प्रेस कांउसिल के समक्ष मीडियाकर्मियों के सवाल

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू बिहार की सुशासन सरकार पर हमला बोलकर कइ दफा चर्चा में रहे हैं। मीडिया से लेकर राजनीति पर भी उन्होंने बड़ी बेबाकी से हमला किया है। पर देश के पत्रकारों के बीच हर हमेशा यह चर्चा होती है कि काटजू पत्रकारिता को नई दिशा और पत्रकारों की आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में कब कारगर कदम उठायेगें ? राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर यह सवाल अत्यंत ही मौजू है और कुछ चुनिन्दा मीडिया से जुड़े लोगों से बातचीत ने इस सवाल को और भी सार्थक कर दिया है।
मीडियाकर्मियों की यह आम चर्चा कि जस्टिस काटजू अभी तक इस दिशा में कोई ऐसा कदम नहीं उठा पाये हैं, जिससे पत्रकारों की हौसला आफजाई हो, उनका मनोबल ऊंचा हो। फिर भी बिहार दौरे पर मीडिया के पक्षपातपूर्ण रवैये पर नाराजगी जता कर एक कड़े कदम के तहत बिहार की मीडिया के लिए  जांच कमेटी का गठन कर देश के सामने मिशाल अवश्य पेश किया है। जांच कमेटी जब अपनी रिपोर्ट पेश करेगी तभी, पता चल पाएगा कि बिहार की मीडिया पर सुसासन सरकार का कितना दबाव है?      बहरहाल प्रेस कांउसिल के इस कारवाई के बावजूद मीडिया और मीडिया कर्मियों की समस्याएं कम होती नजर नहीं आ रही हैं। दरअसल मीडिया में अमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। रांची से प्रकाशित जोहार सहिया के संपादक अश्विनी कुमार पंकज कहते हैं, इस क्षेत्र में आज भी अभिजात्य वर्ग का दबदबा है। अब खबरें भी उन्हीं लोगों के द्वारा उन्हीं के हित में लिखी जाती हैं। भारत में पूंजीपतियों के द्वारा मीडिया संस्थानों का संचालन किया जा रहा है। वहीं कुछ खास परिवारों के लोग अहम पद पर बैठे हैं। क्या यह सवाल हमला बोल पाएगा प्रेस कांउसिंल ऑफ इंडिया पर? सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र सिंह कहते हैं कि मीडिया में व्याप्त वंशवाद , ब्राह्म्णवाद, कारपोरेटवाद के खिलाफ कारगर कदम उठाना चाहिए। क्योंकि इसके रहते मीडिया के आंतरिक ढांचे में समाजवाद आना असंभव है। कारपोरेटिया पत्रकारिता की सोंच गरीब विरोधी होती है। आज मीडिया गरीबों के पक्ष में खड़ी होती नहीं दिख रही है। सामाजिक न्याय के मुद्दों के प्रति भी संवेदनशील नहीं दिखती है। महिला और बच्चे के लिये भी इनके पास स्पेस नहीं है। वैसे बाजारवाद और सनसनी फैलाने वाली मीडिया के खिलाफ काटजू सवाल उठाते रहे हैं। सुरेन्द्र सिंह यह भी कहते हैं कि पत्रकारों में निराशा का भाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ऐसा होना लाजिमी भी है क्योंकि मीडियाकर्मियों के कई ज्वलंत सवाल हैं। वह सवाल उनके रोजी-रोजगार से जुड़ा है। इस विषय पर ना तो नेता बोलते है और ना ही प्रेस कांउसिल आफ इंडिया कुछ विशेष कर पा रही है।
बताते चले कि पत्रकारों की नौकरी स्थाई नहीं होती है। वेतनमान की कोई पॉलिसी नहीं है। नौकरी की सेवा शर्त सिर्फ रस्म अदायगी है। पूर्णिया की महिला पत्रकार पूजा मिश्रा कहती हैं कि राजधानी में काम करने वालों को तो कुछ वेतन मिलता भी है। लेकिन सुदूरवर्ती इलाके में काम करने वाले को महीने में मात्र खबर भेजने भर के ही पैसे दिये जाते हैं। वह भी नौ नखरे के बाद। ऐसे पत्रकारों से ईमानदारी की अपेक्षा करना सबसे बड़ी बेईमान मानसिकता है। सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता महेन्द्र सुमन कहते हैं कि मीडिया की स्थिति सुधारने के लिए सबसे पहले मीडियाकर्मियों के वेतनमान को सुधारना अति आवश्यक है। पेशे के प्रति प्रतिबद्धता तभी आएगी जब उन्हें मीडियाकर्म से रोटी, कपड़ा और मकान के साथ-साथ अन्य जरूरतों की पूर्ति होगी। स्वतंत्र पत्रकार सह शोधार्थी अनंत कहते हैं कि मीडियाकर्मियों को स्वतंत्र करना है तो सबसे पहले प्रेस कांउसिल भर्ती की पालिसी बनाये, ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाये, गर्वन्मेंट के मापदंड के अनुसार वेतनमान तय करे, पेंशन की व्यवस्था करें। अन्यथा सिर्फ कुछ टीका टिप्पणी करने से कोई सुधार नहीं होगा।

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3 Responses to प्रेस कांउसिल के समक्ष मीडियाकर्मियों के सवाल

  1. sunil mohan thakur says:

    वाह अनिताजी आपने इन अछुओं पहलु को उठाया जिसका ना कोइ चर्चा करता और नाहि जुर्रत …..अच्छे शहर बोकारो में है यहाँ यूँ कहूँ तो बेचारे जानबूझकर गंदगी को बढ़ाबा देते क्योंकि वे लोग उनका ख्याल रखते इन पत्रकारों का शोषण धर्रले चल रहा बेचारे चौराहे पर खरे रहनुमा तलाशते रहते !!! आपका अभिनन्दन अनीता जी ……………जय हो !

  2. anant says:

    jaisa nam waisa kam , aap tewar dikhayi aaj k din v es swal per koi kuchh nahi bolega waise bhi Journalist k sawalo ko koi nahi raise karta aapne himmat ki eske liye bahut bahut dhanywad, patrkaro ki jamini swal ko uthayee hai mujhe lagta hai desh k sabhi journalist budhijivi aapki soch k sath khade hoge

  3. vijai mathur says:

    ” मीडिया में व्याप्त वंशवाद , ब्राह्म्णवाद, कारपोरेटवाद के खिलाफ कारगर कदम उठाना चाहिए। क्योंकि इसके रहते मीडिया के आंतरिक ढांचे में समाजवाद आना असंभव है। कारपोरेटिया पत्रकारिता की सोंच गरीब विरोधी होती है।” इन सटीक विचारों को स्थान देकर आपने पत्रकारों व जनता दोनों के सरोकारों को समान रूप से उठाया है जो उचित है।

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