क्या विज्ञान और तकनीक ने हमें स्वतंत्र कर दिया ?

सुनील दत्ता //

पिछले कुल 100 वर्षो में हुए आविष्कारों ने हमारे जीवनशैलियों को पूरी तरह रूपांतरित कर दिया।  वर्षो की यात्राए घंटो में बदल गई। कई – कई दिनों में पूरे होने वाले कार्य मशीनें क्षणों में करने लगी। रसोई गैस, प्रेशर कुकर,  माइक्रोवेव,  इलेक्ट्रिक प्लेट्स, वैक्यूम क्लीनर जैसे यंत्रो ने   महिलाओं के कार्य आश्चर्यजनक रूप से सहज और कम कर दिए। इन सभी कामों में लगने वाला समय हमारे अपने लिए,  अपने विकास के लिए उपलब्ध हो गया। लेकिन यह क्या हुआ ? हम स्वतंत्र होने की जगह इतने व्यस्त कैसे हो गये ?
आज इस धरती पर मनुष्य जितना व्यस्त है उतना कभी भी नहीं था। मानो व्यस्तता ही जीवन हो।  बच्चों के पास खेलने का वक्त नही,  उनका सारा समय स्कूल में,  घर लौटकर होमवर्क करने या कम्प्यूटर पर गुजर रहा है। हवाई जहाज में, रेलगाड़ियों में सफर करते लोग लैपटाप पर बैठे अपना काम निपटाते दिखाई देते हैं।  जापान में रेलगाड़ियों से सफर करते लोग अधिकतर सोते दिखाई देते हैं।  चाहे यात्रा आधे घंटे की ही क्यों ना हो। काम अधिक होने के कारण नींद हमेशा कम ही होती है। यात्रा के दौरान ही झपकी ले ली जाए ।  बहुत से लोग वहां अपने साथ ओसे पट्टे रखते हैं जिन्हें वे अपने सर और ट्रेन में उपर लगे डंडे के साथ जोड़ लेते हैं।  इस तरह वे खड़े – खड़े सो सकते हैं। नीद में गिरने का भय नही।
तकनीक ने हमे स्वतंत्र कर दिया सिवाय अपने से ।  तकनीक से हमें स्वतंत्रता तो मिली लेकिन हम तकनीक के गुलाम हो गये।  हमने उपलब्ध स्वतंत्रता का उपयोग किया अपनी मह्त्वाकाक्षाओं के लिए दौड़ने में। व्यस्त रहने के लिए व्यस्त होने में। विज्ञान और तकनीक से उपलब्ध होने वाले समय को हम आनन्दमय जीवन जीने के लिए सदुपयोग करे या एक अंतहीन अंधे रास्ते पर दौड़ते रहने के लिए _ चुनाव हमारा है। और यह एक बड़ा सवाल भी ?

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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