कुप्रथाओं की जंजीरों में मानवाधिकार

डॉ. अर्चना ,व्याख्याता , 

पटना वीमेंस कॉलेज ,

पटना विश्वविद्यालय , पटना ।

भारतीय समाज में शताब्दियों से प्रचलित कुछ कुप्रथाएं ऐसी हैं जिनसे बहुत बड़े स्तर पर मानवाधिकारों का हनन हो रहा है । इन्हें रोकने के लिये कड़े कानून एवं प्रावधानों के बावजूद , भारत में व्याप्त अशिक्षा एवं अंधविश्वास के कारण इन पर पूर्ण रुप से अंकुश लगाया जाना संभव नहीं हो पा रहा है । कानून इन्हें रोकने तथा पुलिस प्रशासन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने में लगभग असफल नजर आ रहा है । जब तक समाज में स्वयं किसी बुराई को समझने और छुटकारा पाने की भावना पैदा न हो तब तक केवल कानून द्वारा वांछित परिणाम प्राप्त करना संभव नहीं होता । समाज को इसके लिये शिक्षित एवं जागरुक करना आवश्यक होता है । हमारे देश की शिक्षा प्रणाली केवल प्रशासनिक व्यवस्था को चलाने के लिये सीमित ज्ञान देने वाला एक ऐसा यंत्र तैयार कर रही है , जिसने अंधविश्वासों तथा कुप्रथाओं के विरुद्ध न तो कभी स्वयं आवाज उठाई और न ही इसके लिये व्यापक स्तर पर जागरुक करने का काम ही किया । इतिहास के विभिन्न युगों में गिनती के जो बड़े सुधारक सामने आये भी , उनके प्रयासों के बावजूद समाज उतना नहीं बदला जितना इसे बदलना चाहिये था ।

बालविवाह इन्हीं प्रथाओं में से एक है । इसे पूर्ण रुप से प्रतिबंधित करने वाला कानून शारदा ऐक्ट ब्रिटिश शासन में ही बना था । यह परंपरा आज भी कानून को धत्ता बताते हुये प्रचलित है । विवाह सूत्र में बंधे ये अल्पवयस्क और दुधमुँहे बच्चे विवाह की उम्र को पहुँच जाने पर किस प्रकार अपना वैवाहिक जीवन गुजारते होंगे और किस प्रकार अपने अभिभावकों की ओर से भी की गई मनमानी का बोझ ढोते होंगे , इस व्यथा को शायद ही कोई समझ पाये ।

बाल विवाह की बात छोड़ दें तो आज भी भारतीय समाज में अभिभावक अपनी वयस्क संतानों के विवाह भी अपनी इच्छानुसार ही करते हैं । विवाह के निर्णय में घर के बड़े या अभिभावकों का आदेश ही चलता है । संबधित युवक युवतियों से उनकी राय भी अमूमन नहीं ली जाती । लड़कियों के संबंध में तो यह क्रूर दृष्टिकोण हमारे समाज की एक विशेष परंपरा बन गयी है । और यदि प्रेम प्रस्ताव युवती की तरफ से रखा जाये तो बात ऑनर किलिंग तक भी पहुँच जाती है । विरोध करने वाले युवक युवती को सामाजिक प्रताड़ना का एक रुप बहिष्कार के रुप में भी झेलना पड़ता है । यद्यपि धीरे धीरे ये जंजीरें ढीली पड़ रही हैं , लेकिन इतनी भी नहीं जितनी अपेक्षित है । इस प्रकार अभिभावक आज भी विवाह के नाम पर अपने बच्चों को एक संपत्ति की तरह हस्तांतरित करने का अधिकार बनाये हुये हैं । क्या यह मानसिकता मानवाधिकारों का उलंघन नहीं है ?

संस्कृति एवं परंपराओं के नाम पर महिलाओं को गहनों से  ढक दिया जाता है । गहने नारी की शोभा होते हैं या नारी गहनों की शोभा होती है यह आज भी समझ से परे है । क्या कभी यह समझने की जरुरत महसूस की गयी कि गहनों से नारी के संपूर्ण व्यक्तित्व को दबा दिया जाता है । गहने नारी की स्वतंत्रता पर खूबसूरत जंजीर की तरह कार्य करते हैं । साथ ही इसे महिलायें सहज स्वीकार भी लेती हैं । क्या यह महिलाओं के विरुद्ध पितृसत्तात्मक समाज की साजिश नहीं है । दहेज प्रथा भी इन्हीं एक परंपराओं से जुड़ी है जिससे न जाने कितनी महिलायें प्रताड़ितत होती है और आगे भी होती रहेंगी । भारतीय समाज का कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जिसमें दहेज का प्रचलन न हो । यह कुप्रथा परिवारों के आर्थिक और सामाजिक स्तर की प्रतीक बनती चली आ रही है । यह दहेज उन्मूलन अधिनियम 1961 की अपंगता नहीं तो और क्या है ?

देवदासी , एक अन्य कुप्रथा है जो महिलाओं के मानवाधिकारों पर कुठाराघात है । इसके विरुद्ध कानून होने के बावजूद लड़कियाँ सिसक सिसक कर जीने के लिये विवश हैं । परंपराओं के नाम पर विधवा महिला किसी शुभ कार्य में हिस्सा नहीं ले सकती । संतानहीन महिलायें आज भी समाज में तिरष्कृत होती हैं । परंपरा के नाम पर महिलाओं को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता । लड़कियों का घर से निकलना आज भी अच्छा नहीं समझा जाता क्योंकि उनसे घर की इज्जत होती है । इस इज्जत पर आँच का परिणाम कहीं कहीं ऑनर किलिंग के रुप में हमारे सामने आता है । … ऐसी न जाने कितनी परंपरायें हैं जिन्हें सिर्फ महिलाओं पर ही थोपा जाता  है । महिलाओं को भी यह अहसास नहीं होता कि यह उनके मानवाधिकारों का उलंघन है ।

कानूनों के माध्यम से इन कुप्रथाओं को समाप्त करना असंभव प्रतीत होता है क्योंकि इन्हें समाजिक स्वीकृति मिली हुई है । आवश्यकता है समाज में जागृति लाने की तथा समाज को शिक्षित करने की पर सबसे महत्वपूर्ण है महिलाओं में जागृति आना । महिलाओं को अपने मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील होना होगा । उन्हें समाज को यह अहसास दिलाना होगा कि वे तभी तक शोषित हो सकती हैं जब तक वे ऐसा चाहती हैं । जिस दिन उनमें जागरुकता आई समाज की नींव हिलने लगेगी । जाहिर है महिलायें बदलेंगी तभी हमारा समाज बदलेगा ।

याद रखना सताने के साथ-साथ ,

हम भी बदल रहे हैं जमाने के साथ-साथ ।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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3 Responses to कुप्रथाओं की जंजीरों में मानवाधिकार

  1. हमारे लोग ही विचित्र प्राणी हैं…

  2. PRAMOD KUMAR SINGH says:

    ARCHANA JI , आपको कामयाबी की बधाई। निश्चित रूप से आपका काम मुझे अन्य तमाम कलाकारों से बहुत बेहतर लगता है। आपकी प्रसिद्धि चरम की ओर बढ़ रही है। कृपया मेरी बधाई स्वीकार करें।

    P.K.SINGH,
    DEPUTY DIRECTOR GENERAL,
    DOORDARSHAN DELHI

  3. समाज में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से आज उनकी एक नई पहचान बनी है। जिससे समाज में महिलाओं के प्रति परंपरागत धारणाएं दम तोड़ रही हैं तथा महिलाएं दूसरों पर निर्भर रहने की बजाय घर−परिवार और समाज में अपने अस्तित्व की महत्ता स्थापित कर रही हैं। आज की युवती स्वतः जीवनयापन करना चाहती है। कोई भी समाज महिलाओं की भागीदारी के बिना नहीं चल सकता। जो स्थान मशीन में धुरी का होता है, वही स्थान आज समाज में महिलाओं का है। पर मानवाधिकारों का हनन, महिलाओं के मानवाधिकारों पर कुठाराघात समाज में शताब्दियों से हो रहा है । अशिक्षा एवं अंध विश्वास के कारण इन पर पूर्ण रुप से अंकुश लगाया जाना कड़े कानून एवं प्रावधानों के बावजूद संभव नहीं हो पा रहा है ।

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