बेनी की बेलगाम बयानबाज़ी के मायने और बहाने

जैसे हिंदी फ़िल्मों से अब कहानी गुम है, वैसे ही अब राजनीति से विचार गुम हैं। सामाजिक न्याय की राजनीति ने इस विचारहीन राजनीति को और पंख दिए हैं । विचार की जगह जाति की राजनीति ने देश भर में अब डंका बजा रखा है। इस जातीय राजनीति के गठजोड़ में सांप्रदायिकता विरोध के बुखार की छौंक की तफ़सील और जोड़ लीजिए। सारे गुनाह माफ़ हो जाते हैं। फिर आप बेलगाम हो कर चाहे जो बोलिए, जो करिए, राज आप का है। बेनी प्रसाद वर्मा का मंहगाई से खुश होने वाला ताज़ा बेलगाम बयान इसी राजनीति की एक कड़ी है।

बेनी वर्मा आखिर हैं क्या? और कि राजनीति में उन की हैसियत क्या है? नहीं जानते हैं तो जान लीजिए कि कुर्मी समाज उन को चाहे जो माने, वह अपने को कुर्मी समाज का राजा मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कल्याण सिंह अपने को लोधों का राजा मानते हैं। कल्याण सिंह मिट गए हैं पर उन का यह गुमान अभी भी नहीं गया है। बेनी प्रसाद वर्मा अभी मिट-मिट कर भी खडे़ हैं। तो इस लिए कि अभी वह कांग्रेस में हैं। जिस दिन निकल जाएंगे या निकाल दिए जाएंगे कांग्रेस से तो उन को भी अपना गुमान नापने का थर्मामीटर मिल जाएगा।

एक समय मुलायम के मुंहलगे रहे बेनी वर्मा को आज मुलायम ही की नाक में फांस लगाने के लिए कांग्रेस ने पाल रखा है। किसी पालतू की तरह। हालां कि उन के चेहरे पर विनम्रता की जगह जो अहंकार का सागर छलकता दिखता रहता है नित्य-प्रति, वह उन के कुर्मी होने के गुमान का है। उन को लगता है कि वह कुर्मियों के श्रेष्ठ नेता हैं। बल्कि इस से भी दो कदम आगे की भी वह सोच जाते हैं कि कुर्मीजन उन की खेती हैं, कुर्मी जाति के लोग उन की प्रजा हैं, और वह उन के राजा। हालां कि उन का यह गुमान एकाधिक बार उन की बाराबंकी में उन के कुर्मी भाई लोग तोड़ चुके हैं, उन को और उन के बेटे को चुनाव हरवा कर। अपनी पारंपरिक सीट मसौली से वह भी चुनाव हार गए। बाद में बेटा भी हारा। दरियाबाद से भी बारी-बारी बाप बेटे हारे। पर उन का गुमान है कि जाता नहीं। हालां कि उन के साथ के कुछ दौरों में मैं ने एक समय देखा है कि बाराबंकी के कुर्मी समाज के लोग उन को लगभग देवता का दर्जा देते रहे थे। वह जाते भी तब गांव-गांव थे। और एक-एक आदमी को नाम से गुहारते थे। उन के बच्चों को गोद में ले कर खिलाने लगते थे। यह तब की बात है जब मुलायम राज में वह पी डब्ल्यू डी मिनिस्टर थे। पर दिक्कत यह हुई कि बरसों-बरस मिनिस्टर रहने के बावजूद उन्हों ने अपनी ज़ेब तो भरपूर भरी, पर बाराबंकी को ठीक लखनऊ से सटा होने के बावजूद विकास से वंचित रखा। कुछ सड़क ज़रुर बनवाई। और जब संचार मंत्री थे तब फ़ोन लाइन पहुंचाई। पर फ़ोन रखने की हैसियत नहीं दिलवा पाए। खास कर बेनी वर्मा का क्षेत्र तो आज भी बहुत पिछड़ा हुआ है। इसी पिछडे़पन की सज़ा बाराबंकी बेनी वर्मा और उन के बेटे को चुनाव हरा कर देता रहा है। अंतत: बेनी को बरास्ता बहराइच के कैसरगंज जीतते- हारते हुए अपनी पार्टी बना कर अयोध्या से हार पर हार भुगतते हुए अब कांग्रेस के टिकट पर गोंडा से सांसद होने की राह पकड़नी पडी़ है। अब तो बाराबंकी के सांसद पी.एल.पुनिया हैं। पर बेनी अब भी बाराबंकी को अपनी जागीर मानते हैं। अभी बीते विधानसभाई चुनाव में भी बेनी बेलगाम हुए थे। पहले तो उन्हों ने मुस्लिम आरक्षण पर शहादत भरा बयान दे कर सलमान खुर्शीद की हां में हां मिलाई और फिर चुनाव आयोग से माफ़ी मांग कर पिंड छुड़ाया। और फिर तभी एक बयान में वह बह कर कह गए कि पुनिया तो बाहरी हैं, उन का बाराबंकी से क्या लेना-देना? कांग्रेस के कई नेताओं को पुनिया की पैरवी में उतरना पड़ा और बयान देना पड़ा कि पुनिया बाहरी नहीं हैं। दिक्कत यह है कि आई. ए.एस. भले रहे हैं पुनिया। पर पुनिया भी उसी जातिवादी मंथन से निकले हुए रत्न हैं तिस पर सोने पर सुहागा यह कि वह दलित भी हैं। दूसरे जैसे बेनी का उपयोग कांग्रेस मुलायम की नाक में फांस लगाने के लिए करती है ठीक वैसे ही पुनिया का उपयोग मायावती की नाक में फांस लगाने के लिए करती है। इसी बाराबंकी से एक बडे़ मकबूल शायर हुए हैं खुमार बाराबंकवी। उन्हीं के एक शेर का मिसरा है कि मज़बूरियों ने हाय कितने फ़रिश्ते बनाए हैं। तो कांग्रेस की मज़बूरियों ने बेनी प्रसाद वर्मा और पी.एल.पुनिया को फ़रिश्ता बना रखा है। अब यह गठबंधन की ही मज़बूरी है कि मुलायम के कठोर वचन भी कांग्रेस को मीठे लगते हैं और उन पर नकेल लगाने के लिए बेनी प्रसाद वर्मा जैसे लोग पालतू बना कर रखे जाते हैं। बेनी प्रसाद वर्मा का नया टास्क था कि मुलायम के तीसरे मोर्चे की दहाड़ की हवा वह अपने कुतर्क से ही निकालें। यह टास्क तो उन्हों ने बखूबी पूरा किया पर कुर्मियों का राजा होने का अहंकार उन्हें ज़रा बहका गया। और वह टिमाटर के बढ़ते भाव पर आ गए। हर्षित हो गए मंहगाई पर। पिछड़ों की राजनीति और किसान याद आ गए तो उन्हों ने किसानों में अपनी ऊंची करने के चक्कर में उन के कंधों पर अपना पैर रख दिया। और ज़रा क्या पूरा फिसल गए। अब जैसे बीते चुनाव में सलमान खुर्शीद के मुस्लिम आरक्षण वाले बयान की पैरवी और बचाव में बेनी उतरे थे, ठीक वैसे ही अब की बेनी की पैरवी और बचाव में सलमान खुर्शीद उतर आए हैं। सलमान खुर्शीद तो खैर सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील हैं पर बहुत कम लोग जानते हैं कि बेनी प्रसाद वर्मा भी वकील हैं। बी.ए., एल.एल.बी.। अलग बात है कि उन्हों ने विधायक बनने के बाद एल.एल.बी. की पढ़ाई की और बाकायदा प्रैक्टिस तो कभी करते किसी ने देखा नहीं। पर एक बात तय है कि दोनों ही ने एक दूसरे की पैरवी बहुत ही खराब ढंग से की है। अब जातिवादी राजनीति का तावा गरम है सो सरकार कोई भी हो अपनी रोटी तो उस पर सेंकेगी ही पर यह ज़रुर है कि अगर वैचारिक राजनीति का ज़माना होता तो अब तक सलमान खुर्शीद को और अब बेनी वर्मा को मंत्री पद से निश्चित ही हाथ धोना पड़ गया होता। लेकिन सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक विरोध की राजनीति के नाम पर जातिवादी राजनीति का यह स्वर्णकाल चल रहा है। सो सब कुछ ज़ायज़ हो गया है।  नहीं सोचिए कि किसान आत्महत्या करते जा रहे हैं, बिचौलिए तिजोरी भरते जा रहे हैं और एक कैबिनेट इस्पात मंत्री इस्पात जैसी कड़ाई और पूरी बेशर्मी से कहता है कि मंहगाई से उसे खुशी होती है। अभी कुछ दिन पहले ऐसे ही अपने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहूलवालिया जो लाखों के बाथरूम इस्तेमाल करते हैं और बाईस रुपए कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर मानते हैं ने पेट्रोल के दाम बढने पर कहा था कि यह अच्छी खबर है। आहूलवालिया तो आई.ए.एस. अफ़सर रहे हैं, ज़मीन से कटे हुए आदमी हैं पर बेनी वर्मा तो गन्ना किसानों की लड़ाई लड़ते हुए राजनीति में आए हैं। पहली बार जब वह उत्तर प्रदेश में मंत्री बने भी थे तो गन्ना मंत्री ही बने थे। लाख जातिवादी राजनीति के दीमक उन के दिमाग में घूमते हों पर इतना तो वह भी जानते ही हैं कि किसान को उस की पैदावार की क्या कीमत मिलती है? और कितना बिचौलिए और व्यापारी को? किसान को तो आज भी न्यूनतम समर्थन मूल्य ही मिलता है जैसे तैसे मर-खप कर। पर बाकी व्यापार मैक्सिमम रिटेल प्राइस पर चलता है। यह देश कृषि आधारित देश है। पूरी अर्थव्यवस्था खेती और मानसून के भरोसे टिकी पडी़ बताई जाती है। पर किसानों की पैदावार के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार हर साल ऐसे घोषित करती है गोया किसानों को भीख दे रही हो। तिस पर भी गेहूं खरीद या धान खरीद या फिर गन्ना खरीद में किसान क्या क्या सहता भुगतता है, वह ही जानता है। खाद-बीज तो वह अधिकतम मूल्य पर पाता है पर अपनी उपज वह न्यूनतम मूल्य पर देता है। कुछ खास पैदावार को छोड़ कर बाकी पैदावार पर तो उसे वह न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिलता। तिस पर अनाज का सड़ जाना, बोरा न होना, रिश्वत देना आदि सरकारी समस्याएं अलग हैं। चीनी मिलें गन्ना किसानों का जो शोषण करती हैं, सालों-साल बकाया लगाती हैं, यह भला किस से और किस सरकार से छुपा है? जानते सब हैं। पर सरकारी नीतियां सारी की सारी गरीबों और किसानों के खिलाफ़ हैं। अगर न होतीं तो बेनी प्रसाद वर्मा जैसे जातिवादी नेता कांग्रेस के लिए उपयोगी नहीं होते और न ही उन की यह हिम्मत होती यह कहने की कि मंहगाई से उन्हें खुशी होती है। जनता उन्हें भून कर खा जाती। बहुत दिन नहीं हुआ मायावती राज में चित्रकूट में कुख्यात अपराधी ददुआ एक पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था। कुछ पुलिसकर्मी भी इस मुठभेड़ में शहीद हुए थे। पर बेनी प्रसाद वर्मा इस मुठभेड़ को फर्ज़ी करार देते हुए खून के आंसू रोए थे। तो सिर्फ़ इस लिए कि ददुआ कुर्मी समुदाय से था। बेनी की नज़र कुर्मी वोटों के लिए कलप रही थी। एक कुख्यात डाकू के मारे जाने पर उन की बेताब रूदाद तो दिखती है पर देश के गरीब किसानों और आमजनों के लिए मंहगाई उन के हर्ष का सबब कैसे बन जाती है भला? क्या बेनी और उन के जैसे नेता ज़मीन और जनता से इतना कट गए हैं?

वह कहते हैं कि लैपटाप के दाम, मोबाइल के दाम बढ़ने पर लोग कुछ नहीं कहते पर टिमाटर के दाम बढने पर हल्ला करने लगते हैं। टमाटर को टिमाटर कह कर वह अपना गंवई लुक भी देना नहीं भूलते। सत्ता का नशा उन पर इस कदर सवार है कि अपनी गलतबयानी पर उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं है। किसी पेशेवर बेशर्म की तरह कह रहे हैं कि उन के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। एक समय मुलायम के राज में वह नंबर दो हुआ करते थे। पर जब मुलायम सिंह के पास घुन बन कर अमर सिंह समाजवादी पार्टी में अवतरित हुए तो वह धीरे-धीरे हाशिए से भी बाहर हो गए। राजा से प्रजा बन गए। बात यहां तक पहुंची कि उन्हें मुलायम से बगावत कर अपनी पार्टी बनानी पडी़। हालां कि तब के चुनाव में वह मधु कोड़ा की तर्ज़ पर पर मुख्यमंत्री बनने का सपना भी जोड़ बैठे थे। पर मुलायम के बिना उन की राजनीतिक ज़मीन खिसक गई। उन की पार्टी का कोई भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीत पाया। खुद भी ज़मानत नहीं बचा पाए। मज़बूर हो कर कांग्रेस की नाव पर सवार हुए बेनी वर्मा। और कांग्रेस ने भी उन्हें लगभग अपमानित करते हुए राज्यमंत्री बनाया। तब जब कि उसी केंद्र में मुलायम के साथ कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। देवगौड़ा के राज में संचार मंत्री। तो भी मुलायम और अमर सिंह को सबक सिखाने की गरज़ से वह यह अपमान पी गए। बाद में कांग्रेस ने भी उन के समर्पण और उपयोगिता को देखते हुए प्रमोट कर उन्हें कैबिनेट मंत्री बना दिया और मुलायम के खिलाफ़ बयानबाज़ी के लिए घोड़ा बना लि्या। बीते चुनाव में भी बेनी चुनाव सभाओं में अपने को बतौर मुख्यमंत्री ही पेश करते और सपना जोड़ते रहे। राहुल गांधी भी उन्हें भाव देते रहे और अपने साथ रखते रहे। पर कांग्रेस का तंबू जब चुनाव में उखड़ गया तो बेनी का मुख्यमंत्री बनने का सपना भी उजड़ गया। लेकिन मुलायम को घाव देने के लिए उन के तरकश से तीर कभी खत्म नहीं हुए। न शायद होंगे। मुझे लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क की एक सभा भुलाए नहीं भूलती। उस सभा में सभी थे पर बेनी प्रसाद वर्मा नहीं थे। वह अमर सिंह का समाजवादी पार्टी में अवतार का काल था। बेनी अपनी उपेक्षा से नाराज हो कर नहीं आए थे। मुलायम ने कई संदेश और संदेशवाहक भेजे बेनी को बुलाने खातिर। पर बेनी नहीं आए। अंतत: मुलायम ने मंच पर माइक संभाला और ऐलान किया कि आप लोग यहीं रुकें मैं बेनी बाबू को लेने जा रहा हूं। मुलायम मंच और जनसभा छोड़ कर गए और लौटे तो साथ में बेनी प्रसाद वर्मा को ले कर ही लौटे। फिर मैं ने बेनी बाबू को लखनऊ की एक और जनसभा में देखा। गोमती नदी के किनारे लक्ष्मण पार्क में। हरिवंश राय बच्चन के नाम डाक टिकट जारी करने आए थे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी। मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे। अमिताभ बच्चन भी सपरिवार थे। मुलायम मय अमर सिंह अपने मंत्रिमंडल के साथ। खूब भीड़-भाड़ भी। और उसी भीड़-भाड़ में बेनी प्रसाद वर्मा भ। उन के लिए वी.आई.पी. पास की भी व्यवस्था नहीं थी। वह जनता गैलरी में दिखे। जब कि एक से एक नवोधा आगे की लाइन में। वापसी में मैं ने उन से पूछा भी तो आकाश निहारते हुए वह बोले, ‘जहां का पास होगा वहीं तो बैठूंगा।’ इस के बाद वह कुछ नहीं बोले। मैं तभी समझ गया कि अब बेनी प्रसाद वर्मा बहुत दिनों तक नहीं रहने वाले मुलायम के साथ। पर जल्दी ही वह फिर मुख्यधारा में आते दिखे। पर वह चुनावी मौका था। बसपा राज आ गया था। बेनी अब मुलायम के लिए फिर दूध की मक्खी हो गए। गोमती में तब से अब तक बहुत पानी बह गया। उसी पानी में मुलायम और बेनी के संबंध भी बह गए। और अब वही बेनी कांग्रेस में रह कर मुलायम की नाक में फांस लगाने के लिए यूज़ हो रहे हैं। और जो चाह रहे हैं अनाप-शनाप बोल रहे हैं। आखिर सामाजिक न्याय है। वे लोग जाग चुके हैं। उन का राज है। महगाई किसी को मार रही हो तो मारे, उन की बला से। उन को खुशी है कि मंहगाई बढ़ रही है। आप उन की जय-जयकार लगाइए। जय हो !

साभार :  sarokarnama.blogspot.com

दयानंद पांडेय

About दयानंद पांडेय

अपनी कहानियों और उपन्यासों के मार्फ़त लगातार चर्चा में रहने वाले दयानंद पांडेय का जन्म 30 जनवरी, 1958 को गोरखपुर ज़िले के एक गांव बैदौली में हुआ। हिंदी में एम.ए. करने के पहले ही से वह पत्रकारिता में आ गए। वर्ष 1978 से पत्रकारिता। उन के उपन्यास और कहानियों आदि की कोई 26 पुस्तकें प्रकाशित हैं। लोक कवि अब गाते नहीं पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रेमचंद सम्मान, कहानी संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ पर यशपाल सम्मान तथा फ़ेसबुक में फंसे चेहरे पर सर्जना सम्मान। लोक कवि अब गाते नहीं का भोजपुरी अनुवाद डा. ओम प्रकाश सिंह द्वारा अंजोरिया पर प्रकाशित। बड़की दी का यक्ष प्रश्न का अंगरेजी में, बर्फ़ में फंसी मछली का पंजाबी में और मन्ना जल्दी आना का उर्दू में अनुवाद प्रकाशित। बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए, हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, अपने-अपने युद्ध, दरकते दरवाज़े, जाने-अनजाने पुल (उपन्यास),सात प्रेम कहानियां, ग्यारह पारिवारिक कहानियां, ग्यारह प्रतिनिधि कहानियां, बर्फ़ में फंसी मछली, सुमि का स्पेस, एक जीनियस की विवादास्पद मौत, सुंदर लड़कियों वाला शहर, बड़की दी का यक्ष प्रश्न, संवाद (कहानी संग्रह), कुछ मुलाकातें, कुछ बातें [सिनेमा, साहित्य, संगीत और कला क्षेत्र के लोगों के इंटरव्यू] यादों का मधुबन (संस्मरण), मीडिया तो अब काले धन की गोद में [लेखों का संग्रह], एक जनांदोलन के गर्भपात की त्रासदी [ राजनीतिक लेखों का संग्रह], सिनेमा-सिनेमा [फ़िल्मी लेख और इंटरव्यू], सूरज का शिकारी (बच्चों की कहानियां), प्रेमचंद व्यक्तित्व और रचना दृष्टि (संपादित) तथा सुनील गावस्कर की प्रसिद्ध किताब ‘माई आइडल्स’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरे प्रिय खिलाड़ी’ नाम से तथा पॉलिन कोलर की 'आई वाज़ हिटलर्स मेड' के हिंदी अनुवाद 'मैं हिटलर की दासी थी' का संपादन प्रकाशित। सरोकारनामा ब्लाग sarokarnama.blogspot.in वेबसाइट: sarokarnama.com संपर्क : 5/7, डालीबाग आफ़िसर्स कालोनी, लखनऊ- 226001 0522-2207728 09335233424 09415130127 dayanand.pandey@yahoo.com dayanand.pandey.novelist@gmail.com Email ThisBlogThis!Share to TwitterShare to FacebookShare to Pinterest
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