with you.They are also able to type those magic codes on a comp keyboard..which gives birth to a new software.They too can become bankers, scientists, engineers.Dont be so nostalgic…They may get hurt.
    Please take this comment in a positive way.

  2. 1111111111111 birendra yadav says:

    bahut badhiya. halanki parampra khatma hone me adhik umra me shadi bhi ek karan hai. 20 ke upar ke dulha ko dhona bhi char kaharon ke liye sambhav nahi raha. n vah kandha bacha aur n palaki.

  3. swayambara says:

    @ RISHI सर जी, आम आदमी का अर्थशास्त्र दो जून की रोटी में बसता है जिसका उपार्जन ‘श्रम” से होता है . इसे अमानवीय कहकर आपने तमाम श्रमजीवियों का अपमान किया HAI. …..और मान लिया की ‘डोली’ जिसे दो से चार आदमी उठाते है, अमानवीय है, पर ये भूखे रहने की मजबूरी से जादा दुखद NAHI है. इस काम में वो किसी का अपशिष्ट नहीं दोते, किसी का झूठा बर्तन नहीं साफ़ करते . आपको पता है की कभी ये डोलियन बीमार को इलाज के लिए ले जाने का भी साधन थी. मैंने जो लिखा वो ‘नोस्टाल्जिया’ नहीं है. यह थेयोरी नहीं प्रक्टिकल था. मैंने इन्हें करीब से देखा है. पड़ने-लिखने और विकास करने में किसी को क्या आपति हो सकती है ….पर दिक्कत तब है जब पढने के बाद युवकों को आपने पारंपरिक पेशा को अपनाने में शर्म आती है…भले ही वे घर बैठे रहे. हाँ आपने इन्गीनियर, डॉक्टर वगैरह बन्ने की बात की तो साब, आप किस दुनिया में है. इन्हें बनने में लाखों लगते है. एजुकेशन लोन भी हैसिअत्वालों को मिलता है, वह भी अनेक झंझटों से गुजरने के बाद. शायद आप ज़मीन से जुड़े ही नहीं है. गाँव जाएँ और देखे की वहा तमाम ‘योजनाओं’ {जिनमे शिक्छ भी शामिल HAI} का क्या हाल है …….. जमीनी हकीकत से वाकिफ हो जायेंगे………..मुझे भी माफ़ करेंगे यदि कुछ बुरा लगा हो तो..

  4. Rishi Dubey says:

    See! Its not so small a subject as one would associate it with one’s ego and let one term an INHUMAN practice of ‘doli’ so beautiful.

    1.आम आदमी का अर्थशास्त्र दो जून की रोटी में बसता है जिसका उपार्जन ‘श्रम” से होता है – Beautifull ! I also think the samy way.Agreement!
    2.इसे अमानवीय कहकर आपने तमाम श्रमजीवियों का अपमान किया है –
    Please! Dont be so political in order to justify a ‘ limited sense ‘ of such a broad subject of economy. Let me be specific.I dont have an objection to one’s working hard for food and by the way everybody does the same thing. Do I seem questioning the underlying theory of livelihood of ‘working and getting rewarded’. ? But everybody who believes in innovations to make human life easier and better would not subscribe to your explantion. What is wrong in my objection? Getting ‘maximum out of minimum’ has been the approach behind all innovations since time immortal. Reducing the amount of physical labour by the use of brain has been the basis of Industrial Revolution which fruits are still the sweetest one. Our basic requirements have not changed but the way we earn them. Your theory does not seem filling the enormous gap between the poor and the rich in our country. It sounds absurd but excuse me ! You are widening it. People who talk of development and better quality of life would not appreciate such an explanation as your’s. My objection is not to one working hard to run his life but not like slaves. The more you become firm of your opinion, the more you end up promoting a form of slavery. I mean, what a pathetic scene man! Humans ferrying another over their shoulders just to earn their livelihood ! Comm’on! Wake up ! We have come far away from that. My objection still stands loud, clear, tall and handsome. A civilized society would never appreciate your views. I have not done anything wrong in terming such a practice as INHUMAN. Ma’m If you know the reason behind Naxalism and Similar movements in many parts of our country,It is becasue of this ‘ FEUDALISTIC ‘ thinking. And when you say ‘shramjivi’ you sound like a politician, who want their votebanks to become poorer. Because they dont want a ‘thinking mass’ to hinder their dirty political aspirations, they keep on playing such cards.Left parties has done enough & perhaps there are no takers for them. Ab aap bas bhi karo.

    और मान लिया की ‘डोली’ जिसे दो से चार आदमी उठाते है, अमानवीय है, पर ये भूखे रहने की मजबूरी से जादा दुखद NAHI है- I cant afford to witness such pain by my own brothers and sisters. Please dont be so passive to their pains. You are still stuck there. We dont want only poets who sing songs of pains and miseries. We also want people who educate them to upgrade to a better lifestyle.
    आपको पता है की कभी ये डोलियन बीमार को इलाज के लिए ले जाने का भी साधन थी. मैंने जो लिखा वो ‘नोस्टाल्जिया’ नहीं है. यह थेयोरी नहीं प्रक्टिकल था.-NOWHERE in your post, you had talked about doli lifters ferrying sick and needy.I am not going out of context.
    मैंने इन्हें करीब से देखा है. पड़ने-लिखने और विकास करने में किसी को क्या आपति हो सकती है …Thankfully !
    पर दिक्कत तब है जब पढने के बाद युवकों को आपने पारंपरिक पेशा को अपनाने में शर्म आती है- Doli Lifting was not a family business but a form of slavery and painful way of physical labour. A sign of feaudalism. A blot on humanity. Do not see it like other professions of weaving and growing cattle etc. The time has seen natural abolition of it.

    एजुकेशन लोन भी हैसिअत्वालों को मिलता है, वह भी अनेक झंझटों से गुजरने के बाद. -I agree.But who said education loan is only for rich people?Perhaps you have not read education loan guidelines of RBI.Education loans upto 5 Lakhs dont need any collateral. You take one doli wala’s son/daughter to a bank and ask for it. If they decline, dont tell that poor child to lift doli like his father did. Fight for them, if you are so concerned. Lodge a complaint to Banking Ombudsman, RBI, FinMin and many other agencies and institutions made for this.Make some difference instead of crying foul and justifying the inhuman approach.

    शायद आप ज़मीन से जुड़े ही नहीं है. गाँव जाएँ और देखे की वहा तमाम ‘योजनाओं’ {जिनमे शिक्छ भी शामिल है } का क्या हाल है. I am not. If you are so associated with your village go and ask all those (if alive) who lifted dolis. Are they not happy that their new generation are driving their own cars than ferrying your brides in a dolis?

    मुझे भी माफ़ करेंगे यदि कुछ बुरा लगा हो तो..:You are pardoned ! See, Before writing anything, a writer should weigh his choice of words in an introspective way. I was actually enjoying your post it in the begining, but when I found the word ‘ खूबसूरत परंपरा ” I objected to it and would always do so for such immature choice of words. You simply soiled the hard work of thousands of leaders who fought for their rights in such a cruel soceity who treated them like slaves.You should be carefull.
    ” A wordsworth is one who understand the worth of words.”
    In a nutshell I like to reaffirm my stand once again and forever.

  5. shruti says:

    It is a well written article… It is true that now a days the work of doli lifters has vanished… People think if my daughter goes in a Benz or Honda then people will think that she has been married to a good family. where as they forget the concept of doli and the emotions attached to it. I believe we should take a step to relive our tradition and strengthen it to an extent that people start following it again. By the way i got married on 14may 2011, tried a lot to get hold of doli lifters but failed. It was my desire to get vida on doli…

  6. rajesh verma says:

    decent

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