यशवंत की गिरफ्तारी से उठे चंद सवालात

जॉन स्टुअर्ट मिल स्वतंत्रता की सीमाओं पर रोशनी डालते हुये कहता है, “एक व्यक्ति तभी तक स्वतंत्रत है जबतक कि उसकी स्वतंत्रता किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता में बाधक न हो।” भड़ास 4 मीडिया के संचालक और संपादक यशवंत सिंह की गिरफ्तारी से कई तरह के संदेह और सवाल उठ रहे हैं, जिन पर गौर फरमाना लाजिमी है। सबसे पहला और अहम सवाल यह है कि क्या यशवंत सिंह को उनकी बैखौफ अभिव्यक्ति या फिर पारंपरिक मीडिया जगत से छुपी हुई घिनौनी खबरों को प्रकाश में लाने के लिए गिरफ्तार किया गया है या फिर वाकई में वह खबरों की आड़ में पूरी बदतमीजी के साथ उगाही करने में लगे हुये थे ?

यशवंत के खिलाफ कार्रवाई  इंडिया टीवी के मैनेजिंग  एडिटर बिनोद कापड़ी की पत्नी साक्षी जोशी कापड़ी की शिकायत पर हुई है। शिकायत के मुताबिक यशवंत उनसे 20 हजार रुपया मांग रहे थे, जान से मारने की धमकी भी दी, और बिनोद कापड़ी की कार को ओवरटेक करके उन्हें गालियां भी दी। विस्फोट डॉट कॉम पर संजय तिवारी यशवंत सिंह का हवाला देते हुये कहते हैं कि उन्होंने रात में बिनोद कापड़ी को फोन किया था, और जब उन्होंने फोन नहीं उठाया तो यशवंत ने उनकी पत्नी साक्षी का नंबर मिलाया। साक्षी ने इसका विरोध किया, फिर एसएमएस की आवाजाही हुई है। और फिर सुबह में साक्षी को सफाई देते हुये यशवंत ने एक एसएमएस भेजा जिसमें अपने दोस्तों और शुभचिंतकों से नोएडा में बुक किये एक फ्लैट के लिए किश्त भरने हेतु मदद मांग रहे थे। इसी एसएमए में 20 हजार रुपये का जिक्र है। यदि संजय तिवारी की बातों पर यकीन करें  तो यशवंत सिंह दोस्ताना अंदाज में बिनोद कापड़ी से 20 हजार रुपये हासिल करने की कोशिश कर रहे थे, और इसी दौरान साक्षी के साथ उन्होंने बदतमीजी कर दिया या फिर यशवंत के इस पहल को साक्षी बदतमीजी मान बैठी। अब एक बार फिर सवाल उठता है कि रात में साक्षी को फोन करके कौन सी पत्रकारिता कर रहे थे ? रात को किसी की निजी जिंदगी में अतिक्रमण करने की कोशिश करना पत्रकारिता तो नहीं ही हो सकता है। यदि वाकई में यह घटना सही है तो यशवंत सिंह दूसरों के स्वतंत्रता की भी धज्जियां ही उड़ा रहे थे। एक व्यक्ति के रूप में उनका यह रवैया स्वाभाविकतौर पर उन्हें पुलिस के हवाले ही करता है। इतना ही नहीं इस रोशनी में वह एक बेखौफ अपराधी के रुप में नजर आते हैं, जो किसी परिवार के दिल और दिमाग में खौफ पैदा करते हैं। चूंकि बिनोद कापड़ी और उनकी पत्नी साक्षी भी पत्रकारिता से ही जुड़ी हुई हैं, इसलिये यशवंत सिंह का चेहरा कुछ और भयानक हो जाता है। कानून और व्यवस्था में यकीन रखने वाला कोई भी पत्रकार भावावेश में आकर यशवंत सिंह के इस रवैया का समर्थन नहीं कर सकता। एक कदम आगे बढ़कर वह इसकी आलोचना ही करेगा।

यशवंत सिंह हमेशा सरोकारी पत्रकारिता को लेकर क्रूसेड  करने का दम भरते रहे हैं, जिसकी वजह से इनके मित्रों और शत्रुओं की संख्या में इजाफा होता रहा है। भड़ास 4 मीडिया पर क्रूसेड के अंदाज में बहुत सारी खबरें चली हैं, कई मीडिया घऱानों को आइना दिखाने का काम किया है भड़ास ने, इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यशवंत सिंह को वाकई में इसी क्रूसेडी लहजे की कीमत चुकानी पड़ रही है ? यदि ऐसा है तो यह यशवंत सिंह के खुरदरे चरित्र से भी भयानक है, इसमें कोई दो राय नहीं है। न्यू मीडिया की नुमाइंदगी करने वाले कई अहम लोग मसलन हस्तक्षेप के अमलेन्दू और मोहल्ला के अविनाश यशवंत सिंह के पक्ष में खड़े हैं। हालांकि इसके साथ ही यशवंत सिंह की बदतमीजियों का भी जिक्र करना वे नहीं भूलते हैं। न्यू मीडिया के इन नुमाइंदों को यह भय है कि परंपरागत मीडिया न्यू मीडिया के तेवर से त्रस्त है और हर कीमत पर न्यू मीडिया में उनके खिलाफ उठने वाली आवाजों को कुचलने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं। आज यशवंत सिंह के साथ जो कुछ हुआ है कल किसी और के साथ भी हो सकता है। ये लोग स्पष्टतौर पर न्यू मीडिया और परंपरागत मीडिया के बीच एक लकीर खींचने की कोशिश कर रहे हैं और खुद को यशवंत सिंह के पक्ष में खड़ा पा रहे हैं। इनकी इन कोशिशों की वजह से यशवंत सिंह की गिरफ्तारी समष्टि का रूप धारण कर रही है। यानि की मामला व्यक्ति विशेष का न होकर स्पष्ट रूप से समूह विशेष का हो जा रहा है। एक ओर अपने लंबे अनुभव के साथ परंपरागत मीडिया खड़ा है तो दूसरी ओर अभी-अभी कुलांचे भरने वाला न्यू मीडिया। न्यू मीडिया के इन नुमाइंदों की चिंताओं को भी खारिज नहीं किया जा सकता है। जिस लहजे में दो प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों ने यशवंत की गिरफ्तारी की खबर को प्रकाशित किया है, उससे तो स्पष्टतौर पर यही पता चलता है कि मौका मिलने पर ये लोग न्यू मीडिया को ध्वस्त करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगे। इस लिहाज से यशवंत सिंह को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता है और न ही छोड़ा जाना चाहिये।

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। यशवंत सिंह को भी पूरी ईमानदारी के साथ एक बार फिर बिना शराब पीये अपने अंदर झांककर देखना होगा। उन्हें चिंतन करना होगा कि जो कुछ उनके साथ हो रहा है उसके लिए किस हद तक वह खुद जिम्मेदार हैं। पत्रकारिता के काले पक्षों के खिलाफ क्रूसेड का नारा लगा कर उचकई करने का अधिकार वह हासिल नहीं कर सकते हैं और न ही यह अधिकार उन्हें दिया जाना चाहिये। तहजीब की भाषा तो उन्हें सीखनी ही होगी। नहीं तो महज शराबी और कबाबी पत्रकार के रुप में ही उनका शुमार होगा। उनसे उम्मीद की जाती है कि पत्रकारिता की दुनिया में- कम से कम वेब पत्रकारिता की दुनिया में-वह एक लंबी लकीर खीचेंगे। सलाखों के पीछे यशवंत सिंह को अपनी परछाई से बात करने का भरपूर मौका मिला होगा। यदि ईमानदरी से वह खुद की सुनेंगे तो यह उनके लिए और न्यू मीडिया के लिए बेहतर होगा। यशवंत के बहाने न्यू मीडिया को भी अपने चरित्र का अवलोकन करना चाहिये। कहीं ऐसा तो नहीं परंपरागत मीडिया के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाला न्यू मीडिया भी उन्हीं विरोधाभाषों में घिरता जा रहा है, जिनसे परंपरागत मीडिया संचालित हो रही है। तो क्या न्यू मीडिया दूसरों के स्वतंत्रता के मोल को समझेगी? या फिर आसुरी शक्ति की तरह पेश आएगी? इस सवाल का जवाब कौन देगा?

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