फिर क्यूँ सस्ते में बिके, मानव का ईमान? (कविता)

// रघुविन्द्र यादव //

महँगी रोटी दाल है, महँगा बहुत मकान।

फिर क्यूँ सस्ते में बिके, मानव का ईमान?

‘राधा’ रहती ‘श्याम’ से, मिलने को बेताब।
जाती है कालेज भी, मुख पर बाँध नकाब।।

सच कहने का हौसला, नहीं दिखाते लोग।
इसीलिए बढऩे लगा, भ्रष्टाचारी रोग।।

पानी जिनकी आँख का, मर जाता है यार।
बनते हैं वे ही सदा, चोर, जार, गद्दार।।

दिल में जिसके खोट है, वाणी लिये मिठास।
बन जाते हैं आजकल, वे ही सबके खास।।

रिश्तों का भी हो गया, सपनों जैसा हाल।
बात-बात पर टूटकर, करते हैं बेहाल।।

रिश्ते जब-जब टूटते, दे जाते हैं टीस।
फिर भी दिन-दिन बढ़ रही, है अपनों में रीस।।

पत्थर को होता नहीं, भले-बुरे का ज्ञान।
फिर क्यूँ उसके सामने, झुकते हैं नादान??

जनता जिन से कर रही, लोकलाज की आस।
वे काला धंधा करें, उजला पहन लिबास।।

दुल्हन के माँ-बाप ने, ऐसा खेला खेल।
देवर है पैरोल पर, पिया काटते जेल।।

जब से बाहर आ गया, ‘रावण’ लेकर बेल।
तब से ‘सीता’ काटती, अपने घर में जेल।।

आम आदमी की नहीं, सुनता कोई बात।
कोई पैसा माँगता, कोई पूछे जात।।

गली-गली रावण फिरें, बस्ती-बस्ती कंस।
दोनों मिलकर कर रहे, चहूँओर विध्वंस।।

घर-आँगन बाँटे गये, बाँट लिये हल-बैल।
हिस्से में माँ-बाप को, दिया गया खपरैल।।

याद सताये गाँव की, झर झर बहते नैन।
रोटी तो दी शहर ने, छीन लिया पर चैन।।

आय है $खत गाँव से, लेकर ये संदेश।
आना मत अब गाँव में, यहाँ भी बढ़ा कलेश।।

पाती आई गाँव से, सुना रही है हाल।
खेतों में उगने लगे, कोठी, बँगले, मॉल।।

मोल झूठ का क्यूँ बढ़ा, सच क्यूँ है लाचार।
प्रश्र खड़े हैं सामने, उत्तर की दरकार।।

इच्छा हर माँ-बाप की, बने पूत धनवान।
पैदा कैसे हों बता, फिर अच्छे इंसान।।

यादव कभी न कीजिये, तीनों का विश्वास।
नेता, नागिन, नर्तकी, चाहे कितने खास।।

पहन चुकी है दुष्टता, सज्जनता का खोल।
रहा नहीं ईमान का, दो कौड़ी भी मोल।।

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सदियों से इंसान बेहतरी की तलाश में आगे बढ़ता जा रहा है, तमाम तंत्रों का निर्माण इस बेहतरी के लिए किया गया है। लेकिन कभी-कभी इंसान के हाथों में केंद्रित तंत्र या तो साध्य बन जाता है या व्यक्तिगत मनोइच्छा की पूर्ति का साधन। आकाशीय लोक और इसके इर्द गिर्द बुनी गई अवधाराणाओं का क्रमश: विकास का उदेश्य इंसान के कारवां को आगे बढ़ाना है। हम ज्ञान और विज्ञान की सभी शाखाओं का इस्तेमाल करते हुये उन कांटों को देखने और चुनने का प्रयास करने जा रहे हैं, जो किसी न किसी रूप में इंसानियत के पग में चुभती रही है...यकीनन कुछ कांटे तो हम निकाल ही लेंगे।
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One Response to फिर क्यूँ सस्ते में बिके, मानव का ईमान? (कविता)

  1. Laxman prasad Ladiwala,Jaipur says:

    आज ही तेवर प्रष्ट देखने में आया रघुविंदर यादव जी के दोहे फिर क्यूँ सस्ते में बिके, मानव का ईमान? (कविता)पढ़े बहुत अच्छे लगे सुंदर अभ्व्यक्ति सुन्दर सन्देश और व्यंग हार्दिक बधाई

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