अंधविश्वास 21 वीं सदी में भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं

अनिता गौतम//

आज जहां विश्व पटल पर दुनिया के वैज्ञानिक ब्रह्मांड की उत्पत्ति वाले कण की खोज कर भगवान के करीब पहुंचने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सामाजिक पिछड़ेपन के शिकार लोग आस्था के नाम पर अंधविश्वास के अंधे कुएं से बाहर नहीं आना चाहते।
विकास के कितने भी दावे कर लिए जायें पर हकीकत आज भी वही है कि शिक्षा और ज्ञान की कमी से जूझ रहे लोगों में अंधविश्वास जड़ तक समाया हुआ है। आस्था और अंधविश्वास की फेहरिस्त में हर तरह के लोग शामिल हैं पर महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा शिकार हैं। इन्हें अपने दुखों को कम करने का आसान, सस्ता और सटीक तरीका बाबा और भूत झाड़ने वाले ओझा के सुझाए रास्ते लगते हैं। इसी का फायदा उठाकर नित नये-नये बाबा अवतरित हो रहे हैं। यदि यह कहें कि समाज में बढ़ रहे अपराधों में इनका बहुत बड़ा योगदान हैं तो गलत नहीं होगा।
आस्था के नाम पर पीड़ितों की फेहरिस्त  हर बार लंबी होती जाती है। पीड़ित महिलाओं की मानसिक स्थिति का मनोवैज्ञानिक अवलोकन कर ये तथाकथित बाबा झाड़-फूंक के बाद भूत भगाने या किसी भी समस्या का समाधान सुझाने के लिए आर्थिक, मानसिक और शारीरिक शोषण तक करने से परहेज नहीं करते। अपनी भाव-भंगिमा और भय का वातावरण बना कर  धीरे-धीरे अंधविश्वास का जाल फैलाना, धर्म के नाम पर हर तरह की तकलीफों से  निजात दिलाने का ठेका इन बाबाओं का हथियार बनता है।
चूंकि इन मान्यताओं और अंधविश्वास की सर्वाधिक शिकार ज्यादातर महिलायें होती हैं और इन्हें बहलाना फुसलाना भी आसान होता। अत: महिलाओं की यह कमजोरी बाबाओं की अय्याशी के रूप में भी कई बार सामने आ चुकी है। हैरानी की बात यह है कि इन सब के बाद भी इनका कारोबार बेधड़क चलता रहता है।
बाबाओं का निशाना संभ्रांत परिवार की ऐसी महिलायें बनती हैं जिनसे पैसे भी आसानी से ऐंठे जा सकें और सभ्य होने के नाम पर उनकी पोल खुलने का खतरा भी कम हो।
अलग अलग समस्याओं से निबटने में जब घरेलू स्तर पर या फिर वैज्ञानिक तरीके से इंसान असफल होता है तो एक आखिरी आस के रूप में ये बाबा सहारा बनते हैं। निराकरण और समस्याएं कुछ ऐसी होती हैं कि समझना मुश्किल हो जाता है।
आखिर किस सदी में जी रहे हैं हम?  किसी को बेटा नहीं हो रहा है, किसी का पति शादी के बाद परदेश चला गया है या फिर शादी में बार-बार रूकावटें आ रही हैं- यही होती हैं इनकी समस्याएं। पुलिस प्रशासन भी इन सवालों पर मौन होता या फिर जब तक कोई बड़ी घटना न हो इसमें दखल देना उचित नहीं समझता।
आस्था व अंधविश्वास के बीच के अंतर को समझाना नामुमकिन नहीं है पर गहरी चिन्ता का विषय यह है कि इन मुद्दों पर सहयोग करने वालों से किस तरह से सख्ती से निपटा जाये ? अज्ञानी और मानसिक रोगी होने के प्रमाण होते हैं इस तरह से सार्वजनिक स्थलों पर भूत-प्रेतों को लेकर खेलने व झूमने वाले लोग। मनोचिकित्सकों और विशेषज्ञों की मानें तो पूरी तरह अंधविश्वास और मानसिक रोगों का परिचायक है इस तरह की घटना। इससे रोग तो कतई नहीं दूर हो सकता और न  ही किसी नि:संतान को संतान प्राप्त हो सकती है।
अंधविश्वास के चक्कर में लोगों का पूजा-पाठ और आस्था के नाम पर भूखे रहना-तमाम तरह की बीमारियों को आमंत्रण देना है। कभी कभी खतरा बढ़ने पर मौत का भी सबब बन जाता है यह अंधविश्वास का खेल। संतान प्राप्ति तो पूरी तरह एक वैज्ञानिक या प्रकृति  प्रदत्त प्रक्रिया है इसमें बाबा का दखल यानि वासना का खेल और समाज में गलत संदेश के आदान प्रदान के अलावा कुछ नहीं है।
बहरहाल, विज्ञान की नित नई खोजों के बीच अंधविश्वास के प्रति बढ़ रहा आस्था का यह खेल कई सवालों को जन्म दे रहा है। सही ज्ञान और आस्था के नाम पर अंधविश्वास को ही बढ़ावा मिल रहा इस तरह के कुकृत्यों से।

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8 Responses to अंधविश्वास 21 वीं सदी में भी साथ छोड़ने को तैयार नहीं

  1. Munna Singh says:

    आज के वैज्ञानिक युग में भले ही लोग पाश्चात्य संस्कृति से जुड़ चुके हैं लेकिन भारतीय संस्कृति के परम्परानुसार आज भी हरेक भारतीयों के दिल में पंडित , बाबा ,पीर – फ़क़ीर आदि लोगो को भगवान के अनुरूप ही माना जाता है । पौराणिक कथाओ में भी सीता माता का हरण के लिए दशानन (रावण ) ने शुद्र ब्राह्मण का रूप धरा । लेकिन आज के परिवेश में आपको ऐसे कई पाखंडी बाबा मिल जायेंगे जो महिलाओ पर शारीरिक और मानसिक शोसन करने से गुरेज नहीं करते । वही इन बाबाओ को जिला प्रशासन का संरक्षण मिलता रहता हैं । ऐसे पाखंडियो के खिलाफ आज हर एक जनमानस को जागना होगा साथ ही इसके खिलाफ जनजागरूकता के लिए कई काम भी करने होंगे ताकि हम अपना और समाज के स्वच्छता को बनाये रखने में सफल होंगे ।

  2. v k dhawan says:

    Article has brought out in detail about the bad practices prevailing in society,specially weaker sections..more particularly in women…hindi language is super ..well defined…
    But what is the solution…who will hit the ball….no one knows…

  3. vijai mathur says:

    टी वी चेनल्स,अखबार आदि के कारण आज अंध-विश्वास काफी ज़्यादा फैल गया है क्योंकि इसी के जरिये शोषण-उत्पीड़न और लूट को जारी रखा जा सकता है। अतः व्यापारिक-औद्योगिक घराने मुक्त-हस्त से ऐसे ढोंगियों को दान-चन्दा आदि देकर बढ़ावा देते हैं। जो कोई इन सबसे आगाह करता है तो उसी को ब्लागर्स/फेसबुकिए ही नहीं समाज मे पढे-लिखे लोग भी उपहास का पात्र बनाते हैं। इन ढोंगियों से तभी बचा जा सकता है जब निर्भीकता के साथ उन पर सामूहिक प्रहार किया जाए।

  4. Mahendra Das says:

    कभी कभी कोइ करिश्मा अंधविश्वास को जागृत करता है मजबूर इन्सान डूबते को तिनके का सहारा मानकर अंधविश्वास के चक्रब्यूह में फँस जाते है ॥

  5. ashim shekhar says:

    Anita ji , nice attempt on blind faith . Very hard to come out of it . When you have people like Nirmal baba in our country . And women are always soft target of these baba.

  6. Though superstition is in existence since the origin of universe but sometimes it take ugly turn resulting in blind faith over so called BABAs. In my opinion, through dissemination of scientific knowledge , we can counter this menace. Nice article.

  7. उपेन्द्र कुमार पथिक- प्रदेश अध्यक्ष- सांस्कृतिक समिति अर्जक संघ-बिहार says:

    अंधविश्वास संबंधी आपकी रिपोर्ट पढ़कर खुशी हुई. आशा है समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने में इसी तरह लगे रहेंगे. उपेन्द्र पथिक, हिसुआ नवादा

  8. madhukar says:

    Kunae ka medhak kunae kunae me hi rahna pasad karta hae. Tvi to padhe likhe hakim hukkam neta avineta sab BABAON ke talwe chate najar aate haen. Changae mele me bher bakri ki trah log jutte haen, jhooth ko sach man ghar le jate haen, is jhooth ko jo nahi aa sake unko prasad ke roop me dete haen.

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