रोटी की तलाश में (कविता)

(कुलदीप सिंह ‘दीप’)

रोटी की तलाश में

सुबह से शाम होती है
वक़्त नहीं मिलता
तेरे बारे में सोचने तक का
फिर भी तेरा पयाम मिला
तुम लौटना चाहती हो
वापस इसी शहर में
जिससे तुम्हे नफरत हो गयी थी
अपनी मर्ज़ी से छोड़ गयी थी एक दिन
मेरे लाख मना करने के बावजूद
अब वापसी करने का क्या फायदा
अब नहीं होते कवि सम्मलेन
अब नहीं होती गोष्ठियां
नहीं जमते मजमे
नहीं उठते तूफ़ान चाय की प्याली में
अब तो यदा कदा ही
इक्कठे देखे जा सकते हैं चार लोग
कहीं ज़नाजे या शव-यात्रा में
प्रेम तो मोबाइल की तरह हो गया है
अब सड़क पर नहीं पड़े मिलते
लव लेटर
अब तो पाए जाते हैं
लाटरी के टिकट और निरोध
लोग बतियाते हैं
दिल्ली क्या बोली
चंडीगढ़ क्या आया
लड़कियों की तो पूछ ही मत
इतना ढक लेती है अपने आप को
खुदकी लड़की को पहचानना
दुश्वार सा हो गया है
प्यार के नाम पर
देह का कारोबार
खूब फल-फूल रहा है
इसी बीच मैं भी
बच्चों की चिंता में
घुटता पिसता हाड मांस का
कंकाल मात्र रह गया हूँ
आ जाओ कभी भी
पर पक्का नहीं कह सकता
मिल भी पाउँगा या नहीं
क्योंकि रोटी की जुस्तजू में
सुबह से शाम होती है
हर रोज अब तो
जिंदगी यूँही तमाम होती है .

***

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to रोटी की तलाश में (कविता)

  1. Imran khan says:

    I realy lik ths type post, i thnk it’s truth of prsent time life, nd we h,v 2 thnk about it nd h’v 2 do somthng abot it,

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