बिहार में एक प्रतीक का खात्मा है ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या

जिस तरह से एक लंबी शांति के बाद रणवीर सेना प्रमुख ब्रमेश्वर मुखिया की हत्या की गई है उससे एक बार फिर बिहार में जातीय गोलबंदी शुरु हो गई है और आशंका जताई जा रही है कि सूबे में हिंसा- प्रतिहिंसा का दौर फिर से शुरु हो सकता है। हालांकि कुछ दिन पहले जेल से रिहा होने के बाद ब्रमेश्वर मुखिया ने कहा था कि अब हिंसा की जरूरत नहीं है, समाज उस दौर से आगे बढ़ गया है। जिस वक्त ब्रमेश्वर मुखिया यह बात बोल रहे थे उन्हें उम्मीद नहीं थी आने वाले दिनों में उनकी हत्या कर दी जाएगी। जेल से रिहाई के बाद वह पूरी तरह से सहज थे।

शुक्रवार को भोजपुर जिले के नवादा थाना क्षेत्र के कातिरा मुहल्ला में सुबह टहलने के दौरान उनपर गोलियों की बौछार की गई, जिससे साफ हो जाता है कि हमलावर उनकी हरेक गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुये थे और किसी भी कीमत पर उन्हें मौत के घाट उतारना चाहते थे। ब्रमेश्वर मुखिया की हत्या के तत्काल बाद यह खबर जंगल की आग तरह पूरे भोजपुर में फैल गई और देखते-देखते अपने घरों से निकल कर बौराई भीड़ की शक्ल अख्तियार करते हुये व्यापक पैमाने पर तोड़फोड़ करने लगे। यहां तक कि घटनास्थल पर पहुंचे  भोजपुर के एसएसपी को भी उग्र लोगों ने वापस कर दिया। इसी तरह की प्रतिक्रियाएं अरवल,जहानाबाद और गया जिलों में देखने को मिली। लोगों का आक्रोश बता रहा था कि रणवीर सेना के प्रमुख ब्रमेश्वर मुखिया की हत्या को वे यूं ही भुलाने की स्थिति में नहीं है। एक बार फिर से वे लोग खून की होली खेलने के लिए तैयार है।

मामले की संवेदनशीलता का अहसास इसी से लगाया जा सकता है कि जैसे ही भागलुपर के दौरे पर सेवा यात्रा कर रहे सूबे के मुखिया नीतीश कुमार के पास ब्रमेश्वर मुखिया की हत्या की खबर पहुंची उन्होंने आनन-फानन में पूरे तंत्र की शक्ति को भोजपुर और उससे सटे हुये जिलों में कानून व्यवस्था को बनाये रखने के लिए झोंक दी। इसके साथ ही उन्होंने लोगों से अपील भी किया कि वे शांति व्यवस्था बनाये रखे, अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की इस अपील का असर भोजपुर जिले में न के बराबर पड़ा। लोग पुलिस समेत सरकारी तंत्र पर अपना गुस्सा निकालते रहे। यहां तक कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीपी ठाकुर और पशुपालन मंत्री गिरीराज सिंह लोगों से शांति बनाये रखने के लिए आग्रह करते रहे, लेकिन तोड़फोड़ जारी रहा। सूबे में बिगड़ती कानून और व्यवस्था की बात करते हुये राजद प्रमुख लालू प्रसाद भी इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से करने की मांग करते हुये नजर आये। बहरहाल ब्रमेश्वर मुखिया की हत्या के बाद बिहार एक फिर रक्तपात की दहलीज पर खड़ा हो गया है, यदि थोड़ी सी भी असावधानी हुई तो, एक बार फिर   बिहार  अपनी पुरानी पटरी पर लौट आएगा।

ब्रमेश्वर मुखिया को नजदीक से जानने वाले या तो उनके कट्टर समर्थक थे या फिर कट्टर दुश्मन। एक हिंसक समाज में अपना अस्तिव बचाने के लिए हिंसक होना अनिवार्य होता है। बिहार में रणवीर सेना के प्रमुख ब्रमेश्वर मुखिया के उदय को इसी नजरिये से देखा जा सकता है। यह वह दौर था जब लाल सलाम का नारा भोजपुर में चारों ओर गूंज रहा था और सूबे के मुखिया के तौर पर लालू प्रसाद अंदरखाते इसे और हवा देते हुये खुद के कुनबे को बचाने में लगे हुये थे। लाल सलाम का नारा लगाते हुये किसी की जमीन पर कब्जा करना, किसी की हत्या कर देना, लेवी मांगना, जन अदालत में हाजिर होने का फरमान जारी करना आम बात थी। इनसे निपटने में बिहार सरकार पूरी तरह से पंगु साबित हो रही थी। ऐसे में ब्रह्मेश्वर मुखिया ने सितंबर 1994 में रणवीर सेना का गठन कर उन किसानों को गोलबंद करना शुरु किया जिनको लाल सलाम का नारा रास नहीं आ रहा था, और जो सरकार की उदासीनता से निराश थे। इसके बाद रणवीर सेना की ओर से एक के बाद हमले शुरु हो गये और सैंकड़ों लोगों की लाशे बिछती चली गई। शक्ति बंदूक की नली से निकलती है के फार्मूला के तहत ही रणवीर सेना ने भी बंदूक का जवाब बंदूक से देना शुरु कर दिया और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए व्याकुल किसानों का एक बड़ा तबका रणवीर सेना का झंडा उठाने लगा और  हिंसा और प्रतिहिंसा का लंबा दौर चल निकला। ब्रह्मेश्वर मुखिया इस तबके के लिए एक प्रतीक का काम करने लगे।

बिहार में सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा के साथ मिलकर नीतीश कुमार की सरकार बनी और फिर बिहार में जातीय हिंसा का दौर थम सा गया। ब्रह्मेश्वर मुखिया को भी सलाखों के पीछे कर दिया और फिर लंबे मुकदमे बाजी के बाद कई मामलों में उन्हें रिहा कर दिया और कई मामलों में जमानत दे दी गई।

शुक्रवार की सुबह को की गई ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या को एक व्यक्ति विशेष की हत्या के रूप में नहीं बल्कि एक प्रतीक के सफाये के रूप में देखा जा रहा है। जो शक्तियां नीतीश कुमार के शासन में अपने अमन और चैन को लेकर आश्वश्त थी, एक बार फिर से उनके सक्रिय होने का खतरा बढ़ गया है। कहा तो यहां तक जा रहा है कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या महज प्रतिशोध की कार्रवाई नहीं है, बल्कि सूबे में अस्थिरता लाने की गहरी साजिश का यह एक हिस्सा है। अब सवाल यह उठता है कि बिहार में अस्थिरता आने से सीधा लाभ किसे मिल सकता है?  ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या को लेकर केंद्र में गृहमंत्रालय के भी कान खड़े हो गये हैं। इस संबंध जी सूबे के डीजीपी अभयानंद से ताबड़तोड़ खबरें तलब तो की ही जा रही है, गृहमंत्रालय के अधिकारी भी बिहार दौरे के लिए निकल पड़े हैं। इससे भी स्थिति की गंभीरता का अहसास होता है। आने वाले समय में इस तरह के कुछ और बानगी देखने को मिल सकते हैं, जिसका सीधा सूबे की कानून और व्यवस्था पर पड़ेगा। फिलहाल ब्रह्मेश्वर मुखिया में यकीन करने वाला जमात एक बार फिर से अपनी बंदूकों की सफाई में जुट गया है, नीतीश सरकार की सबसे बड़ी चुनौती इन बंदूकों को एक बार फिर से गरजने से रोकने की है। विपक्ष पहले से ही सूबे में कानून व्यवस्था के मामले पर ताल ठोक रहा है।

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