एक खूबसूरत ख्वाब है भारत-पाक के बीच बेहतर संबंध

संजय राय

संजय राय, नई दिल्ली

पिछले दिनों पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की निजी भारत यात्रा के बाद आपसी संबंधों को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गयी है। दोनों देशों में आपसी संबंधों को अतीत के आईने में देख-देखकर सुनहरे भविष्य को लेकर इस बहस के सहारे जो चेहरा दिखाने की कोशिश की जा रही है वह एक खूबसूरत ख्वाब है। मन कहता है कि काश यह चेहरा एक हकीकत में तब्दील हो जाता और इसकी लाली हमेशा बरकरार रहती।

दोनों तरफ करोड़ों की तादाद में ऐसे परिवार अपने पुरखों की जमीन को जीवन में एक नजर भर देखने की हसरत पाले इस दुनिया से कब के चले गये, लेकिन जाते-जाते वे अपनी अगली पीढ़ियों के दिलो-दिमाग में अपने गांव-घर, तालाब-पोखर, देवी-देवता, पीर-मजार, आस्था-श्रद्धा और न जाने किन-किन यादों की विरासत को सौंपकर गये, जो आज भी पूरी शिद्दत के साथ बरकरार है। अगर ऐसा नहीं होता तो आसिफ अली जरदारी के पु़त्र बिलावल जरदारी यहां की जमीन पर कदम रखने के बाद टृवीट करके भारत के लिये शान्ति की कामना नहीं करते और अपने वतन वापस लौटने के बाद यह नहीं कहते कि हर पाकिस्तानी के दिल में एक हिंदुस्तान बसता है, अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बनने के बाद दिल्ली से बस लेकर लाहौर की यात्रा पर नहीं जाते, राजनीतिक जुआ हारने का जोखिम उठाकर लालकृष्ण आडवाणी जिन्ना की मजार पर नहीं जाते, राष्ट्रपति बनने के बाद जनरल परवेज मुशर्रफ दरियागंज के अपने पुश्तैनी घर जाकर पैदाइश के समय पालन-पोषण करने वाली बुजुर्ग दाई को एक हजार डालर की बख्शीश नहीं देते। और क्रिकेट मैच के दौरान अपनी ही जमीन पर अपने देश की टीम के हारने के बाबजूद पाकिस्तान के दर्शक भारत के पक्ष में मैदान का चक्कर लगाकर नारे नहीं लगाते।

ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जरदारी की जियारत उसी ऐतिहासिक हकीकत की तस्दीक है, जो दोनों मुल्कों की साझा विरासत का एक ऐसा हिस्सा है जिसे जमीन तो क्या दिलों के बीच बड़ी से बड़ी दीवार बनाकर भी मिटाया नहीं जा सकता है। पैसठ साल पहले जब आजादी के नाम पर इस इलाके को लकीर खींचकर अंग्रेजों ने भारत और पाकिस्तान नाम से दो अलग-अलग देशों में बांट दिया था, तो धर्म के नाम पर जो खून-खराबा हुआ, वह अभी भी कुछ लोगों के जेहन में मौजूद है। काले इतिहास की ये कड़वी यादें हद से ज्यादा टीस देती हैं। यह टीस हमारे दिलो-दिमाग में इतनी मजबूती के साथ अपनी जड़ जमाये हुए है कि पाकिस्तान का नाम सुनते ही पूरे गुबार के साथ बाहर निकलती है। एक दूसरे को नेस्तनाबूद करने की खुली चुनौती दी जाती है। यह बात सीमा के दोनों तरफ देखी जा सकती है। कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच अब तक लड़ी गई चार लड़ाइयां और जेहाद के नाम पर लम्बे अरसे से चलाई जा रही दहशतगर्दी इसी काले अध्याय का परिणाम है।

साफ है भारत और पाकिस्तान के संबंधों में घृणा और प्रेम का जो चरम दिखाई देता है वह बिलकुल स्वाभाविक है। मामला साफ तौर से पट्टीदारी का है जो गांवों में अक्सर देखा जा सकता है। दो सीधे सादे और मूर्ख टाइप के पट्टीदारों को आपस में भिड़ाकर जिस तरह से धूर्त, मक्कार, स्वार्थी और कुटिल प्रवृत्ति के लोग अपना रुतबा बढ़ाते हैं और बढ़े रुतबे के सहारे ही अपनी दुकान चलाते हैं, काफी हद तक उसी टाइप का केस है हम दोनों पड़ोसियों का। हमें कौन लड़ाता रहा है और अभी भी लड़ाने की पुरजोर कोशिश में है इसे सब जानते हैं। वह दोनों का दोस्त बनने का दावा करता है और पर्दे के पीछे से खेल खेलता है। वह हम दोनों को मजबूत बनाने के लिए भारी मात्रा में धन देता है और हथियार बेंचता है। दरअसल वह हमें एक दूसरे के खिलाफ अपने हिसाब से मजबूत बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है। हकीकत यही है कि वह हमें आर्थिक सहायता देकर अंदर ही अंदर खोखला करता रहा है। न चाहते हुए भी दोनों तरफ के लोग उसके जाल में फंसते आ रहे हैं। आजादी के बाद से शुरू हुआ यह सिलसिला अभी भी बदस्तूर जारी है। लश्कर के मुखिया और मुंबई आतंकी हमला मामले में प्रमुख आरोपी हाफिज सईद के सिर पर 50 करोड़ रूपये का ईनाम रखने की घोषणा पर भारत भले ही खुश हो, लेकिन असलियत यही है कि इस घोषणा के सहारे महाशक्ति ने भविष्य के उस राजनीतिक खेल की बिसात बिछा दी है जिसपर आने वाले समय में कश्मीर के मासूम लोगों को मोहरा बनाया जा सकता है।

जियारत से पहले सात रेसकोर्स रोड पर चर्चा के बाद मनमोहन और जरदारी ने जो बातें की उनसे ये उम्मीद दिखती है कि दुनिया के मौजूदा हालात में अपनी औकात और कूबत को अच्छी तरह से समझकर हमारे रहनुमा अगली पीढ़ी को कुछ ठोस नहीं तो कम से कम संबंधों को बेहतर बनाने का संस्कार तो दे ही रहे हैं। बंटवारे और लड़ाइयों ने आजादी के बाद की पीढ़ियो में इन संस्कारों को जेहन की तलहटी के किसी कोने में दबा रखा है। इसे दोनों देशों के रहनुमा अगर अपने स्तर पर नये सिरे से बाहर लाने की कोशिश कर रहे हैं तो हम सबको इसका स्वागत करना चाहिये। दोनों नेताओं ने एकांत में चालीस मिनट तक आपसी संबंधों में सुधार को लेकर जो बातचीत की, बाद में मीडिया के सामने उसे बेहद संतोषजनक बताया। अबतक संबंधों में सुधार की जो गति है, भारत और पाकिस्तान अब उसे तेजी से आगे बढ़ाना चाहते हैं और इंसानियत के आधार पर कुछ कैदियों की रिहाई करके भारत ने इसकी पहल भी शुरू कर दी है।

लेकिन अनुभव बताता है कि भारत और पाकिस्तान की तरफ से संबंध सुधारने की कोशिशों को परवान चढ़ाने की इच्छा को जब भी दोनों तरफ के हुक्मरान अमली जामा पहनाने की दिशा में बढ़ते हैं, तो कोई न कोई आतंकवादी हमला हो जाता है। संसद और मुंबई के आतंकवादी हमले इसी वजह से किये गये थे कि भारत और पाकिस्तान के संबंध सुधरने न पायें। ये ताकतें दोनों देशों के खराब संबंधों की वजह से ही जिंदा हैं। इनको भी एक रणनीति के तहत तैयार किया गया है और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के इशारे पर ये काम करती हैं। एक लिहाज से देखा जाय तो दहशतगर्दी पाकिस्तान की विदेशनीति का एक हिस्सा है जो वहां के हुक्मरानों के नियंत्रण में नहीं है। इस नीति को सीधे पाकिस्तान की सेना ही नियंत्रित करती है। पाकिस्तान में जम्हूरित को एक हद से आगे मजबूत होने नहीं दिया जाता है और भारत से जुड़े हर मसले में सेना की राय ही सबसे अहम और आखिरी होती है। पाकिस्तान की व्यवस्था का यही पेंच हमारे रिश्तों को उलझाये रखता है। जिसने भी इस पेंच को सुलझाने की कोशिश की उसे एक हद से आगे बढ़ने ही नहीं दिया गया। स्वार्थी ताकतों ने देखते ही देखते उसे सत्ता से बेदखल कर दिया।

जाहिर है भारत-पाक रिश्तों की डोर काफी नाजुक है और इसे मतबूत बनाने के लिये दूरदृष्टि के साथ अथाह धीरज की जरूरत है। 2008 में मुंबई हमलों के पहले चल रही बातचीत के क्रम में पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ एक बार दिल्ली  आये थे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत के बाद दोनों नेता इस बात पर सहमत हुये कि हमारे संबंधों में सुधार की प्रक्रिया हमेशा आगे ही बढ़ेगी और प्रतिगामी नहीं होगी। यह एक संकल्प था, जिसे निजी यात्रा पर आये जरदारी ने कुछ कहकर और काफी कुछ बिना कहे ही पुष्ट किया है। विवाद के सभी मसलों को ठंडे बस्ते में रखकर अवाम की बेहतरी के लिये काम करने पर दोनों नेताओं का राजी होना एक अच्छी बात है। सोच यह है कि एक दूसरे के साथ कारोबारी रिश्ते को इतना मजबूत बना दिया जाय कि सारे विवाद इसके आगे छोटे पड़ जायें। तमाम चुनौतियों और विडम्बनाओं के बावजूद अवाम की बेहतरी के लिये काम करने की मजबूत इच्छाशक्ति ही हमारे संबंधों को स्थयी तौर से मजबूत कर सकती है और यही विश्वास है कि एक न एक दिन इस खित्ते में कोई महानायक हमारे सपनों को हकीकत में बदलेगा।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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