रामलीला के नाम पर कई यादें तैर जाती हैं आंखों के सामने

अरुंधती राय

रामलीला श्रीराम की कथा भर नहीं थी। हमारे लिये रामलीला का मतलब था दादर के शिवाजी पार्क मैदान का नाम सुनते ही आंखों के सामने बचपन की कई यादें एक चित्रपट की तरह प्रस्तुत हो जाती हैं। हम बच्चे एकाध महीने पहले से ही उस दिन का इंतजार करते कि कब रामलीला शुरू हो और हम अपनी अम्मा, ताई, चाची व मित्र मंडली के साथ रामलीला देखने जायें। हम बच्चों के लिए रामलीला सिर्फ भगवान में लगा हुआ आदर्श रामलीला कमेटी का भव्य आकर्षक मंच, विभिन्न पात्रों की रंग-बिरंगी वेष-भूषा, रंग-बिरंगे बल्बों की रोशनी में नहाया पार्क और जो इन सबसे भी ज्यादा लुभाता था, वह था पंडाल के बाहर खड़े रेहड़ी-खोमचे वाले जो मूंगफली, कुल्फी, चाट, भेलपूरी बेचते थे।

रामचरित मानस की चैपाइयों का अर्थ हमें समझ में नहीं आता था, लेकिन हारमोनियम के साथ इनका गायन बहुत भाता था। कानों को यह इतना अच्छा लगता था कि बिना अर्थ जाने ही हमने कई चैपाइयां रट ली थीं। अम्मा और बाउूजी रामलीला के एक-एक प्रसंग में खो जाते थे, जबकि हम बच्चे उनसे पैसे लेकर दौड़ कर कभी मंूगफली लेने जाते तो कभी चाट। इन सभी क्रिया-कलापों के बीच हम रामलीला के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों को बड़े गौर से देखते थे। भगवान राम का स्वंयवर में धनुष तोड़ना, सीता हरण, बाली वध, लक्ष्मण को शक्तिबाण लगना, रावण के दरबार में अंगद का पांव जमाना, सुलोचना के आगे मेघनाद का सिर आकर गिरना, हनुमान द्वारा लंका दहन, रावण वध, भरत मिलाप और आतिशबाजी के साथ पुतला दहन के दृश्य अभी भी मनोमष्तिष्क पर इतने सजीव रूप में बसे हुए हैं मानो कल की बात हो। रामलीला की एक याद और है, बीच-बीच में मक्खीचूस का मंच पर अपनी उूटपटांग हरकतों से लोगों को हंसाना। आज भी मुझे यह सोचकर हंसी आती है कि बहुत सालों तक हम उस मक्खीचूस को भी रामचारित मानस का वास्तविक पात्र मानते थे। कुम्भकरण को जगाने वाला दृश्य खूब मजेदार होता था। दशहरा के दिन हमारा उत्साह अपने चरम पर रहता था। रंगीन चश्मा, गैस वाले गुब्बारे, सीटी और सबसे जरूरी होता था धनुष-बाण व तलवार खरीदना। इन वस्तुओं को खरीदकर लगता हमने अपनी खुशियों का सारा जहान खरीद लिया है।

दशहरे के दिन की एक याद जो मेरी जेहन में अभी भी तरोताजा है, वो यह है कि रावण दहन होते ही अम्मा के चेहरे पर चिंता की लकीरें दिखने लगतीं और वह हम बच्चों से कहतीं कि चलो अब जल्दी घर चलो बाल ठाकरे आने वाला है। दरअसल शिवाजी पार्क में दशहरा के दिन रावण दहन के बाद शिवसेना की ओर से विशाल रैली का आयोजन किया जाता था, जो अब भी होता है। इस रैली को बाल ठाकरे सम्बोधित करते। सुनने के लिए उनके समर्थकों की भीड़ उमड़ पड़ती। अम्मा के चेहरे की चिंता को देखकर हम बच्चे भी डर-सहम जाते थे। समझ में नहीं आता कि बुराई के प्रतीकों के दहन के बाद अम्मा बाल ठाकरे की रैली से पहले घर वापस लौटने की जल्दी क्यों मचाने लगती थीं। हमारा घर पार्क के पास ही कैडल रोड पर कीर्ति कालेज के सामने था। महज पंद्रह मिनट में हम घर पहुंच जाते। बडा़ होने पर पता चला कि बाल ठाकरे उत्तर भारतीय भैय्यों के खिलाफ इस रैली में आग उगलते थे। सच कहंू तो रावण दहन के बाद हमारे मन में इस माहौल को देखकर जो डर पैदा होता था, उससे ऐसा लगता कि कोई रावण हमारा अहित कर देगा। हम अम्मा के साथ उनकी साड़ी का पल्लू पकड़कर घर की ओर प्रस्थान करते। घर के नजदीक पहुंचकर यह भय काफी कम हो जाता और अपने हाउसिंग कालोनी की दूसरी मंजिल पर बनी खोली में पहुंचने के बाद तो मन दशहरे के उत्सव में एक बार फिर से विचरने लगता।

आज जब मैं अपने चारों ओर के माहौल को देखती हूं तो रावण ही रावण दिखाई देते हैं। लेकिन इनसे मुझे डर नहीं लगता। मेरे पास राम के दिये वो मूल्य हैं, जो हर दिन समाज में फैले रावणों पर विजय दिलाते हैं। गौर से देखिए तो हम सब जब-जब अपने दैनिक जीवन में गलत बातों और कामों का विरोध करते हैं, तब-तब रावणी मूल्यों का प्रतिकार और राम के मूल्यों की शाश्वत प्रासंगिकता को ही सिद्ध करते है।

रामलीला के अनेक प्रसंगों से खेल-खेल में मिली नैतिक शिक्षा का कोई दूसरा विकल्प मुझे आज भी कहीं ढूंढ़ने पर दिखाई नहीं देता। राम के मूल्य जो भारत ही नहीं समूचे विश्व के सभ्य समाज में आज के युग में भी पूरी तरह प्रासंगिक हैं, हमें इसी शिवाजी पार्क की रामलीला से मिले हैं। राम की कथा जीवन यात्रा में हमेशा नये-नये रूप मंे प्रकट होकर हमें रोजमर्रा की तमाम कठिनाइयों से जूझने और उनपर विजय हासिल करने की शक्ति देती है। अब सोचती हूं तो ऐसा लगता है कि रामलीला हमें अपने बच्चों को अवश्य दिखानी चाहिए। रामलीला के माध्यम से ही हम बहुत सहजता से त्याग, कत्र्तव्य, धर्म, पे्रम, वीरता, सत्य आदि तमाम मूल्यों का अपने बच्चों में बीजारोपण कर सकते हैं।

चूंकि प्रसंग की शुरुआत मुंबई के मर्मस्थल और मेरे बचपन के आंगन दादर के शिवाजी पार्क की रामलीला से हुई है, इसलिये समापन भी मैं यहीं से करना चाहती हूं। इस बार भी शिवाजी पार्क में रामलीला हो रही है। दशहरे को रावण वध के साथ पुतला दहन होगा। और फिर इसके बाद शिवसेना की रैली। इसमें बुजुर्ग बाल ठाकरे भी आयेंगे। मैं बचपन में भले ही उनके नाम से डरती थी, बुरा-भला कहती थी, पर अब ऐसा भाव नहीं है। यह भाव ही है राम का मूल्य। यही है रामलीला की सार्थकता। जय सियाराम।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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