*श्रोता की तलाश* (कविता)

जयेन्द्र पाण्डेय लल्ला //

मुझे अपनी रचनाओँ के लिये श्रोताओँ का अक्सर टोटा पड़ जाता है
क्योँ इस मामले मेँ मेरा शहर छोटा पड़ जाता है
हर व्यक्ति मुझे जानता है
मेरे कविरूप को पहचानता है!
जहाँ भी जाता हूँ हर आदमी मुझसे नजरेँ चुराता है
उम्र मेँ बड़ा व्यस्त हो जाता है और छोटा मुझे देखते ही इधर उधर हो जाता है!
एक बार अपनी नयी रचना के लिये श्रोता की तलाश मेँ व्याकुल फिर रहा था तभी मैँने देखा कि घर के पड़ोस के मैदान मेँ एक गधा अकेला घास चर रहा था!
मैँ चिल्लाया-” मिल गया”और तेजी से उसकी ओर लपका
गधा मुझे अपनी ओर आता देख पहले ठिठका
फिर कान फड़फड़ाने लगा बारबार अपनी गर्दन झुकाने लगा
मैँ प्रसन्नता से फूला नहीँ समा रहा था
कि कोई तो मिला जो इस जमाने मेँ मेरे जैसे कवि को श्रद्धा दिखा रहा था
मैँने उस गधे को ही अपनी रचना सुनाई
शायद उसकी समझ मेँ हर पंक्ति आई
क्योँकि हर पंक्ति के बाद उसने अपनी गर्दन हिलाई
गधे को कविता सुनने का धन्यवाद देकर मैँ वहाँ से जाने लगा
इस पर वह गधा मेरे पीछे पीछे आने लगा
मैने सोचा कि इसे रचना बेहद पसंद आई है ये कुछ और भी सुनना चाह रहा है इसलिये मेरे पीछे आ रहा है
मैँने रुककर अबकी बार उसे एक साथ चार रचनाएँ सुनाईँ और फिर जाने के लिये कदम बढ़ाए
पर वो श्रीमन उतनी ही तेजी से मेरे पीछे आये
गधे के कविताप्रेम को देख मैँ दंग हो रहा था मगर उसके पीछा करने से थोड़ा तंग हो रहा था!
तभी अचानक गधे का मालिक उसे ढूँढ़ता हुआ वहाँ आया
उसने सारी बात जानकर मेरा आश्चर्य मिटाने की बजाय और बढ़ाया
बोला-”भाईसाब! बात दरअसल ये है कि मेरा ये गधा भी कविता करता है
झुंड का हर गधा इससे डरता है
ये बेचारा आपकी तरह अकेला अकेला मारा मारा फिरता है
और आप तो इस पर इतना बड़ा जुल्म ढा रहे हैँ कि अपनी सुना दी और इसकी सुने बिना ही जा रहे हैँ! आजकल के माहौल मेँ आप दोषी नहीँ कहलायेँगे
जहाँ एक इंसान इंसान का दर्द नहीँ समझता आप एक गधे का दर्द कैसे समझ पायेँगे?”
ये सुनकर मैँने सोचा कि इसने गधा होके भी मेरी लंबी लंबी रचनाओँ को बड़ी तन्मयता के साथ झेला है और मैँने अनजाने मेँ ही इसकी भावनाओँ के साथ खेला है?
अपने विचार पर मैँ मन मेँ शर्माया
फिर गधे से उसकी पूरी रचना सुनकर आया
उसकी हर ढैँचूढैँचू मेँ अपने वाह वाह का सुर मिलाया
और मिले सुर मेरा तुम्हारा का अर्थ पहली बार समझ मेँ आया!

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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2 Responses to *श्रोता की तलाश* (कविता)

  1. vijai mathur says:

    व्यंग्यात्मक कविता द्वारा ‘लल्ला जी’ ने सामाजिक अवस्था का मनोरम खाका खींचा है। एक बार पहले भी उनकी यह कविता पढ़ी है-अच्छी है।

  2. Shankar says:

    आपने क्या कविता सुनाया
    कि वाह वाह करने को दिल आया।

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