बाइट प्लीज (उपन्यास, भाग-7)

13.

दफ्तर से बाहर निकलते ही सुकेश की नजर माहुल वीर पर पड़ी, जो गार्डेन में सिगरेट का कश लगा रहा था। नीलेश उसके पीछे आ रहा था। उसने धीरे से सुकेश से कहा, “माहुल वीर से लेटर के बारे में बात कर लो, मौका अच्छा है।”

सुकेश माहुल की तरफ बढ़ चला, जबकि नीलेश कुछ दूरी पर बरामदे में ही खड़ा रहा। सुकेश और माहुल के बीच तब तक बात चलती रही जब तक कि माहुल का सिगरेट खत्म नहीं हो गया। सिगरेट खत्म करने के बाद माहुल एक बार फिर रत्नेश्वर सिंह के चैंबर में जाकर बैठ गया। करीब आने पर नीलेश की प्रश्नभरी आंखों की तरफ देखते हुये सुकेश ने कहा, “आधे घंटे के अंदर हमलोगों को लेटर मिल जाएगा। ”

करीब 20 मिनट बाद जब सुकेश और नीलेश को रत्नेश्वर सिंह के चैंबर में बुलाया गया तो वहां पर सिर्फ दो लोग मौजूद थे, रत्नेश्वर सिंह और नरेंद्र श्रीवास्तव। रत्नेश्वर सिंह के टेबल पर दोनों के लेटर पड़े हुये थे, जिन्हें बारी-बारी से वह देख रहे थे। जब नीलेश की आंखें नरेंद्र श्रीवास्तव से मिली तो उन्होंने उसे आगे बढ़कर रत्नेश्वर सिंह का पैर छूने का इशारा किया। यह समझने के बाद कि नरेद्र श्रीवास्तव उसे क्या करने के लिए कह रहे हैं नीलेश उनकी तरफ से मुंह फेर कर रत्नेश्वर सिंह को देखने लगा। यही इशारा नरेंद्र श्रीवास्तव ने सुकेश को भी किया और सुकेश ने भी उनके इशारों की अनदेखी की।

लेटर पर हस्ताक्षर करने के पहले रत्नेश्वर सिंह ने रंजन को बुलाया और पूछा, “दोनों ठीक है ना? ”

रंजन ने कहा, “हां सर,दोनों को काम करना आता है।”

ज्वाइनिंग लेटर लेने के बाद दोनों रत्नेश्वर सिंह से बारी-बारी से हाथ मिलाकर बाहर निकले। ज्वाइनिंग लेटर पर उस दिन की तारीख अंकित थी जिस दिन दोनों रांची गये थे।

14.

पटना जेपी गोलंबर के पास जेपी की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद कंट्री लाइव चैनल का टेस्ट सिग्नल शुरु हुआ और इसके साथ ही रांची से लेकर पटना ब्यूरो तक के तमाम लोग चैनल में अपनी मौजूदगी का अहसास कराने में जुट गये। बिहार में डिस्ट्रीब्यूशन की जिम्मेदारी एक निश्चित रकम देने का वादा के साथ मनोज को दे दी गई। जिला स्तर पर केबल आपरेटरों के साथ उसके पुराने धंधई ताल्लुकात थे। जहां जिसको जितना लगा पैसा देकर, या फिर अपने संबंधों का इस्तेमाल करते हुये उसने कई जिलों में कंट्री लाइव को आन स्क्रीन करा दिया। दूर दराज के कुछ ऐसे भी जिले थे जहां उसकी की पहुंच नहीं थी। ऐसे जिलों में रिपोटरों को ही केबल आपरेटरों से बात करके चैनल को आन स्क्रीन करने की जिम्मेदारी दे दी गई। अति उत्साह और खुद को स्क्रीन पर देखने की ललक में आकर कई रिपोटरों ने अपने–अपने क्षेत्र में चैनल को आन स्क्रीन करवा दिया।

रिपोटरों का कमान महेश सिंह ने संभाल लिया था। उसके मुंह से धुआंधार गालियां निकलती थी, बात करने के दौरान वह किसे गालिया दे रहा होता था, खुद उसे भी पता नहीं होता था। कभी-कभी वह खुद भी अपनी गालियों की लपेट में आ जाता था। पटना ब्यूरो में अधिकतर रिपोटर जिलों से आये थे। महेश सिंह की गालियां सुनने के बाद उन्हें गुस्सा तो आता था, लेकिन सामने इजहार नहीं करते थे। बाद में आपसी बातचीत के दौरान महेश सिंह को भी उन्हीं गालियों से नवाजते थे और इस तरह से संस्थान के अंदर गाली देने की संस्कृति जड़ पकड़ रही थी, खासकर रिपोटर और कैमरा मैन पूरी तरह से इसी संस्कृति में रमते चले गये। महेश सिंह इस संस्कृति के वाहन बने हुये  थे।

भुजंग अपने दरबानुमा केबिन में बैठकर किसी न किसी बात को लेकर मीटिंग करने में ही व्यस्त रहता था। कई बार उसने रिपोटरों से कुछ पूछताछ करने की कोशिश की थी लेकिन महेश ने सभी रिपोटरों को पूरी तरह से अपने काबू में ले लिया था और खुद बेकाबू हो गया था। वैसे भुजंग को भी खबरों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। बिहार चुनाव के मद्देनजर विशेष कार्यक्रम- बाकी है फैसला की शुरुआत की गई। भुजंग ने सुकेश और नीलेश को इसमें लगा दिया, साथ में सुमित राज को भी इस प्रोग्राम से जोड़ दिया। तृष्णा, मानसी, सुमन और शिव भी प्रोग्रामिंग के हिस्सा थे। प्रोग्रामिंग के सभी लोगों की डेली रिपोर्ट बनाने की जिम्मेदारी भुजंग ने नीलेश को दे दी थी। और डेली रिपोर्ट बनाने के दौरान ही नीलेश को यह पता चल गया था कि तृष्णा, मानषी और सुमन को हिन्दी टाइपिंग नहीं आती है। सुकेश तो इस मामले में पहले से ही सपाट था। नीलेश सभी लोगों को जिन्हें टाइपिंग नहीं आती थी तत्काल इसे सीखने के लिए जोर देने लगा।

मानषी पत्रकारिता के एक संस्थान की छात्रा थी, कंट्री लाइव में उसे ट्रेनी के रूप में सलेक्ट किया गया है इस बात लेकर उसे खुद आश्चर्य हुआ था। नीलेश के कहने पर जब उसने टाइपिंग में रुचि दिखाई थी तो नीलेश ने उसे सटीक टिप्स देते हुये कहा, “ देखो पूरा टाइपिंग कोर्स सिर्फ 30 घंटे का है और यह पूरी तरह से प्रैक्टिस है। इसमें दसों उंगलियों का इस्तेमाल करना हैं। बस सिर्फ इतना ध्यान रखो कि मंगल या यूनिकोड  फौन्ट को पकड़ो क्योंकि ये सभी जगह काम करेंगे. इस 30 घंटे के कोर्स को आप सात दिन में भी पूरा कर सकती हैं, यह आप पर निर्भर करता है। बस 30 घंटे टाइपिंग का अभ्यास करना है और फिर आप पत्रकारिता की दुनिया में व्यवहारिक रुप से दौड़ने के काबिल हो जाएंगी। ” इसके साथ ही उसने बगल में बैठे सुकेश को लक्षित करते हुये चुटकी ली, “ वैसे कुछ लोग हैं जो कभी नहीं सीख सकते, क्योंकि वे न सीखने की कसम खा चुके होते हैं।”

सुकेश पर इसका सकारात्मक असर हुआ और टाइपिंग सीखने के लिए ताबड़तोड़ मेहनत करने लगा। सात दिन के अंदर ही दोनों सजहता से हिन्दी में टाइपिंग करने लगे। लेकिन नीलेश के टाइपिंग स्पीड उनसे कई गुणा अधिक थी। इस बारे में एक दिन मानसी ने पूछा, “ सर, आपकी टाइपिंग स्पीड इतनी अच्छी कैसे है?”

“मैं दुनिया का सबसे तेज गति से टाइप करने वाले टाइपिस्ट हूं। यदि गिनिज बुक आफ वर्ल्ड रिकाड में भाग लूं, तो यह खिताब मेरे ही नाम होगा। यह कोई चमत्कार नहीं है, बस अभ्यास का कमाल है। मैं अखबारों में काम कर चुका हूं, और अखबारों में तो बिना टाइपिंग के एक कदम भी नहीं चला जा सकता है। मैं चाहता हूं कि तुम भी अपना टाइपिंग स्पीड इसी लेवल पर ले आओ।”

“अब पूरी दुनिया को टाइपिंग सीखाने का इसने ठेका ले लिया है, ” सुकेश ने चुटकी ली।

“देखो, मैं बहुत दिन के बाद बिहार आया हूं और बिहार के विकास की बात खूब हो रही है। नीतीश कुमार बिहार को विकसित राज्य बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। नीतीश कुमार के सपनों को सच करने के लिए मैंने भी बिहार के लिए कुछ लक्ष्य निर्धारित कर रखा है। मेरा लक्ष्य है पत्रकारिता में सक्रिय कम से कम पांच हजार लोगों को हिन्दी टाइपिंग सीखना। अब तुम लोग जिस रफ्तार से टाइपिंग सीख रहे हो उसे देखकर मैं यह कह सकता हूं कि मैं धीरे-धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा हूं। बिहार के विकास में कम से कम मैं इतना योगदान तो कर ही सकता हूं और यह मेरे अख्तियार में भी है,” नीलेश ने हंसते हुये जवाब दिया।

नीलेश ने जब तृष्णा को टाइपिंग सीखने को कहा तो उसने हाथ खड़े करते हुये जवाब दिया, “सर, मुझे टाइपिंग नहीं सिखनी है। मैं तो यहां एंकरिंग करने आयी हूं और एक एंकर को भला टाइपिंग से क्या काम? ”

नीलेश ने कहा,“टाइपिंग तो आपको सीखनी ही होगी, इसके बिना तो काम ही नहीं चलेगा। बस थोड़ा सा मेहनत है। फिर आपको खुद लगने लगेगा कि यह आपके लिए जरूरी है।”

नीलेश के दबाव डालने पर तृष्णा ने टाइपिंग करने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही उसे यह अहसास होने लगा कि यह मुश्किल काम है और उसके आंखों में आंसू भर आये। यह देखकर नीलेश थोड़ी देर के लिए परेशान हो गया, फिर तृष्णा के बगल में बैठते हुये कहा, “यदि आपको लगता है कि इसके बिना भी आपका काम चल जाएगा तो आप इसे न सीखे। हालांकि मुझे पूरा यकीन है कि आप इसे कर सकती हैं। अब मानषी और सुकेश को ही देखिये, दोनों धड़ल्ले से टाइप करने लगे हैं। ”

इसके बाद तृष्णा ने पूरे लगन से टाइपिंग सीखना शुरु कर दिया, और जल्द ही रफ्तार भी पकड़ ली। किसी नई चुनौती को स्वीकार कर उसे पूरा करने की प्रवृति उसमें भरपूर थी, बस उसके कांफिडेन्स को बुस्टअप करने की जरूरत थी और नीलेश ने वह कर दिया था। टाइपिंग के मामले में सुमन का भी बेहतर परफारमेन्स रहा। सुमित और शिव पहले से टाइपिंग में दक्ष थे।

अपनी खबरों को टाइप करने के लिए रिपोटर लोग गूगल ट्रांसलिटरेचर इस्तेमाल कर रहे थे। नीलेश ने उनसे कई बार कहा कि इसे छोड़ कर मंगल या यूनिकोड पर आ जाये, उनके कैरियर के लिहाज से भी यह बेहतर होगा, क्योंकि अमूमन सभी राष्ट्रीय चैनलों में इसी का इस्तेमाल हो रहा है। नीलेश की बात पर रिपोटर हां में हां तो मिलाते थे लेकिन हिन्दी में टाइपिंग सीखने की जहमत नहीं उठाते थे। ऐसा न कर पाने के पीछे उनके पास अक्सर एक ही तर्क होता था, “फिल्ड में काम बहुत रहता है, थक जाने के बाद कुछ सीखने की इच्छा नहीं होती, और वैसे भी गूगल ट्रांसलिटरेचर से काम तो चल ही जाता है।” रिपोटरों की कोशिश यही होती थी कि उनके स्क्रीप्ट कोई और टाइप कर दे।

15.

रिपोटरों को रांची फीड भेजने के लिए प्रोग्रामिंग में ही दो कंप्यूटर अलग से लगा दिये गये थे। फीड भेजने के लिए एफटीपी और लीज लाइन का इस्तेमाल होता था। वहीं पर एक कोने में सर्वर भी लगा दिया गया था, जिसके कारण कमरे का तापमान असहज रहता था। फीड भेजने के लिए तमाम रिपोटर अक्सर आपस में उलझते रहते थे। एक तो वहां बैठने की जगह वैसे ही कम थी, रिपोटरो की वजह से वहां का माहौल पूरी तरह से मछली बाजार जैसा हो जाता था। छोटी सी जगह में एक-दूसरे पर चिखते-चिल्लाते हुये रिपोटर इनफार्मल हो जाते थे। सबसे अधिक परेशानी नीलेश को होती थी, स्क्रीप्ट लिखने के लिए वह अपने को पूरी तरह से कंसंट्रेट नहीं कर पाता था। धीरे-धीरे उसे अहसास हो गया था कि इसी माहौल में ही उसे स्क्रीप्ट लिखना होगा। उसकी पूरी कोशिश होती थी कि इस माहौल से प्रभावित हुये बिना वह अपना काम सही तरीके से करता रहे।

वहां पर लगे अधिकतर कंप्यूटर पुराने थे, वायरस ग्रस्त। नीलेश, रंजन और भुजंग से कई बार कह चुका था कि इन कंप्यूटरों में एंटी वायरस डलवा दे। कई बार नीलेश के लिखे हुये फाइल भी करप्ट हो चुके थे। भुजंग ने तो साफ तौर पर कह दिया था कि इन्हीं कंप्यूटरों पर काम करना होगा, एंटी वायरस की जरूरत रत्नेश्वर सिंह नहीं समझते हैं। इसी बात को रंजन ने कुछ साफ्ट लहजे में कहा था, “तुम क्यों पचड़े में पड़ते हो, यहां मालिकान को पता ही नहीं है कि एंटी वायरस क्यों जरूरी है। जो है, जैसा है उसी पर काम चलाओ। ”

इसके जवाब में नीलेश कहता, “यहां काम चलाना है या बेहतर काम करना है?”

सुमित को चुनावी प्रोग्राम बाकी है अभी फैसला की एंकरिंग की जिम्मेदारी दी गई थी। इस प्रोग्राम की मोनेटिरंग रंजन कर रहा था। प्रत्येक एपिसोड के लिए जिलों से फीड मंगाने के का काम सुकेश के जिम्मे था और फीड को देखकर हर रोज एक एपिसोड लिखने का काम नीलेश ने संभाल लिया था। प्रोग्रामिंग डेस्क के ठीक सामने वाले कमरे में स्टूडियो बनकर तैयार हो गया था। स्टूडियो में पहले दिन की शूटिंग को देखकर नीलेश ने जोरदार तरीके से रियेक्ट किया।

छोटे से कमरे में जिसे स्टूडियो का शक्ल दे दिया गया था सुमित तेज रोशनी में कैमरे के सामने कोर्ट और टाई पहन कर खड़ा था। पूरा स्टूडियो पेंट की तेज बदबू से भरा हुआ था। वहां मौजूद सभी लोगों की आंखों में जलन हो रही थी। नीलेश की इच्छा हो रही थी कि वह स्टूडियो से बाहर भाग जाये, लेकिन रंजन उसे बार-बार रोक रहा था। बड़े फौंट में प्रिंटर से निकाले गये स्क्रीप्ट के पन्ने सुकेश के हाथों में थे। टेली प्राम्टर न होने की वजह से सुकेश सक्रीप्ट के पन्ने को मोड़कर कैमरा के ऊपर रखकर कर सुमित से पढ़ावाने का रिहर्सल करवा रहा था। सामने से पड़ रही तेज रोशनी और पेंट की बदबू से सुमित की आंखों से लगातार पानी निकल रहा था, उसकी आंखे जल रहे कोयले की तरह लाल हो गई थी। अपने आंसूओं को साफ करते हुये वह बार-बार पढ़ने की असफल कोशिश करता जा रहा था। अपनी आंखों को चौड़ा करके वह थोड़ी देर पढ़ता, लेकिन लगातार निकल रहे आंसूओं की वजह से उसे शब्द धुंधले नजर आने लगते थे और चेहरे का रंग बिगड़ जाता, मानो किसी लाश पर विलाप करके वह अभी-अभी उठा है।

“ये आप लोग क्या कर रहे हो, यदि इस स्थिति में यह एंकरिंग करेगा तो इसकी आंखे ही नष्ट हो जाएगी,” अपनी आंखों को मलते हुये नीलेश ने जोर से कहा।

“तो क्या प्रोग्राम नहीं बनेगा?”, सुकेश ने पूछा।

“भाड़ में गया प्रोग्राम। प्रोग्राम शूट करने के लिए स्टूडियो में जरूरी सुविधाएं तो होनी ही चाहिये। यहां एक टेली प्राम्पटर की तत्काल आवश्यकता है। जब आपके लोग ही हेल्दी नहीं रहेंगे तो हेल्दी प्रोग्राम कैसे बनेगा,” नीलेश ने विरोध जताया।

“टेली प्राम्पटर मिलने वाला नहीं है और प्रोग्राम भी बनाना है। ये सब फिलोसफी छोड़ो और शूट करो,” रंजन ने कहा।

“काम करने की यह आदर्श स्थिति नहीं है। यदि इसकी आंखे जाती रहेंगी तो कौन जिम्मेदार होगा?”, नीलेश के स्वर में झुंझलाटह थी।

“बिहार के बहुत सारे चैनलों में इससे भी बुरी स्थिति है, फिर भी लोग काम कर रहे हैं। स्टूडियो के रिक्वारमेंट को मैं भी समझता हूं, लेकिन जब टेली प्रामप्टर है ही नहीं तो क्या किया जाये ,” रंजन ने कहा।

“आप लोग क्यों उलझ रहे हैं, मैं पढ़ने के लिए तैयार हूं ना, ” एक बार फिर अपनी आंखों को साफ करते हुये सुमित ने कहा।

“भाई सीधी सी बात है, सुमित इस स्थिति में भी एंकरिंग करने के लिए तैयार है और तुम लोग भी प्रोग्राम बनाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो। लेकिन ऐसी स्थिति में मैं लोगों से काम नहीं ले सकता हूं। तुमलोगों को रोक तो नहीं सकता लेकिन स्टूडियो के इस काम में भागीदार भी नहीं बन सकता। आज के बाद स्टूडियो में शूटिंग के दौरान मैं नहीं रहूंगा, इतना तो मैं कर ही सकता हूं,” इतना कह कर नीलेश स्टूडियो के बाहर निकल गया।

अपने कंप्यूटर पर आकर बैठा तो पता चला कि वायरस ने उसके कई फाइलों को चट कर रखा है। रिपोटरों का शोर-गुल जारी था। अपनी हाथों को डेस्ट पर समेट कर नीलेश ने अपना सिर उस पर रखकर आंखे बंद कल ली। उसके जेहन में नोएडा स्थित चैनल एलेवन के द्श्य घूमने लगे, जहां उसे राष्ट्रीय अखबार दैनिक जागृति से शिफ्ट किया गया था।

जारी…..

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