बिहार शताब्दी समारोह की तैयारियों में गुम बेतरतीब आबादी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सूबे में मानव संसाधन के विकास की बात कर रहे हैं। यानि कि मानव को इतना उन्नत और प्रस्कृत बनाया जाया कि खुद को बेहतर तरीके से संभालते हुये सभ्यता को एक नई ऊंचाई देने में वह सक्षम हो। प्रश्न उठता है कि क्या भूखे व्यक्ति को कला, संस्कृति और तकनीक की शिक्षा दी जा सकती है और यदि दी जाएगी तो उस पर इन शिक्षाओं का कितना असर होगा ? पटना के वीर कुवंर सिंह पार्क के सामने स्थित फुटपाथ पर पसरी हुई बेतरतीब आबादी भले ही यहां के नीति निर्धारकों को नहीं दिखाई दे रहीं है लेकिन सूबे में मानव संसाधन के विकास पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगा रही है।

तमाम सरकारी तंत्र बिहार के शताब्दी समारोह की तैयारियों में लगा हुआ है। मानव संसाधन विकास विभाग इसकी कमान संभाले हुये है। बिहार के वैभव की व्याखा करने के लिए  कलाकारों और विद्वानों की फौज तैयार की जा रही है। नये-नये गीत रचे जा रहे हैं और साथ में इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है इन गीतों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी एक विराट रूप में ढाला जाये, जिन्होंने सूबे को एक नई दिशा और एक नई पहचान दी है। यहां के लोगों के आत्मगौरव को बढ़ाया है। स्वतंत्रता सेनानी वीर कुवंर सिंह के नाम पर स्थिति पार्क का फुटपाथ भूखे और नंगे बिहार की कहानी बयां कर रही है। इस फुटपाथ पर छोटे-छोटे समूहों में कई परिवार एक साथ रह रहे हैं, जिनमें हर उम्र के लोग शामिल हैं। बड़े उम्र के लोग किसी तरह से अपने बदन को ढकने का तो इंतजामात किये हुये हैं, लेकिन बच्चे पूरी तरह से नंग-धड़ंग ही रहते हैं।

भोजन के लिए इन बच्चों का संघर्ष सुबह से ही शुरु हो जाता है। इनके माता-पिता इन्हें जीपीओ के करीब स्थित मुर्गी बाजार में मुर्गी की अंतड़ियों को चुनने के काम में लगा देते हैं। बाद में चुनी गई अंतड़ियों को सभी महिलाएं एक साथ बैठकर साफ करती हैं और फिर वापस में बांट लेती हैं। फिर अलग-अलग चूल्हों पर हांडी में चावल के साथ इन अंतड़ियों को पका कर अपने-अपने बच्चों को खिलाती हैं। क्या इन बच्चों को अनदेखा करके हम विकसित बिहार या मानव संसाधन के विकास की बात कर सकते हैं?  बड़े होकर ये बच्चे सभ्यता के कारंवा को किस ओर ले जाएंगे?  फिलहाल यह आबादी विकास के पहले पायदान पर भी नहीं है। इनकी पूरी उर्जा अपने अस्तित्व को बचाने में लगी हई है। ऐसे में आत्मगौरव और बिहार गौरव की बात इनके लिए बेमानी है। बिहार को लेकर रचे जा रहे गौरवशाली गीतों की गूंज इनके कानों तक कभी नहीं पहुंचेंगी।

इन बच्चों और इनके परिवारों की जड़े सूबे के सुदूर गांवों तक फैली हुई है। रोजी-रोटी की तलाश में ये लो पटना शहर की तरफ तो रूख कर रहे हैं लेकिन इनकी जिंदगी इस शहर के फुटपाथ पर आकर बिखरती जा रह है। शिक्षा की रोशनी से तो ये पूरी तरह से महरूम है, जबकि प्राइमरी और माध्यमिक विद्यालयों में बच्चों के दाखिले के आंकड़ों को बढ़-चढ़ कर दिखाया जा रहा है। अभी कितने बच्चे स्कूलों के बाहर है इसका जिक्र इन आंकड़ों में नहीं होता।

बिहार में विकास की तस्वीर देखनी है तो यहां बनने वाले ओवरब्रिजों के नीचे बसती आबादी पर एक नजर लें। चितकोहरा पुल के नीचे हरिजनों की एक बस्ती लालू प्रसाद के कार्यकाल के दौरान भी बसी थी। उनके रहने का तो इंतजाम हो गया लेकिन आज भी सभ्यता की मुख्य धारा से वे कोसो दूर हैं। 20 साल में वहां दूसरी पीढ़ी तैयार हो गई है, जिंदगी में लेस मात्र का भी अंतर नहीं आया है। कच्ची शराब और गांजे के नशा में यह पीढ़ी भी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की तरह मस्त है। इसी तरह यारपुर के पास बने ओवरब्रिज भी विकास को मुंह चिढ़ा रहा है। ब्रिज के फुटपाथ का इस्तेमाल शौचालय के रूप में किया जा रहा है। ऐसे स्थिति में जब मानव संसाधन के विकास की बात बेमानी है जब लोगों को लोगों के लिए शौच के लिए सुविधा मुहैया नहीं हो पा रही है।

फिलहाल मानव संसाधन विभाग के पास बातों पर सोचने के लिए वक्त नहीं है। बिहार शताब्दी समारोह की सफलता अभी मुख्य सरकारी एजेंडा है। चमकती हुई बिहार की तस्वीर पेश करके ही हम गर्व से कह सकते हैं कि हम बिहारी है। सूबे के मुखिया भी यही चाह रहे हैं। शायद नेहरू की ये पंक्तियां उन्हें भी याद नहीं है कि एक भूखे व्यक्ति के लिए जनतंत्र का कोई मतलब नहीं होता है।

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2 Responses to बिहार शताब्दी समारोह की तैयारियों में गुम बेतरतीब आबादी

  1. आलोक जी, मुझे ऐसा लगा कि यह मेरे लेख की प्रति आपके हाथ पड़ गयी है। (सच कह रहा हूँ) …हाले-बिहार पर बहार …

  2. पहचान कौन? says:

    बहुत दिनों बाद पोर्टल पर आना हुआ. यह प्रयास अब एक मुकम्मिल आकार ले रहा है. खुश हूँ. खुश इसलिए भी हूँ कि शब्दों में दीमक-घुन नहीं लगे अब तक. इस राज्य और इस देश के हालात कमोबेश एक से हैं. सत्तावर्ग वैसे ही स्थापित और संगठित है जैसा हुआ करता है. समाज के जिस कमज़ोर नस को आपने आहिस्ते टटोला है, दब न जाए कहीं. मेरी दुआ है कि आपका फक्कडपन कायम रहे. आप जो कर रहे हैं उसको हाथ पर हाथ धरे गप्प मारना कह ख़ारिज किया जा सकता है. अच्छे अच्छे दौर में सही बात को यूँ ही ख़ारिज किया जाता रहा है. सच कहने का सिलसिला ज़ारी रखें.. शैली चाहे जो हो.

    बहुत स्नेह एवं समर्थन.

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