मानव समाज के अब तक के इतिहास की महानतम क्रान्ति है अक्तूबर क्रान्ति

सुनील दत्ता//

रूस में हुई 1917 की अक्टूबर  क्रान्ति देश — दुनिया के नये — पुराने धनाढ्य वर्गो एवं उच्च तबकों को तो विश्व की महानतम क्रान्ति नहीं, अपितु निकृष्टतम क्रान्ति या प्रतिक्रान्ति ही नजर आएगी क्योंकि यह क्रान्ति रूस के इन्हीं वर्गो के विरुद्ध सम्पन्न की गयी थी| इनको धन — सत्ता के मालिकाने से बेदखल करते हुए की गयी थी औसत या थोड़े बेहतर मध्य वर्गियों के एक हिस्से को भी यह क्रान्ति कुछ वैसी ही लगेगी क्योंकि धनाढ्य वर्गों और उच्च वर्गों के बिना वे अपनी बेहतर स्थितियों के बारे में तथा समाज के संचालन व नियंत्रण के बारे में आम तौर पर नहीं सोच सकते| लेकिन इन्हीं वर्गों व तबकों के प्रभावों में आकर समाज के आम, निचले व मेहनतकश हिस्से द्वारा इस क्रान्ति की महानता को न समझना और न कबूलना कहीं से उचित नहीं है| क्योंकि यह क्रान्ति उन्हीं के हितों की क्रान्ति है| इन्हें साधनहीन अधिकारहीन से साधन व अधिकार सम्पन्न बनाने की क्रान्ति है| जाहिर है इस क्रान्ति को समाज का आम, निचला व मेहनतकश हिस्सा, हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, के धार्मिक दृष्टिकोणों, पहचानों को आगे करके या फिर जातीय इलाकाई, नस्ली दृष्टिकोणों, पहचानों को आगे करके कदापि नहीं समझा जा सकता| इसकी महानता को वह अपने काम पेशे को तथा उससे जुड़े आधुनिक समुदायों, समस्याओं को प्रमुखता देकर ही समझा  जा सकता है| रूस के मजदूरों, किसानों व अन्य  मेहनतकश हिस्सों ने इसी दृष्टिकोण से और इसके महत्व को समझकर ही इस क्रान्ति को सम्पन्न भी किया| उन्हीं के पद चिन्हों पर आगे बढ़ते हुए  ही देश के मजदूरों, किसानों व अन्य जनसाधारण हिस्सों को सदियों से विभिन्न रूपों में चली आ रही गुलामी व परनिर्भरता विवशता और अभावों से अपनी मुक्ति के लिए अक्तूबर क्रान्ति महानतम क्रान्ति लगेगी और उनके संघर्षो का पथ प्रदर्शक भी लगेगी| जनसाधारण हिस्से में बढ़ती महँगाई, बेकारी को देश — दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गों की बढ़ती पूंजियों, लाभों परिसम्पत्तियों, सुख — सुविधाओं से जोड़कर देखने के प्रयास के साथ करें|  1889 — 90 में सोवियत रूस व पूर्वी यूरोपीय देशों की समाजवादी व जनवादी व्यवस्थाओं को तोड़े व हटाए जाने से उसे अब हमेशा के लिए खत्म हो गया अध्याय न मानें क्योंकि दुनिया की सभी क्रान्तियों का इतिहास सीधा — सपाट नहीं बल्कि पूर्णरूप से स्थापित होने से पहले जीत — हार के उतार — चढ़ाव का और फिर अंत में जीत का इतिहास रहा है| साथ ही यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि यह क्रान्ति ( या कोई क्रान्ति )किसी की सदिच्छा का न तो परिणाम है और न ही हो सकती है बल्कि यह तो समाज में शोषित, उत्पीडित हिस्से के जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं व बाधाओं के फलस्वरूप जन्म लेती है | इसीलिए वह क्रांतिकारी वर्ग की सजग , सचेत इच्छा व व्यवहार बन जाती है| इसके परिणाम स्वरूप आधुनिक युग के जनसाधारण की विभिन्न रूपों में बढ़ती समस्याएँ, हत्याएँ, आत्महत्याएँ उसे ऐसी क्रान्तियों के लिए जरुर खड़ा करेंगी| इसको विभिन्न देशो में या कहिये कि पूरे विश्व में दुहराया जाना और उसका पुन: विजयी होना एकदम सुनिश्चित है | 1917 की अक्टूबर  क्रान्ति को ” समाजवादी — क्रान्ति”,  ” मजदूर क्रान्ति” तथा ”बोल्शेविक क्रान्ति” के नाम से जाना जाता है| यह क्रान्ति  रूस में अक्तूबर 1917 में हुई थी| इस क्रान्ति के सम्पन्नकरता रुसी समाज के मजदूर, किसान व अन्य जनसाधारण हिस्से थे| उनकी अगुवाई रूस की बोल्शेविक पार्टी कही जाने वाली कम्युनिस्ट पार्टी ने  की थी| उस क्रान्ति में मजदूरों, किसानों एवं अन्य मेहनतकश वर्गो के तथा बोल्शेविक  पार्टी के  अग्रदूत लेनिन थे| वही उस क्रान्ति के महान विचारक, पथप्रदर्शक संघर्षरत जननायक थे| इस क्रान्ति की चारित्रिक विशेषताओं के बारे में चर्चा करने से पहले क्रान्ति शब्द पर कुछ कहना जरूरी है क्योंकि आधुनिक युग में सत्ता सरकार से लेकर समाज तक के छोटे मोटे परिवर्तन तथा सुधार बदलाव को क्रान्ति का नाम देने का फैशन सा चल गया है| जबकि क्रान्ति और वह भी सामाजिक क्रान्ति शब्द का वास्तविक अर्थ किसी समाज के बुनियादी संबंधो में आवश्यक आमूल परिवर्तन से होता है| उदाहरण — गुलाम — मालिकों के संबंधो से गुलामों की मुक्ति और सामंत शाही संबंधों वाली समाज व्यवस्था का प्रादुर्भाव समाज का क्रांतिकारी परिवर्तन था| इसी तरह से सामन्तवादी, भू दासताँ  के संबंधों के अंत के साथ आधुनिक पूंजीवादी, जनतंत्रवादी व्यवस्था का प्रादुर्भाव भी समाज का क्रांतिकारी परिवर्तन था| इस देश में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा उसके राज्य के साथ इस देश में बनाये और विभिन्न रूपों में बढ़ाए जाते रहे औपनिवेशिक दासता के संबंधों से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता का काम क्रांतिकारी का था व है| राष्ट्र की मुक्ति का यही क्रांतिकारी प्रयास 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर गदर पार्टी के महान प्रयासों और फिर राष्ट्र क्रांतिकारी संगठनों के महान प्रयासों में जीवंत होता रहा| जबकि कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों का प्रयास ( खासकर 1920  के बाद से ) ब्रिटेन के साथ संबंधों को बनाये रखकर बने अंग्रेजी राज पर हिन्दुस्तानियों को चढ़ाना और उसकी बागडोर हिन्दुस्तानियों के हाथ में देना हो गया था| 1947  में यही हुआ भी| इसीलिए 1947 में मिली स्वतंत्रता को विदेशी लूट और प्रभुत्व के संबंधों से पूर्ण स्वतंत्रता या क्रांतिकारी स्वतंत्रता का नाम नहीं दिया जा सकता| लेकिन 1917 की क्रान्ति दरअसल क्रान्ति थी व है| मानव समाज के अब तक के इतिहास की महानतम क्रान्ति है| क्योंकि यह क्रान्ति मानव समाज की अब तक क्रान्तियो से गुणात्मक रूप से भिन्न क्रान्ति थी | अक्टूबर  क्रान्ति से पहले की क्रान्तियो ने भी मानव समाज के विकास को नई बुलन्दियो पर पहुँचाया था और ये क्रान्तिया भी अक्टूबर क्रान्ति की तरह जन क्रान्तियाँ थीं| जनसाधारण कमकर वर्ग की सक्रिय संघर्षशील क्रांतिकारी भूमिकाओं के फलस्वरूप ही सम्पन्न हुई थीं| उन समाजों के धनाढ्य एवं प्रभुता सम्पन्न मालिकों एवं उनकी राजव्यवस्था के विरुद्ध वर्ग संघर्ष के जरिये सम्पन्न की गयी थीं| लेकिन इन क्रान्तियों के पश्चात  समाज का उभरता हुआ मालिक वर्ग ही उन क्रान्तियों का अगुवा बनने के साथ अगली समाज व्यवस्था का संचालक व नियंत्रक भी बना| कमकर वर्ग अगले समाज का कमकर वर्ग ही बना रहा| उदाहरण गुलामी की समाज व्यवस्था के अंत के साथ सामंत राजे महराजे समाज के मालिक व संचालक नियंत्रक बने लेकिन गुलाम अब भी गुलाम ही था| हाँ अब वह राजा, जमींदार की जमीन के टुकड़े के साथ बंधा गुलाम ( भू दास ) बन गया था| इसी तरह से पूंजीवादी  जनतांत्रिक क्रान्तियों के पश्चात  सामन्तों, राजाओं, बादशाहों की जगह पूँजीशाही ने ले ली| वे आधुनिक समाज के धनाढ्य मालिक तथा संचालक नियंत्रक बनते गये हैं| किन्तु गुलाम से जमीन का गुलाम बना कमकर हिस्सा तो आज भी गुलाम है| आधुनिक युग में वह पूंजी का गुलाम है| पूंजी की गुलामी में समाज का जनसाधारण हिस्सा,  साधनहीन होकर अपनी श्रम शक्ति बेचकर अपना पेट पालने वाला मजदूर बन गया है और बनता जा रहा है| पूंजी के धनाढ्य मालिकों के चढ़ाव — बढ़ाव के साथ उसकी यह गुलामी और मुहताजी लगातार बढ़ती ही जा रही है| अक्टूबर क्रान्ति इन पूर्ववर्ती से पूर्णतया भिन्न इसलिए था कि इस क्रान्ति ने नये पुराने सभी मालिकों शासकों, शोषकों के धन सत्ता के अधिकार को एक झटके में खत्म कर  दिया था| उन्हें कमकर बनकर ही जीवन जीने को विवश कर  दिया था| इस क्रान्ति ने वहाँ  के मजदूर वर्ग की अगुवाई में शोषित उत्पीडित किसानों तथा अन्य  मेहनतकश जनसाधारण को पूरे  राष्ट्र व समाज का उसके संसाधनों का क्रान्ति के उपरान्त स्थापित सत्ता का संचालक, नियंत्रक एवं स्वामी बना दिया था| इस क्रान्ति ने मनुष्य द्वारा मनुष्य को गुलाम, रियाया, मजदूर या नौकर बना कर  रखने की सदियों पुरानी व नई प्रथाओं और कानूनों का अंत कर दिया| मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण करने और उस पर प्रभुत्व जमाने की समूची प्रक्रिया का अंत कर  दिया| इसलिए अक्टूबर क्रान्ति विश्व की महानतम क्रान्ति थी व है| रूस के मजदुर वर्ग की अगुवाई में तथा आम किसानों के सहयोग से सम्पन्न हुई यह क्रान्ति, जिसने रूस के जारशाही जैसी महाशक्तिशाली बादशाही ताकत के प्रभुत्व पूर्ण सामन्ती संबंधो को पूरी तरह से नेस्तनाबूत कर  दिया| इसी के साथ उसने सभी विदेशी साम्राज्यी ताकतों से खासकर ब्रिटेन और फ्रांस से बढ़ते रहे संबंधो को तोड़ने के साथ रूस के धनाढ्य पूंजीपतियों व्यापारियों के निजी लाभ व निजी मालिकाने को भी उनके संचालन नियंत्रण के संबंधों को समाप्त कर  दिया था| रूस के सामन्ती और पूंजीवादी मालिकों तथा विदेशी साम्राज्यी मालिकों के शोषण लूट व प्रभुत्व के संबंधों से रुसी मजदूरों किसानों एवं अन्य सभी जनसाधारण हिस्सों को मुक्त कर दिया था| अक्टूबर क्रान्ति द्वारा इस मुक्ति के लिए रूस की आम जनता पर दमन, उत्पीड़न अन्याय, अत्याचार ढाने वाले बने बनाये राज के ढाँचे को पूरी तरह ध्वस्त कर  दिया गया था क्योंकि क्रान्ति के प्रणेता व मुख्य शक्ति बने रूस के मजदूरों और किसानों ने यह बात भली भाँति समझ ली थी कि जारशाही, सामंतशाही और  पूँजीशाही के रहते उन्हें नये व पुराने धनाढ्य मालिकों की गुलामी से मुक्ति नहीं मिलनी है| वे यह बात बखूबी समझ गये थे कि जारशाही तथा पूँजीशाही को हटाए बिना न तो उन्हें समाज में जीने रहने का जनतांत्रिक अधिकार मिल सकता है न ही उनकी आवश्यकताओं, हितों के अनुसार देश के उत्पादन, व्यापार उपभोग तथा शिक्षा, संस्कृति आदि का संचालन नियंत्रण ही हो सकता है| वे इस बात के प्रति सचेत होने लगे थे कि समाज के नये पुराने धनाढ्य वर्गो तथा मेहनत — मशक्कत से अपना जीविकापार्जन करने वाले मजदूर, किसान व अन्य मेहनतकश  हिस्सों के बीच कभी हल न किया जा सकने वाला अन्तर्विरोध मौजूद है| धनाढ्य एवं उच्च वर्गों का काम आम जनता की श्रम  संपदा का शोषण, लूट  करके धनी, धनाढ्य और फिर अमीर बनना है, जबकि जनसाधारण, मजदूरों, किसानो, एवं अन्य मेहनतकश  हिस्सों का काम श्रम  करके जीवन जीना है| अपने श्रमशील जीवन को बेहतर बनाना है| यही विरोध दोनों के बीच का बुनियादी अंतर विरोध है| इसे देखते — समझते हुए ही वे इस निर्णय पर पहुंचने लगे थे कि देश के नये व पुराने धनाढ्य हिस्सों के साथ देश के मजदूरों किसानों व अन्य मेहनतकश हिस्सों का सहयोग नहीं अपितु संघर्ष अनिवार्य है| धनाढ्य तथा मेहनतकश  वर्गों के बीच का यह ऐतिहासिक वर्ग — संघर्ष अपरिहार्य है| रुसी मजदूरों एवं किसानों ने भी यह समझ लिया था कि इस संघर्ष में मजदूरों, किसानों एवं अन्य मेहनतकश  हिस्सों को लगातार संगठित होते हुए एक राजनीतिक पार्टी के रूप में खड़ा होना पडेगा और फिर उसी पार्टी के नेत्रृत्व में धन — सत्ता के मालिकों के विरुद्ध संघर्ष को लगातार बढ़ाते हुए उनके प्रभुत्व वाली सत्ता — सरकार की मशीनरी को पूरी तरह ध्वस्त कर  देना होगा| उसकी जगह मजदूरों किसानों के संचालन नियंत्रण वाले नये राज्य का मजदूर तानाशाही राज का निर्माण करना होगा| फिर उसी राज की ताकत से धनाढ्य वर्गों के मालिकाने व प्रभुत्व के अधिकारों को पूरी तरह से समाप्त करना होगा उनके स्वार्थों अनुसार चलाए जा रहे निजी लाभ व मालिकाने व प्रभुत्व को बढ़ावा देने वाली सामन्ती व पूंजीवादी समाज व्यवस्था की जगह व्यापक समाज के हितों आवश्यकताओं के अनुसार चलाई जाने वाली  समाजवादी व्यवस्था को ( अर्थात बहुसंख्यक मेहनतकश  समाज के लाभ व मालिकाने वाली समाजव्यवस्था को ) खड़ा करना होगा| उन्होंने अपनी  इसी समझदारी या सचेतनता के साथ रूस की सामंत शाही ,पूँजीशाही के विरुद्ध और उनके समर्थकों, सहयोगियों के विरुद्ध उनके राज्य व सैन्य शक्ति के विरुद्ध लगातार वर्ग संघर्ष चलाते हुए इस अक्टूबर क्रान्ति को, मजदूर क्रान्ति या समाजवादी क्रान्ति को सम्पन्न किया| यह याद रखना चाहिए कि इस संघर्ष के लिए रुसी मजदूरों एवं अन्य जनसाधारण हिस्सों को शिक्षित — दीक्षित करने का काम वहाँ के कम्यूनिस्टों ने किया था| उन्होंने खासकर लेलिन ने यह काम मार्क्सवाद के वैज्ञानिक एवं वर्गीय सिद्दांत को समझते — समझाते और उसे साम्राज्यवाद के युग में लेनिनवाद के रूप में विकसित करते हुए किया था| फिर उसे विश्व की आम और रूस की विशिष्ट परिस्थितियों के  विश्लेषण के साथ लागू करते हुए किया था| लेकिन समय बीतने के साथ रूस के बहुतेरे कम्यूनिस्टों में बढ़ते सुधारवाद अवसरवाद के चलते केवल लेनिन के नेतृत्व वाली बोल्शेविक पार्टी ही रूस के मेहनतकश वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी साबित हुई| इसी पार्टी ने 1903 से लेकर 1917 तक इस क्रांतिकारी संघर्ष का पथ प्रदर्शन व नेतृत्व किया| इसी पार्टी के नेतृत्व में ही अक्टूबर क्रान्ति सम्पन्न हुई| इसी पार्टी के नेतृत्व  में ही अक्टूबर क्रान्ति सम्पन्न हुई | इसीलिए अक्टूबर क्रान्ति को बोल्शेविक — क्रान्ति भी कह दिया जाता है | वर्ग विरोध और वर्ग — संघर्ष की अनिवार्यता के शिक्षा ज्ञान तथा अनुभव के साथ रूस के जन साधारण समुदाय ने 1905 में जारशाही पर किये गये अपने पहले किन्तु असफल हमले के साथ ही अपने आपको छोटी — छोटी राजनितिक इकाइयों के रूप में एक जुट करना प्रारम्भ क्र दिया था. हमारे देश में धर्म जाति के लगावो व पहचानो के आधार पर बन रहे संगठनों से भिन्न वहाँ  के मजदूरों, किसानों ने और बाद में सैनिकों ने भी अपने आपको इन्हीं राजनितिक सांगठनिक इकाइयों में संगठित करने का काम निरंतर आगे बढ़ाया| इन इकाइयों को ही सोवियतो  का नाम दिया गया, मजदूर — सोवियत, किसान सोवियत, सैनिक सोवियत का नाम दिया गया| इन सोवियतों को खड़ा करने में वह के लगभग सभी गुटों  के कम्यूनिस्टों का योगदान था और उन्हें ही सोवियतों के जरिये मजदूरों और किसानों का समर्थन मिलता रहता था| अक्टूबर क्रान्ति से एक — दो माह पहले ही सारी सोवियतों का व्यापक समर्थन बोल्शेविक  पार्टी के पक्ष में चला गया क्योंकि इस दौरान दो अन्य क्रांतिकारी अपने अवसरवादी विचारों व कार्यो के लिए बेनकाब हो चुके थे| निरंतर बढ़ते जन दबावों और जन संघर्षो के फलस्वरूप फरवरी 1917 में जार बादशाह के शासन की बादशाही सत्ता सरकार को हटाकर वह एक नई जनतंत्रवादी पूंजीवादी सत्ता — सरकार स्थापित हो गयी | इसे रूस के विश्व इतिहास में फरवरी क्रान्ति के नाम से जाना जाता है| रूस जैसे पिछड़े बादशाही शासन में रह रहे देश के लिए यह क्रान्ति भी थी| लेकिन इस क्रान्ति के उपरान्त नव गठित सत्ता — सरकार ने जनसाधारण के हितों के क्रांतिकारी उद्देश्य को आगे नही बढाया| बोल्शेविक पार्टी भी फरवरी क्रान्ति की समर्थक थी, लेकिन उसने क्रान्ति सम्पन्न होते ही यह मांग की किi जनहित के लिए आवश्यक है की सत्ता मजदूरों किसानो एवं सैन्य सोवियतो के हाथो में हो| इस मुद्दे तथा अन्य सोवियतों को रुसी जनतंत्रवादियों की केरेन्सकी — सरकार तथा उनका साथ दे रहे मेन्शेविक व समाजवादी , क्रांतिकारी कम्यूनिस्टो ने नकार दिया| साथ ही जारशाही द्वारा रूस जे जनगण को प्रथम विश्वयुद्ध में झोके जाने की घोर कष्टदाई व तबाही के युद्ध को भी जारी रखा| सामन्ती संबंधो को तोड़ने हटाने का भी कोई गंभीर प्रयास नही किया | फलत: बोल्शेविक पार्टी ने रूस के मजदूरों किसानो व अन्य मेहनतकशो से जारशाही, सामंतशाही पूँजी शाही को उखाड़ फेकने तथा फरवरी क्रान्ति के उपरान्त बनी राज सत्ता को भी उखाड़ फेकने का क्रांतिकारी आह्वान कर  दिया | 25 अक्टूबर को यही हुआ भी | दशको की वैचारिक व्यवहारिक तैयारियों प्रयत्नों एवं संघर्षो के फलस्वरूप मेहनतकशो के विजय की यह क्रान्ति सफल हुई और उस वक्त का मजदूर वर्ग, किसान वर्ग और आम जनता के हाथों में शासन सता आई|

(सुनील दत्ता, लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं विचारक हैं)

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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