निष्कर्ष (कहानी)

परिचय: पल्लवी वर्मा ग्रास रुट के कंटेट को उठाकर मनोवैज्ञानिक तरीके से कथाएं बुनती चली जाती हैं। फैंटेसी के साथ रियलिज्म का अदभुत रोमांटिक टच उन्हें निसंदेह पुश्किन की श्रेणी में खड़ा कर देता है। और सही मायने में वह भारतीय लेडी पुश्किन नजर आती हैं। इस कहानी में रंग युक्त आबजेक्ट के साथ कुछ रुमानी तरीके से पेश आ रही हैं, जैसे कोई पेंटर अपने ब्रश और रंग के साथ-साथ उस बोर्ड से भी रोमांस करता है जिसपर रंग में डूबे हुये उसके ब्रश चल रहे होते हैं। सोचती हूं कि सोचा जाए की ये एसटीडी, पीसीओ, झेराक्स, इत्यादी के बोर्ड पीले रंग के क्यूँ कर होते हैं?...बस यहीं से कहानी शुरु होती है। और फिर एक साथ कई दुनिया बुनती हुई वह निष्कर्ष पर भी पहुंच जाती है….निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले की तमाम प्रक्रियाएं रुपहले संसार समेटते हुये कई धाराओं में निकल पड़ती है..कैसे …खुद पढ़िये…. 

पल्लवी वर्मा

सोचती हूं कि सोचा जाए की ये एसटीडी, पीसीओ, झेराक्स, इत्यादी के बोर्ड पीले रंग के क्यूँ कर होते हैं?

मेरा घर चौथी मंजिल पर है, और मैं हमेशा सीढ़ियों से आती-जाती ..अररर, चढ़ती-उतरती दिखाई देती हूं। जबकि मेरे साल-भर पुराने (मैं यहाँ नयी हूं) पड़ोसियों ने यहां अपने कुत्तों को भी लिफ्ट की आदत लगा रखी है। बिजली जाने पर वो (कुत्ते) भी बिजली विभाग वालों पर मन ही मन गुर्राते होंगे। ख़ैर…

तो सीढ़ियों से यहां का नज़ारा देखते ही बनता है, क्यूंकि पीछे बड़ा सा तालाब है। लिफ्ट में ये मज़ा जाता रहता है।

पीछे भेल वालों ने एक कॉपरेटिव बना के कालोनी बना ली है। एकदम तालाब के किनारे। सभी घर किसी भी शहरी बसाहत के सामान्य घरों जैसे हैं, एक को छोड़ के।

ये जो घर है, पीले रंग का है। हल्दी जैसे पीले रंग का। बाक़ी के तुलनात्मक दृश्य नहीं इमैजिन करवाऊं आप से तो ही अच्छा!

हरेक घर में कोई-न-कोई चहल-पहल देखती रहती हूँ, चढ़ते-उतरते। परन्तु इस घर में मैंने आज तक किसी को नहीं देखा। टेरेस पर रखे पौधे हरियाले रहते हैं। पता चलता है कि कोई तो सुबह पानी डालने आया होगा। कार कभी शेड के अन्दर होती है, तो कभी बाहर। आख़िर कोई तो चला के लाया होगा।  परन्तु नहीं, वो ‘कोई’ तो कभी दीखता ही नहीं।

शायद शर्मीला है। शायद घमंडी है?! शायद बीमार है?

पर तीनों ही सूरतों में वो अपने घर को पीला क्यूँ पुतवाता?

 हमारी बिल्डिंग का रंग है ग्रे, यानि की सलेटी। धूम्रवर्ण। ऊपर नीचे करते हुए हर किसी की ओर मुस्कुराते हुए जब मैं देखी जाती हूँ, तब दरअसल मैं तालाब के पानी की कलकल सुनने को आतुर, उस कोलाहल को कोस रही होती हूं। उस आवाज़ में मुझे जीवन का एहसास होता है। और कभी-कभी तो जान-बूझ कर पीले मकान को नहीं देखती, क्यूंकि मैं भी किसी को वहां इमैजिन कर के इत्मीनान कर लेना चाहती हूं।|

मेरी ‘बेस्ट फ्रेंड’ नूपुर कहती थी कि यह पृथ्वी एक विशाल जीव है, यह सांस लेता है, इसकी एक चेतना है। और पृथ्वी के सभी मनुष्यों की चेतना के जोड़ का प्राप्य पृथ्वी की चेतना है। इसी तर्क से जाते हुए इन घरों और बिल्डिंगों के रहने वालों कि चेतनाओं  का जोड़ क्रमशः उस घर या बिल्डिंग की चेतना ही हुआ ना?

मैं उसे हर चीज़ रंगों के उदहारण से समझाती। मेरे लिए भावनाएं भी रंग थीं, और लोग भी, फूल भी, और पानी भी। हाँ, पानी। हम दोनों ये सारी बातें पानी के किनारे बैठ के किया करते थे। 

वो विदेश ना चली गयी होती, तो इस तालाब को दिखाने मैं उसे यहाँ बुलाती। पुराने दिन लौट आते। पर तब भी, वो उस पीले घर को अचेतन बताती, और इस कोलाहल भरी मेरी बिल्डिंग को चेतन, जिंदा, जीवन से भरा हुआ। और मैं हमेशा की तरह उस पर इस तरह हंसती जैसे कि वो कुछ भी नहीं जानती, और कहती कि पगली! देख ये बिल्डिंग ग्रे है, मनहूस सी! और वो पीला बँगला है, कितना जिंदा दीखता है। और वो हमेशा की तरह मेरे दृष्टिकोण को समझने बैठ जाती। मैं साथ रखी चिप्स चबाती। 

फिर, हम घर की ओर चलते। पानी की कलकल धीरे-धीरे मद्धम होती। हमारी बिल्डिंग का कोलाहल उसे खाने लगता। मैं उस कोलाहल को मन ही मन कोसते हुए कुत्तों के गुर्राने वाले चुटकुले से अपने आप को बहलाती। सीढ़ियों से जाने पर खुद की पीठ थपथपाते हुए, नूपुर का हाथ थामे, पीले घर की ओर पीठ किये हुए, उस अनदेखे चेहरे को इमैजिन करते हुए, चौथी मंजिल तक आती। और मेरी ही बातों में उलझी नूपुर के लिए कॉफ़ी बनाने लगती।

अरे हाँ, इतना सोच कर मैंने यह निष्कर्ष निकला कि ये एसटीडी, पीसीओ, झेराक्स, इत्यादी के बोर्ड लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए पीले रक्खे जाते हैं।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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6 Responses to निष्कर्ष (कहानी)

  1. Dagny says:

    Hmm…. soch rahi hoon… har peeli cheez kya zinda hoti hai…?

  2. Pallavi says:

    nahi hoti… par wo chetan hoti hai, itna to hai….

  3. Nicki Minaj says:

    ¡Gran poste! Gracias por tardar la época de escribir algo que está realmente digno de la lectura. Encuentro demasiado a menudo el Info inútil y no algo que es realmente relevante. Gracias por su trabajo duro.

  4. nupur says:

    prithvi ke manushya hi nahi, janvar aur ped aur parvat, nadi aadi sab ki chetna prithvi ki chetna hai. English mein ise ‘Gaia’ kehte hai. Avatar movie mein iska concept James Cameron ne bataya hai. It may be true.

  5. Aalok says:

    Aap ne kaha ki chetan hoti hai,
    Lakig ku, Aur agar hai to dhikhta ku
    nohi…….

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