हिंदी विश्वविद्यालय में करोड़ों के भ्रस्टाचार का मामला उजागर

उत्पलकांत अनीस

१.         सी..जी रिपोर्ट के बाद बढ़ सकती हैं विभूति राय की मुश्किलें

. क्यों बचा रही है सरकार अपने एक पूर्व अफसरशाह को

. लेखिकाओं को गाली देने वाले और सी .जी के अनुसार भ्रस्टाचार में लिप्त कुलपति को विश्वहिंदी सम्मेलन की संचालन समिति का सदस्य बना कर किया सम्मानित

. गांधी की प्रतिमा को भी नहीं बख्सा

पुलिस सेवा से कुलपति बने विभूति नारायण राय फिर से विवादों में हैं.  २०१० में नया ज्ञानोदय को दिये अपने साक्षात्कार में लेखिकाओं को ‘ छिनाली की होड़ ‘ में शामिल बताने के बाद  राय लिखित माफ़ी मांग कर किसी तरह अपनी कुर्सी बचा पाये थे. उसके बाद उनपर दलित विद्यार्थियों और प्राध्यापकों के उत्पीड़न और भेदभाव का आरोप लगा. इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने एक पत्र के माध्यम से उन्हें सख्त ताकीद भी दी थी.

इस बार राय की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई है और आर्थिक अनियमितता का आरोप लगाया है  सी .ए.जी ने. सी . ए.जी के आरोपों के बाद राय की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जबकि यह उनके कार्यकाल के दो सालों का ही औडिट रिपोर्ट है , शेष तीन साल का औडिट रिपोर्ट अभी होना है, जो संभवतः साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत में संभावित है. २ सालों में सी.ए.जी ने विश्वविद्यालय को मिले ७० करोड़, ५५ लाख ५८ हजार रुपये का लेखा -जोखा किया है और उसमें गंभीर अनियमितताएं गिनाई हैं, करोड़ों के भ्रष्टाचार के संकेत दिये हैं और साथ ही यू.जी सी अथवा मानव संसाधन विकास मंत्रालय के लिए प्रस्तावित किया है कि २००७-२००८ से अबतक विश्वविद्यालय की वित्तीय अनियमितताओं के साथ -साथ की गई नियुक्तियों की स्पेशल औडिट कराये. हालांकि  विभिन्न माध्यमों से सारी जानकारियों के बावजूद मंत्रालय इस दिशा में उदासीन है. हिंदी विश्वविद्यालय बचाओ सामाजिक संगठन की ओर से एक प्रतिनिधि मंडल कुछ सप्ताह पहले व्यापक जांच की मांग करते हुए मानव संसाधन विकास मंत्री, कपिल सिब्बल से मिल चुका है लेकिन आश्वासन के बावजूद इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है. सरकार की उदासीनता समझ से परे इसलिए भी है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य कैप्टन जय नारायण निषाद सहित विभिन्न दलों के सांसदों ने भी जांच की मांग की है, लेकिन सरकार का रवैया टाल -मटोल का रहा है.

सी..जी की महत्वपूर्ण आपत्तियों में से सर्वाधिक गंभीर आपत्ति निर्माण कार्य के टेंडर को लेकर है, जो रिपोर्ट के अनुसार अनियमित तरीके से किसी को लाभ पहुंचाने के इरादे से केन्द्रीय निर्माण एजेंसी सी.पी.डब्ल्यू.डी से वापस लेकर उत्तरप्रदेश समाज कल्याण निर्माण  निगम को दे दिया गया. भारतीय पुलिस सेवा के उत्तर प्रदेश कैडर में रहे कुलपति विभूति नारायण राय ने अपनी नियुक्ति के बाद अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश के इस निगम को निर्माण कार्य सौपने में सारे नियम कायदे को नजरअंदाज किया है. सी.ए.जी ने आपत्ति दर्ज की है कि सी.पी.डब्ल्यू. डी. से काम लेकर किसी केन्द्रीय एजेंसी को काम न देकर ७ .१.२००९ के एक नोटिस के माध्यम से उत्तर प्रदेश की इस एजेंसी को काम दे दिया गया और इसके लिए किसी भी सक्षम इकाई, जैसे वित्त समिति, भवन निर्माण समिति अथवा कार्यपरिषद या विश्वविद्यालय के विजिटर से कोई सहमति नहीं ली गई.

निर्माण कार्य ट्रांसफर के इस प्रक्रम में ४२ लाख रुपये के सरकारी नुकसान का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट ने बिन्दुबार उल्लेख किया है कि कैसे राय ने इस एजेंसी को नियम से बाहर जाकर लाभ पहुंचाया. जबकि निर्माण कार्य के लिए केन्द्रीय एजेंसी बी. एस. एन.एल सहित कई एजेंसियों ने आवेदन किया था, लेकिन बिना किसी कारण के उल्लेख के निर्माण कार्य  निगम को सौप दिया गया. निगम को फायदा पहुंचाने के लिए नियम से परे जाकर निर्माण कार्य के लिए मशीन आदि भी निगम को सरकारी खर्च पर उपलब्ध कराया गया. निर्माण कार्य में गुणवत्ता की कमी तथा बड़े हेर -फेर की चर्चा करते हुए रिपोर्ट कहती है कि निगम के साथ हुए एम.ओ.यू का भी समुचित पालन न करते हुए उसे कई प्रकार के आर्थिक लाभ पहुंचाए जा रहे हैं. मजेदार तो यह है कि विश्वविद्यालय ने  केन्द्रीय एजेंसी सी.पी.डब्ल्यू. डी से काम वापस लेने का कारण बताया है कि एजेंसी ने खुद अनिच्छा जाहिर की थी, जबकि रिपोर्ट में यह ख़ास कर चिह्नित किया गया है कि ऐसी अनिच्छा व्यक्त करते हुए पत्राचार की कोई प्रति औडिट टीम को उपलब्ध नहीं कराई गई है. रिपोर्ट यह भी चिह्नित करता है कि निगम की कार्य-दक्षता सम्बन्धी कोई प्रमाण भी औडिट टीम को नहीं उपलब्ध कराइ गई.

गांधी प्रतिमा को भी नहीं बख्सा गया: आर्थिक बन्दरबाँट का खुला खेल फर्रुखावादी

राय ने अपनी नियुक्ति के बाद आर्थिक बन्दरबाँट के नायब मिसाल पेश किये. विश्वविद्यालय में बने गांधी हिल और गांधी प्रतिमा के निर्माण में भी नियम की धज्जियां उड़ाई गई. सी.ए.जी रिपोर्ट के अनुसार ‘ अत्यंत फूहड़ आधार पर निर्माण का कार्य दूसरे नंबर पर योग्य ठहराए गये  धर्मेन्द्र कुमार को आवंटित कर दिया गया , जबकि उससे निम्न दर पर टेंडर डालने वाली एजेंसी को काम नहीं आवंटित किया गया. ‘  काम की गुणवत्ता को  सक्षम एजेंसी से प्रमाणित हुए बिना ही धर्मेन्द्र कुमार को अवैध रूप से ९ लाख रुपये भी दिये गये. ‘ एजेंसी ने आपत्ति जाहिर की है बिना किसी विशेषज्ञता के ‘ राकेश श्रीवास्तव  ‘ ने गांधी हिल के निर्माण का सुपरविजन किया.

राय की नियुक्ति के बाद से ही आर्थिक गडबड़झाले की सुनियोजित शुरुआत हुई. इसके लिए राय ने दो नियुक्तियां भी की, विशेष कर्त्व्याधिकारी के रूप में राकेश और नरेन्द्र सिंह की. इन दोनों नियुक्तियों  पर गहरी आपत्ति दर्ज कराते हुए औडिट रिपोर्ट में रुपयों की लूट के इस खेल की विस्तृत  खोज बीन की गई है. इन दोनों महानुभावों की नियुक्ति यू.जी.सी से बिना पद स्वीकृत कार्य  विशेष कर्तव्य अधिकारी के रूप में की गई . ‘ ‘ राकेश श्रीवास्तव की नियुक्ति तो बिना कोई आवेदन के, बिना किसी बायो-डाटा के की गई  क्योंकि रिकार्ड में राकेश का कोई बायो-डाटा भी उपलब्ध नहीं है.’ औडिट रिपोर्ट में उन्हें नियमों से परे जाकर रजिस्ट्रार , वित्तीय अधिकारी आदि की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी देने पर आपत्ति की गई है. एक दूसरे विशेष कर्तव्य अधिकारी नरेन्द्र सिंह को व्यक्तिगत आवेदन पर नियुक्त किया गया और उसे विश्वविद्यालय में निर्माण कार्य से लेकर खरीददारी और ट्रांसपोर्टेशन की जिम्मेवारी दे दी गई. यानी विश्वविद्यालय के  ८०% फंड के खर्च की जिम्मेवारी उत्तरप्रदेश के हार्टिकल्चर को-ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन के एक कर्मचारी को ओ. एस.डी बना कर दे दी गई. सी. ए.जी ने अपने रिपोर्ट में नरेन्द्र सिंह और राकेश श्रीवास्तव को दिये गये पे-स्केल, उनपर किये गये लाखो रुपये के खर्च को सरकारी खजाने की लूट बताया है और उन्हें सौपी गई महत्वपूर्ण जिम्मेवारियों पर भी आपत्ति दर्ज की है. नरेन्द्र सिंह को डेपुटेशन पर नियुक्त किये जाने को भी औडिट रिपोर्ट नियमबाह्य बता रहा है. रिपोर्ट के अनुसार ‘ ओ. एस.डी पदों पर  नियुक्तियां व्यक्ति विशेष को लाभ पहुँचाने के लिए की गई हैं. ‘ जबकि विश्वविद्यालय की अनियमितताओं के खिलाफ लड़ रहे छात्र राजीव सुमन ने इसे लूट तंत्र विकसित करने के लिए की गई सुनियोजित नियुक्तियां बताया. राजीव के ही आवेदन पर पिछले अप्रैल महीने में वर्धा के सी.जे.एम कोर्ट ने विभूति राय सहित चार अधिकारियों पर फर्जी माइग्रेशन निर्गत करने के लिए एफ.आई.आर का आदेश दिया था , जिसके बाद पुलिस ने उनपर एफ.आई.आर दर्ज किया है.

व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने के इस खुले खेल का इस्तेमाल राय ने ‘ छिनाल प्रकरण ‘ के बाद भी किया है, जब उन्होंने विभिन्न लेखकों और पत्रकारों को मोटी रकम देकर अपने यहाँ एक निश्चित अवधि के लिए बुलाना शुरू किया. नया ज्ञानोदय में छपे एक साक्षात्कार में लेखिकाओं को ‘ छिनाल’ और ‘निम्फोमानियक  कुतिया’ कहने के बाद राय के खिलाफ देश भर के लेखक समुदाय ने व्यापक विरोध प्रदर्शन किया था. राय ने इस विरोध की आग को ठंढा करने के लिए ‘ लाभ पहुँचाने ‘ के इस टेक्निक का इस्तेमाल किया. सी. ए.जी ने मोटी रकम पर की जा रही  ’ इन खुशामद  नियुक्तियों  ‘ पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की है.

अवैध नियुक्तियां और उनपर सरकारी अपव्यय

सवाल है कि जब ओ.एस.डी सहित इन नियुक्तियों के लिए कोई पद यू.जी. सी से आवंटित नहीं हैं तो किस मद से इन्हें भुगतान  किया जा रहा है. इसके लिए राय और उनकी टीम ने जो तरीका अपनाया उसपर सी.ए.जी ने अपनी घोर आपत्ति दर्ज की है. औडिट  रिपोर्ट के अनुसार यू.जी.सी का स्पष्ट निर्देश है कि प्लान के तहत दी गई राशि आवंटित मद में ही खर्च किये जाने चाहिए. परन्तु राय की ज्व्यानिंग के तुरत बाद २००९-२०१० वित्तीय वर्ष में १ करोड़ ८२ लाख से अधिक की रकम नान -प्लान में तब्दील कर बेजा खर्च की गई. यहाँ तक कि एस.सी.एस.एस.टी शोधार्थियों के लिए राजीव गाँधी फेलोशिप की ११ लाख ३९ हजार रुपये से अधिक की रकम भी दूसरे मद में खर्च कर दी गई. अपने ऊपर जातिवादी होने के आरोप झेल रहे राय का यह कदम एस.सी .एस.टी विद्यार्थियों के द्वारा लगाये गये उनपर आरोपों की पुष्टि कर देता है.

औडिट रिपोर्ट ने जिन गंभीर अनियमितताओं का उल्लेख किया है, उनमें ११ विवादित शिक्षकों के वेतन मद में किये जा रहे खर्च भी शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार इन अवैध नियुक्तियों को न सिर्फ बनाये रखा गया है और पिछले कई सालों से वेतन दिया जा रहा है बल्कि उन्हें प्रोमोशन और अविध रूप से इन्क्रीमेंट देते हुए लाखो रुपये के वारे न्यारे किये गये है. रिपोर्ट में अनिल पाण्डेय ,. रामानुज अस्थाना और अशोकनाथ त्रिपाठी को इन्क्रीमेंट के बाद किये गये लाखों रुपये के भुगतान पर सवाल खड़े किये गये हैं . इन ग्यारह नियुक्तिओं के अलावा दर्जनों ऐसी अवैध नियुक्तियां हैं, जिन्हें बनाये रखकर राय और उनका प्रशासन सरकारी कोष को नुकसान पहुंचा रहे हैं. २९ सितम्बर २००९ के एक पत्र के माध्यम से मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने दूरस्थ शिक्षा की ७ ऐसी ही नियुक्तियों को अवैध मानते हुए उन्हें रद्द करने का निर्देश दिया था.

उपलब्ध कागजातों, सी.ए.जी के लगभग १०० पेज के रिपोर्ट और अन्य तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि सरकार में बैठे अफसरानों  और प्रभावशाली लोगों से संरक्षण प्राप्त राय ‘ डैम केयर ‘ के अंदाज में काम कर रहे हैं. राय और उनके प्रशासन के लापरवाह, जिद्दी और उद्दंड कार्यप्रणाली की ओर इशारा करते हुए सी. एज .जी ने लिखा है किऔडिट पार्टी के द्वारा मांगी गई कई फाइलें दिखाने से भी मना कर दिया गया. उनमें कोर्ट केस , नियुक्तियों , और एस.सी.एस.टी पदों से संबंधित रोस्टर के फ़ाइल हैं शामिल हैं.’ फाइलें दिखाना और भी गंभीर अनियमितताओं की ओर इशारा करता है.

सरकार से मिलता संरक्षण और राय का लापरवाह रवैया

विश्वविद्यालय में अनियमितताओं के खिलाफ लड़ रहे पूर्व शोध छात्र संजीव चन्दन के अनुसार सरकार के प्रभावशाली लोगों से अभयदान मिलने के कारण ही राय खुलेआम भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं और शामिल भी हैं. इस क्रम में आवाज उठाने वालों पर वे पुलिसिया कुचक्र रच कर उनके बेख़ौफ़ दमन से नहीं हिचकिचाते. संजीव कहते हैं , ‘ किसी भी कारवाई से बेख़ौफ़ राय संवैधानिक संस्थाओं को भी खुली चुनौती दे रहे हैं. १४ .१२ .२०११ और २५.१२.२०११ को मानव संसाधन विकास मंत्री ( राज्य ) डी. पुरंदेश्वरी संसद के दोनों सदनों को बताती हैं कि हिंदी विश्वविद्यालय में लैप्स पद नहीं भरे  जायेंगे और जनवरी २०१२ में वैसे लैप्स पद भर दिये जाते हैं , जिनके विषय में यू.जी.सी के ९ दिसंबर २००२ के पत्र से स्पष्ट कहा गया है कि दसवीं योजना तक न भरे जाने की स्थिति में ये पद लैप्स हो जायेंगे .’  ’मंत्रालय और सरकार में कई लोग हैं जो हिंदी भाषा के लिए आवंटित हो रहे इन करोडो रुपयों के बन्दरवांट को खुली छूट दे रहे हैं. बल्कि राय को धांधलियां करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, ‘ कहते हुए आर.पी. आई के विदर्भ महासचिव अशोक मेश्राम राय पर तुरत कारवाई की मांग करते हैं .

हालांकि सरकार अपने इस बेख़ौफ़ अफसरशाह को दण्डित करने की जगह सम्मानित करने में लगी है. लेखिकाओं को गाली देने वाले राय और इस गाली को छपने वाली पत्रिका के सम्पादक रवीन्द्र कालिया, दोनों को ही विदेश मंत्रालय ने जोहांसवर्ग में २२ से २४ सितम्बर को होने वाले विश्व हिंदी सम्मेलन की संचालन समिति का सदस्य बना कर पुरस्कृत किया है. दलित लेखिका और चिन्तक अनीता भारती के लिए यह सब आश्चर्यजनक भी नहीं है.  हिंदी के इस कर्मकांड में दलित और स्त्री रचनाकारों की संवेदना का कभी आदर नहीं रहा है. इस बीच ‘हिंदी विश्वविद्यालय बचाओ  ’ संगठन की ओर से विदेश मंत्री एस.एम कृष्णा को पत्र लिखकर राय को समिति से मुक्त कर लेखिकाओं की भयमुक्त भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए पत्र लिखा गया है.

संगठन ने राष्ट्रपति और मुख्य सतर्कता आयोग को पत्र लिखकर राय के कार्यकाल के विविध मामलों को सी.बी.आई जांच की भी मांग की है. देखना यह है कि सरकार किन बहानों  से अपनी ही एक एजेंसी ( सी.एजी ) की अनुशंसाओं को टालती है, जिसने हिंदी विश्वविद्यालय में निर्माण, खरीदी से लेकर नियुक्तियों तक में करोड़ों के बारे -न्यारे की रिपोर्ट की है वह भी विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति राय के कार्यकाल के महज दो सालों में , शेष तीन सालों का औडिट अभी बाकी है.

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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