गमों के गीतों में डूबी सुरो की मलिका गीता दत्त

सुनील दत्ता//

जीवन दर्द की खुशबू में महकते हुए फूल की तरह है। अपने में अनुपम अप्रतिम सौन्दर्य की मलिका सुरों में समुद्र की गहराई भरा दर्द गायिका गीता दत्त का जीवन कुछ इस तरह का था। उनके 42 वर्ष के जीवन में बनने — बिगड़ने , मिलने — बिछड़ने के अनेक मोड़ आये और हर मोड़ पर उन्होंने दिल में समा जाने वाले गीतों से अंतर मन को झकझोर देने वाले गीतों को सुर दिया। गीता और गीत शायद एक – दूसरे के लिए ही बने थे।

गीता दत्त के जन्म के समय उनके पिता देवेन्द्र राय पूर्वी बंगाल आज के बांग्ला देश के फरीदपुर में मेघना नदी के किनारे स्थित पुरखों के घर में रहते थे। एक बार अचानक आई बाढ़ ने उनका पैतृक मकान तहस — नहस कर गया। तब छत की तलाश में देवेन्द्र राय कलकत्ता पहुँचे। वहां पहुँच कर उन्होंने होटल खोला जो चला नही। धनाभाव के कारण गृहस्थी चलाना मुश्किल हो गया।  ऐसे में बच्चों का संगीत — प्रेम काम आया। बड़े भाई मुकुल राय के साथ गीता राय ने  पैसे कमाने के लिए जलसों में गाना शुरू किया। रेडियो पर गीता के गाये गीतों को अपार ख्याति मिली। उनके गाये गीत हौले — हौले हवा डोले , जैसे गीत लोगों के दिलो में रच — बस गये।
गायिका के रूप में सुकंठी गीता की ख्याति फैलने पर उनके पिता देवेन्द्र राय कोलकाता से बेहतर भविष्य की आशा के साथ सपरिवार बम्बई पहुंच गये। वहां गीता राय को फिल्मों में पैठ बनाते देर नही लगी। उनकी आवाज का जादू जल्दी ही लोगों के सर चढ़कर बोलने लगा। वह ऐसा दौर था जब फ़िल्मी दुनिया में जौहरी ही जौहरी की तलाश में रहते थे। सीधी — सच्ची प्रतिभा को प्रशंसा मिलती थी। एक दिन जब गीता ” बाजी ” फिल्म के लिए सचिन देव बर्मन के निर्देशन पर रिकार्डिंग कर रही थी,  उनकी मुलाक़ात अभिनेता गुरुदत्त से हुई। पहली नजर पड़ते गुरुदत्त गीता के रूप — गुण पर न्योछावर हो गये। गीता गा रही थी ” तदबीर से बिगड़ी हुए तकदीर बना ले , अपने पे भरोसा है तो ये दाव लगा ले ” ।  यह गीत गुरुदत्त के हृदय में उतर गया। उन्होंने पूरे भरोसे के साथ गीता पर दाव लगाया और बाजी जीत ली। दोनों का प्यार परवान चढा और दोनों ने शादी कर लिया। गीता राय बन गयी गीतादत्त। पति के रूप में गुरुदत्त का गीता के लिए प्यार बढ़ता ही रहा। गीता — गुरुदत्त के प्यार भरे सुखमय जीवन के तीन वर्ष भी पूरे न हुए थे  कि उनके प्यार को ग्रहण लग गया। प्यार , पैसा प्रसिद्धि से सराबोर गीता जब शोखी से गा रही थी ” बाबूजी धीरे चलना , प्यार में जरा संभलना , हाँ बड़े धोखे हैं , बड़े धोखे है इस राह में ……. तब वे स्वंय धोखा खा गयी। गुरुदत्त वहीदा रहमान के प्रति आकर्षित हो गये। फिल्म प्यासा जिसके नायक — निर्देशक गुरुदत्त थे , ने इस आकर्षण को आगे बढाया और गुरुदत्त का वहीदा के प्रति प्यार दीवानगी के हद तक जा पहुंचा। परन्तु उनमें गीता के प्रति दायित्व का बोध बना रहा।  दोनों रूसियो को साधना उनके लिए दो नावो में पैर रखने जैसा था और वे कही के ना रहे और नशे का सहारा ले लिये। अवसादग्रस्त होकर गीता भी शराब की लती हो गयी। वे गाती तुमि जे आमार , काने काने सुधु एक बार बोलो ,, अर्थात तुम मेरे ही हो यह बात सिर्फ एक बार  मेरे कानों में कह दो। जब गुरुदत्त की आत्मकथा पर आधारित फिल्म ” कागज के फूल ” बनाई गयी , गीता ने एक और अविस्मर्णीय गीत गाया , वक्त ने किया क्या  हँसी सितम , तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम। इस गीत की दर्द भरी आवाज में मानो गीता ने अपनी पूरी जिन्दगी की सच्ची तस्वीर उतार दी हो। कागज के फूल बाक्स आफिस पर नाकाम रही। व्यक्तिगत जिन्दगी की नाकामी लेकर गीता ने गुरुदत्त का घर छोड़ दिया। शुभचिंतको ने गुरुदत्त — गीता को पुन: पहुँचाने के लिए प्रयास किये। उन्होंने भी फिर से टूटे तारो को जोड़ना उचित समझा। टूटे तार जुड़े और तीसरी संतान अस्तित्व में आई। साथ ही आई एक नई फिल्म ” साहब बीबी और गुलाम ” की कहानी भी। फिल्म के संगीतकार हेमंत कुमार ने विरह — वेदना के कातर छोटी बहू के चरित्र के लिए गीतादत्त को चुना। छोटी बहू की आत्मा बनाकर गीता ने संगीत — जगत को दिया ” पीया ऐसो जिया में समाय गयो रे ……… कोई दूर से आवाज दे चले आओ और ” न जाओ सैया , छुड़ा के बहिया , कसम तुम्हारी मैं रो पडूँगी |
फिल्म छोटी बहू और गीता उस समय एकात्म हो गये जब शराब में डूबी हुई आवाज मुखरित हुई , न जाओ सैंया , मगर दिल के हाथों मजबूर गुरुदत्त ने आखिरकार साथ छोड़ने की ठान ली थी। उन्होंने ” प्यासा ” पर सचमुच मुहर लगाते हुए १० अक्टूबर  1964 को आत्महत्या कर ली।  गुरदत्त की अकाल मृत्यु ने गीता को भीतर तक तोड़ दिया। उनके लिए मुम्बई में रहना मुश्किल हो गया। वे कोलकाता पहुंची।  बांग्ला फिल्मों में गाने के साथ — साथ ही स्थानीय जलसों में गाना शुरू किया , परन्तु उनका अशांत मन शांति न पा सका। उन्होंने पुन: मुम्बई लौटने का निश्चय किया और एक बार फिर संगीतकार कनु राय के कहने पर फिल्म ” अनुभव ” में तनुजा के लिए गाया ” मेरी जा , मुझे जा न कहो , मेरी जा…।
गीतादत्त ने अपनी पूरी कलात्मक जिन्दगी में लगभग दो हजार बांग्ला गीत , डेढ हजार हिन्दी गीत और कुछ अन्य भाषाओं के गीत गाये। वे बयालीस वर्षो में ही सौ साला जिन्दगी के सुख — दुःख झेलकर अनगिनत गीतों को अमरत्व दे गयीं। गीता जो सुरसृष्टि कर गयी, वह जन — मन में समाई रहेगी।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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