दो जीवन – समान्तर (कहानी)

सूरज प्रकाश,

सूरज प्रकाश

-         हैलो, क्या मैं इस नम्बर पर  दीप्ति जी से बात कर सकता हूं?

-         हां, मैं मिसेज धवन ही बात कर रही हूं।

-         लेकिन मुझे तो दीप्ति जी  से बात करनी है।

-         कहा न, मैं ही मिसेज दीप्ति धवन हूं। कहिये, क्या कर सकती हूं  मैं  आपके लिए?

-         कैसी हो?

-         मैं ठीक हूं, लेकिन आप कौन?

-         पहचानो.. ..

-         देखिये, मैं पहचान नहीं पा रही हूं।  पहले आप अपना नाम बताइये और  बताइये, क्या काम है मुझसे?

-         काम है  भी ओर नहीं भी

-         देखिये, आप पहेलियां मत बुझाइये। अगर आप अपना नाम और काम नहीं बताते तो मैं फोन रखती हूं।

-         यह ग़ज़ब मत करना डियर, मेरे पास रुपये का और सिक्का नहीं है।

-         बहुत बेशरम हैं आप। आप को मालूम नहीं  है, आप किससे बात कर रहे हैं।

-         मालूम है तभी तो छूट ले रहा हूं, वरना दीप्ति के गुस्से को मुझसे बेहतर और कौन जानता है।

-         मिस्टर, आप जो भी हें, बहुत बदतमीज हें। मैं फोन रख रही हूं।

-         अगर मैं अपनी शराफत का परिचय दे दूं तो?

-         तो मुंह से बोलिये तो सही। क्यों मेरा दिमाग खराब किये जा रहे हैं।

-         यार, एक बार तो कोशिश कर देखो, शायद कोई भूला भटका अपना ही हो इस तरफ।

-         मैं नहीं पहचान पा रही हूं  आवाज़ । आप ही बताइये।

-         अच्छा, एक हिंट देता हूं, शायद बात बन जाये।

-         बोलिये।

-         आज से बीस बरस पहले 1979 की दिसम्बर की एक सर्द शाम  देश की राजधानी दिल्ली में कनॉट प्लेस में रीगल के पास शाम  छः  बजे आपने किसी भले आदमी को मिलने का टाइम दिया था।

-         ओह गॉड, तो ये आप हैं जनाब। आज.. अचानक.. इतने बरसों के बाद?

-         जी हां, यह खाकसार आज भी बीस साल से वहीं खड़ा आपका इंतज़ार कर रहा है।

-         बनो मत, पहले तो तुम मुझे ये बताओ, तुम्हें मेरा ये नम्बर कहां से मिला ? इस ऑफिस में यह मेरा चौथा ही दिन है औटर तुमने.. ..

-         हो गये मैडम के सवाल शुरू।  पहले तो तुम्हीं बताओ, तब वहां आयी क्यों नहीं थी, मैं  पूरे ढाई घंटे इंतज़ार करता रहा था। हमने तय किया था, वह हमारी आखिरी मुलाकात होगी,  इसके बावज़ूद .. ..।

-         तुम्हारा बुद्धूपना ज़रा भी कम नहीं हुआ। अब मुझे इतने बरस बाद याद थोड़े ही है कि कब, कहां और क्यों नहीं आयी थी। ये बताओ, बोल कहां से रहे हो और कहां रहे इतने दिन।

-         बाप रे, तुम दिनों की बात कर रही हो। जनाब, इस बात को बीस बरस बीत चुके हैं। पूरे सात हज़ार तीन सौ दिन से भी ज्यादा।

-         होंगे। ये बताओ, कैसे हो, कहां हो, कितने हो?

-         और ये भी पूछ लो क्यों हो।

-         नहीं, यह नहीं पूछूंगी। मुझे पता है तुम्हारे होने की वज़ह तो तुम्हें खुद भी नहीं मालूम।

-         बात करने का तुम्हारा तरीका ज़रा भी नहीं बदला।

-         मैं क्या जानूं। ये बताओ इतने बरस बाद आज अचानक हमारी याद कैसे आ गयी?  तुमने बताया नहीं, मेरा ये नम्बर कहां से लिया?

-         ऐसा है दीप्ति, बेशक मैं तुम्हारे इस महानगर में कभी नहीं रहा। वैसे बीच बीच में आता रहा हूं, लेकिन मुझें लगातार तुम्हारे बारे में पता रहा।  कहां हो, कैसी हो,  कब कब औटर कहां कहां पोस्टिंग रही और कब कब प्रोमोशन हुए। बल्कि चाहो तो तुम्हारी सारी फॉरेन ट्रिप्स की भी फेहरिस्त सुना दूं। तुम्हारे दोनों बच्चों के नाम, कक्षाएं और हाबीज़ तक गिना दूं, बस, यही मत पूछना, केसे खबरें मिलती रहीं तुम्हारी।

-         बाप रे,  तुम तो युनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। ये इंटैलिजेंस सर्विस कब से ज्वाइन कर ली?  कब से चल रही थी हमारी ये जासूसी?

-         ये जासूसी नहीं थी डीयर, महज अपनी एक ख़ास दोस्त की तरक्की की सीढ़ियों को और ऊपर जाते देखने की सहज जिज्ञासा थी। तुम्हारी हर तरक्की से मेरा सीना थोड़ा और चौड़ा  हो जाता था, बल्कि आगे भी होता रहेगा।

-         लेकिन कभी खोज खबर तो नहीं ली हमारी।

-         हमेशा चाहता रहा।  जब भी चाहा, रुकावटें तुम्हारी तरफ से ही रहीं।  बल्कि  मैं तो ज़िंदगी भर के लिए तुम्हारी सलामती का कान्ट्रैक्ट लेना चाहता था, तुम्हीं  पीछे हट गयीं। तुम्हीं नहीं चाहती थीं कि तुम्हारी खोज खबर लूं, बल्कि टाइम दे कर भी नहीं आती थीं। कई साल पहले, शायद तुम्हारी पहली ही पोस्टिंग वाले ऑफिस में बधाई देने गया था तो डेढ घंटे तक रिसेप्शन पर बिठाये रखा था तुमने, फिर भी मिलने नहीं आयी थीं। मुझे ही पता है कितना खराब लगा था मुझे कि मैं अचानक तुम्हारे लिए इतना पराया हो गया कि .. .. तुम्हें आमने सामने मिल कर इतनी बड़ी सफलता की बधाई भी नहीं दे सकता।

-         तुम सब कुछ तो जानते थे। मैं उन दिनों एक दम नर्वस ब्रेक डाउन की हालत तक जा पहुची थी। उन दिनों प्रोबेशन पर थी, एकदम नये माहौल, नयी जिम्मेवारियों से एडजस्ट कर पाने का संकट, घर के तनाव, उधर ससुराल वालों की अकड़ और ऊपर से तुम्हारी हालत, तुम्हारे पागल कर देने वाले बुलावे। मैं ही जानती हूं, मैंने शुरू के वे दो एक साल कैसे गुज़ारे थे। कितनी मुश्किल से खुद को संभाले रहती थी कि किसी भी मोर्चे पर कमज़ोर न पड़ जाऊं।

-         मैं इन्हीं वज़हों से तुमसे मिलना चाहता रहा कि किसी तरह तुम्हारा हौसला बनाये रखूं । कुछ बेहतर राह सुझा सकूं और मज़े की बात कि तुम भी इन्हीं वज़हों से मिलने से कतराती रही। आखिर हम दो दोस्तों की तरह तो मिल ही सकते थे।

-         तुम्हारे चाहने में ही कोई कमी रह गयी होगी ।

-         रहने भी दो। उन दिनों हमारे कैलिबर का तुम्हें चाहने वाला शहर  भर में नहीं था।  यह बात उन दिनों तुम भी मानती थीं।

-         और अब?

-         अब भी इम्तहान ले लो।  इतनी दूर से भी तुम्हारी पूरी खोज खबर रखते हैं। देख लो, बीस बरस बाद ही सही, मिलने आये हैं। फोन भी हमीं कर रहे हैं।

-         लेकिन हो कहां ? मुझे तो तुम्हारी रत्ती भर भी खबर नहीं मिली कभी।

-         खबरें चाहने से मिला करती हैं।  वैसे मैं अब भी वहीं, उसी विभाग में वही सब कुछ  पढ़ा रहा हूं  जहां कभी तुम मेरे साथ पढ़ाया करती थी। कभी आना हुआ उस तरफ तुम्हारा?

-         वेसे तो कई बार आयी लेकिन.. ..

-         लेकिन हमेशा डरती रही, कहीं मुझसे आमना सामना न हो जाये,

-         नहीं वो बात नहीं थी। दरअसल, मैं किस मुंह से तुम्हारे सामने आती। बाद में भी कई बार लगता रहा,  काफी हद तक मैं खुद ही उन सारी स्थितियों की जिम्मेवार थी। उस वक्त थोड़ी हिम्मत दिखायी होती तो.. ..।

-         तो क्या होता?

-         होता क्या, मिस्टर धवन के बच्चों के पोतड़े धोने के बजाये तुम्हारे बच्चों के पोतड़े धोती।

-         तो क्या ये सारी जद्दोजहद बच्चों के पोतड़े धुलवाने के लिए होती है।

-         दुनिया भर की शादीशुदा औरतों का अनुभव तो यही कहता है।

-         तुम्हारा खुद का अनुभव क्या कहता है?

-         मैं दुनिया से बाहर तो नहीं ।

-         विश्वास तो नहीं होता कि एक आइ ए  एस  अधिकारी को भी बच्चों के पोतड़े धोने पड़ते हैं।

-         श्रीमान जी, आइ ए एस हो या आइ पी एस, जब औरत शादी करती है तो उसकी पहली भूमिका बीवी और मां की हो जाती है। उसे पहले यही भूमिकाएं अदा करनी ही होती हैं, तभी ऑफिस के लिए निकल पाती है। तुम्हीं बताओ, अगर तुम्हारे साथ पढ़ाती रहती, मेरा मतलब, वहां रहती या तुमसे रिश्ता बन पाता  तो क्या इन कामों से मुझे कोई छूट मिल सकती थी।

-         बिलकुल मैं तुमसे ऐसा कोई काम न कराता।  बताओ, जब तुम मेरे कमरे में आती थी तो कॉफी कौन बनाता था?

-         रहने भी दो। दो एक बार कॉफी बना कर क्या पिला दी, जैसे ज़िंदगी भर सुनाने के लिए एक किस्सा बना दिया।

-         अच्‍छा एक बात बताओ, अभी भी तुम्हारा चश्मा नाक से बार बार सरकता है या टाइट करा लिया है।

-         नहीं, मेरी नाक अभी भी वैसी ही है, चाहे जितने मंहगे चश्मे खरीदो, फिसलते ही हैं।

-         पुरानी नकचड़ी जो ठहरी।

-         बताऊं क्या?

-         कसम ले लो, तुम्हारी नाक के नखरे तो जगजाहिर थे।

-         लेकिन तुम्हारी नाक से तो कम ही। जब देखो, गंगा जमुना की अविरल धारा बहती ही रहती थी। वैसे तुम्हारे जुकाम का अब क्या हाल है?

-         वैसा ही है।

-         कुछ लेते क्यों नहीं।

-         तुम्हें पता तो है, दवा लो तो जुकाम सात दिन में जाता है और दवा न लो तो एक हफ्ते में। ऐसे में दवा लेने का क्या मतलब।

-         जनम जात कंजूस ठहरे तुम। जुकाम तुम्हारा होता था और रुमाल मेरे शहीद होते थे। लगता तो नहीं तुम्हारी कंजूसी में  अब भी कोई कमी आयी होगी।  तुमसे शादी की होती तो मुझे तो भूखा ही मार डालते।

-         रहने भी दो। हमेशा मेरी प्लेट के समोसे भी खा जाया करती थी।

-         बड़े आये समोसे खिलाने वाले। आर्डर खुद देते थे औटर पैसे मुझसे निकलवाते थे।

-         अच्छा, बाइ द वे, क्या तुम्हारी मम्मी ने उस दिन मेरे वापिस आने के बाद वाकई ज़हर खा लिया था या यह सब एक नाटक था, तुम्हें ब्लैकमेल करने का। मुझसे तुम्हें दूर रखने का रामबाण उपाय?

-         अब छोड़ो उन सारी बातों को। अब तो मम्मी ही नहीं रही हैं इस दुनिया में ।

-         ओह सॉरी, मुझे पता नहीं था। और कौन कौन हैं घर में।

-         तुम तो जासूसी करते रहे हो। पता ही होगा।

-         नहीं, वो बात नहीं है। तुम्हारे ही श्रीमुख से  सुनना चाहता हूं।

-         बड़ी लड़की अनन्या का एमबीए का दूसरा साल है। उससे छोटा लड़का है दीपंकर। आइआइटी में इंजीनियरिंग कर रहा है।

-         और मिस्टर धवन कहां हैं आजकल?

-         आजकल वर्ल्ड बैंक में डेप्युटेशन पर हैं।

-         खुश तो हो?

-         बेकार सवाल है।

-         क्यों?

-         पहली बात तो, किसी भी शादीशुदा औरत से यह सवाल नहीं पूछा जाता चाहे वह आपके कितनी भी करीब क्यों न हो। और दूसरे, शादी के बीस साल बाद इस सवाल का वैसे भी कोई मतलब नहीं रह जाता। तब हम सुख दुख नहीं  देखते। यही देखते हैं कि पति पत्नी ने इस बीच एक दूसरे की अच्छी बुरी आदतों के साथ कितना एडजस्ट करने की आदत डाल ली है। तुम अपनी कहो, क्या तुम्हारी कहानी इससे अलग है?

-         कहने लायक है ही कहां मेरे पास कुछ।

-         क्यों, सुना तो था, मेरी शादी के साल के भर बाद ही शहर के भीड़ भरे बाज़ारों से तुम्हारी भी बारात निकली थी और तुम एक चांद की प्यारी दुल्हन को ब्याह कर लाये थे। कैसी है वो तुम्हारी चद्रमुखी।

-         अब कहां की चद्रमुखी और कैसी चद्रमुखी।

-         क्या मतलब?

-         मेरी शादी एक बहुत बड़ा हादसा थी। सिर्फ दो ढाई महीने चली।

-         ऐसा क्या हो गया था?

-         उसके शादी के पहले से अपने जीजाजी से अफेयर थे। उसकी शादी ही इसी सोच के तहत की गयी थी कि उसकी बहन का घर उजड़ने से बच जाये। लेकिन वह शादी के बाद भी छुप छुप कर कर उनसे मिलने उनके शहर जाती रही थी। मैंने भी उसे बहुत समझाया था, लेकिन सब बेकार। इधर उधर मैंने तलाक की अर्जी दी थी और उधर उसकी दीदी ने खुदकुशी की थी। दो परिवार एक ही दिन उजड़े थे।

-         ओह, मुझे बिलकुल पता नहीं था कि तुम इतने भीषण हादसे से गुज़रे हो। कहां है वो आजकल।

-         शुरू शुरू में तो सरेआम जीजा के घर जा बैठी थी। बाद में पता चला था, पागल वागल हो गयी थी। क्या तुम्हें सचमुच नहीं पता था?

-         सच कह रही हूं। सिर्फ तुम्हारी शादी की ही खबर मिली थी। मुझे अच्छा लगा था कि तुम्हें मेरे बाद बहुत दिन तक अकेला नहीं रहना पड़ा था। लेकिन मुझे यह अहसास तक नहीं था कि तुम्हारे साथ यह हादसा भी हो चुका है। फिर घर नहीं बसाया? बच्चे वगैरह?

-         मेरे हिस्से में दो ही हादसे लिखे थे। न प्रेम सफल होगा न विवाह। तीसरे हादसे की तो लकीरें ही नहीं हैं मेरे हाथ में।

-         .. .. .. ..

-         हैलो

-         हुंम.. .. ..।

-         चुप क्यों हो गयीं?

-         कुछ सोच रही थी।

-         क्या?

-         यही कि कई बार हमें ऐसे गुनाहों की सज़ा क्यों मिलती है जो हमने किये ही नहीं होते। किसी एक की गलती या ज़िद से कितने परिवार टूट बिखर जाते हैं।

-         जाने दो दीप्ति, अगर ये चीजें मेरे हिस्से में लिखी थीं तो मैं उनसे बच ही कैसे सकता था। खैर, ये बताओ तुमसे मुलाकात हो सकती है। यूं ही, थोड़ी देर के लिए। यूं समझो, तुम्हें अरसे बाद एक बार फिर पहले की तरह  जी भर कर देखना चाहता हूं।

-         नहीं.. ..

-         क्यों ?

-         नहीं, बस नहीं।

-         दीप्ति, तुम्हें भी पता है, अब मैं न तो तुम्हारी ज़िंदगी में आ सकता हूं और न ही तुम मुझे ले कर किसी भी तरह का मोह या भरम ही पाल सकती हो। मेरे तो कोई भी भरम कभी थे ही नहीं। वैसे भी इन सारी चीज़ों से अरसा पहले बहुत ऊपर उठ चुका हूं ।

-         शायद इसी वज़ह से मैं न मिलना चाहूं।

-         क्या हम दो परिचितों की तरह एक कप काफी के लिए भी नहीं मिल सकते।

-         नहीं।

-         इसकी वज़ह जान सकता हूं।

-         मुझे पता है और शायद तुम भी जानते हो, हम आज भी सिर्फ दो दोस्तों की तरह नहीं मिल पायेंगे। हो ही नहीं पायेगा। यह एक बार मिल कर सिर्फ एक कप कॉफी पीना ही नहीं होगा। मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानती हूं। तुम बेशक अपने आप को संभाल ले जाओ, इतने बड़े हादसे से खुद को इतने बरसों से   हुए ही हो। लेकिन मैं आज भी बहुत कमज़ोर पड़ जाउंगी। खुद को संभालना मेरे लिए हमेशा बहुत मुश्किल होता है।

-         मैं तुम्हें कत्तई कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगा।

-         यही तो मैं नहीं चाहती कि मुझे खुद को संभालने के लिए तुम्हारे कंधे की ज़रूरत पड़े।

-         अगर मैं बिना बताये सीधे ही तुम्हारे ऑफिस में चला आता तो?

-         हमारे ऑफिस में पहले रिसेप्शन पर अपना नाम पता और आने का मकसद बताना पड़ता है। फिर हमसे पूछा जाता है कि मुलाकाती को अंदर आने देना है या नहीं।

-         ठीक भी है। आप ठहरी इतने बड़े मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रुतबे वाली वरिष्ठ अधिकारी और मैं ठहरा एक फटीचर मास्टर। अब हर कोई ऐरा गैरा तो ..  .।

-         बस करो प्लीज। मुझे गलत मत समझो। इसमें कुछ भी ऑफिशियल नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैंने इस बीच तुम्हें याद न किया हो या तुम्हें मिस न किया हो। बल्कि मेरी ज़िंदगी का एक बेहतरीन दौर तुम्हारे साथ ही गुज़रा है। ज़िंदगी के सबसे अर्थपूर्ण दिन तो शायद वही रहे थे। आइएएस की तैयारियों से लेकर नितांत अकेलेपन के पलों में मैंने हमेशा तुम्हें अपने आस पास पाया था। सच कहूं तो अब भी मैं तुमसे कहीं न कहीं जुड़ाव महसूस करती हूं, बेशक उसे कोई नाम न दे पाऊं या उसे फिर से जोड़ने, जीने की हिम्मत न जुटा पाऊं। संस्कार इज़ाजत नहीं देंगे। हैलो .. … सुन रहे हो न?

-         हां हां  .. .. बोलती चलो।

-         लेकिन अब इतने बरसों के बाद इस तरह मैं तुम्हारा सामना नहीं कर पाउंगी। मुझे समझने की कोशिश करो प्लीज़।

-         ठीक है नहीं मिलते। आमने सामने न सही, तुम्हें दूर पास से देखने का तो हक है मुझे। मैं भी जरा देखूं, तुम्हारा चश्मा अब भी फिसलता क्यों है। पहले की तरह उसे ऊपर बेशक न कर पाऊं, कम से कम देख तो लूं । और हमारी दोस्त ज्वांइट सेक्रेटरी बनने के बाद कैसे लगती है, यह भी तो देखें।

-         कम से कम सिर पर सींग तो नहीं होते उनके।

-         देखने मैं क्या हर्ज़ है?

-         जब मुझे सचमुच तुम्हारी ज़रूरत थी या तुम्हें कैसे भी करके मिलने आना चाहिये था तब तो तुमने कभी परवाह नहीं की और अब.. ..।

-         इस बात को जाने दो कि मैं मिलने के लिए सचमुच सीरियस था या नहीं, सच तो यह है कि एक बार तुम्हारी शादी यह तय हो जाने के बाद तुमने खुद ही तो एक झटके से सारे संबंध काट लिये थे।

-         झूठ मत बोलो, मैं शादी के बाद भी तुमसे मिलने आयी थी।

-         हां, अपना मंगल सूत्र और शादी की चूड़ियां दिखाने कि अब मैं तुम्हारी दीप्ति नहीं मिसेज धवन हूं। किसी और की ब्याहता।

-         मुझे गाली तो मत दो। तुम्हें सब कुछ पता तो था और तुमने सब कुछ ज्यों का त्यों स्वीकार कर भी कर लिया था जैसे मैं तुम्हारे लिए कुछ थी ही नहीं।

-         स्वीकार न करता तो क्या करता। मेरे प्रस्ताव के जवाब में तुम्हारी मम्मी का ज़हर खाने का वो नाटक और तुम्हारा एकदम सरंडर कर देना, मेरा तो क्या, किसी का भी दिल पिघला देता ।

-         तुम एक बार तो अपनी मर्दानगी दिखाते। मैं भी कह सकती कि मेरा चयन गलत नहीं है।

-         क्या फिल्मी स्टाइल में तुम्हारा अपहरण करता या मजनूं की तरह तुम्हारी चौखट पर सिर पटक पटक कर जान दे देता।

-         अब तुम ये गड़े मुरदे कहां से खोदने लग गये। क्या बीस बरस बात यही सब याद दिलाने के लिए फोन किया है।

-         मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं थी। तुम्हीं ने.. ..।

-         तुम कोई और बात भी तो कर सकते हो।

-         करने को तो इतनी बातें हैं, बीस बरस पहले की, बीस बरस के दौरान की और अब की लेकिन कितना अच्छा लगता, आमने सामने बैठ कर बात कर सकते।  लेकिन मैं उसके लिए तुम्हें मज़बूर नहीं करूंगा।

-         ज़िद मत करो। अब मैं सिर्फ़ तुम्हारी दीप्ति ही तो नहीं हूं। सारी बातें .. देखनी..  ..

-         तो फिर ठीक है। सी यू सून। रखता हूं फोन।

-         मिलने के ख्वाब तो छोड़ ही दो श्रीमान। एनी वे, सो नाइस ऑफ यू फार कॉलिंग ऑफ्टर सच एं लाँग पीरियड। इट वाज ए प्लीजेंट सरप्राइज़। तुमसे बातें करते करते वक्त का पता ही नहीं चला। मुझे अभी एक अर्जेंट मीटिंग में जाना है।  उसके पेपर्स भी देखने हैं। लेकिन तुम तो कह रहे थे, एक रुपये का और सिक्का नहीं है तुम्हारे पास। पिछले बीस मिनट से तुम पीसीओ से तो बात नहीं कर रहे। वैसे बोल कहां से रहे हो।

-         उसे जाने दो। वैसे मुझे भी एक अर्जेंट मीटिंग के लिए निकलना है।

-         तो क्या किसी मीटिंग के सिलसिले में आये हो यहां?

-         हां, आया तो उसी के लिए था। सोचा इस बहाने तुमसे भी . ..।

-         कहां है तुम्हारी मीटिंग?

-         ठीक उसी जगह जहां तुम्हारी मीटिंग है।

-         क्या मतलब?

-         मतलब साफ है डीयर, तुम्हारे ही विभाग ने हमारी युनिवर्सिटी के नॉन कॉनवेन्शनल एनर्जी रिसोर्सेज के प्रोजैक्ट पर बात करने के लिए हमारी टीम को बुलवाया है। इसमें महत्वपूर्ण खबर सिर्फ इतनी ही है कि यह प्रोजैक्ट मेरे ही अधीन चल रहा है। यह तो यहीं आकर पता चला कि अब तुम ही इस केस को डील करोगी और.. .. .. ।

-         ओह गॉड। आइ जस्ट कांट बिलीव। अब क्या होगा। तुमने पहले क्यों नहीं बताया। इतनी देर से मुझे बुद्धू बना रहे थे और.. ..।

-         रिलैक्स डीयर, रिलैक्स। तुम्हें बिलकुल भी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। मैं वहां यही जतलाउंगा, तुमसे ज़िंदगी में पहली और आखिरी बार मिल रहा हूं । बस, एक ही बात का ख्याल रखना, अपना चश्मा टाइट करके ही मीटिंग में आना।

यू चीट.. ..।

***

सूरज प्रकाश,

·  mail@surajprakash.com

  • 09930991424
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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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5 Responses to दो जीवन – समान्तर (कहानी)

  1. Akanksha says:

    In conversation a lovely story .

    congrats …!

  2. Raj Shekhar says:

    Very good story .
    Keep it up.

  3. anant says:

    batchit ki sahaili ki wajah say rochak ban gayi kahani

  4. आज से बीस बरस पहले 1979 की दिसम्बर की एक सर्द शाम देश की राजधानी दिल्ली में कनॉट प्लेस में रीगल के पास शाम छः बजे आपने किसी भले आदमी को मिलने का टाइम दिया था।
    Old memories ke sath kahani ka tana bana ….bahut achha.

  5. vijai mathur says:

    कहानी चाहे काल्पनिक हो या वास्तविक काफी दिलचस्प और मर्मस्पर्शी होने के साथ-साथ तमाम पहलुओं पर सार्थक प्रकाश डालती है।

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