पुलिस के असीमित अधिकार और नगण्य कर्तव्य बदलाव में सबसे बड़ी बाधा!

Anita Gautam //

यूं तो देश की पुलिस आम जन के बीच काम करने के तरीके को लेकर हमेशा संदेह के घेरे में रहती है, बात चाहे  दामिनी सामूहिक दुष्कर्म की घिनौनी घटना के बाद पुलिस पर लगाये गये आरोपों की हो या फिर खुद इस तरह के संगीन अपराधों में लिप्त पुलिस की। अपनी कारगुजारियों की वजह से पुलिस कई दफा कठघरे में खड़ी होती रही है, और इनका निराकरण पुलिस की सफाई, वरिष्ठ अफसरों के तबादले और कुछ अधिकारियों के निलंबन के साथ खतम कर दी जाती है। यह तो दिल्ली पुलिस और राजधानी का आलम था पर हालिया बड़े अफसरों   के द्वारा बिहार में 10 करोड़ की रकम की डिमांड ने एक बार फिर आला अधिकारियों के होश उड़ा दिये। अभी यह मामला ठंढा भी नहीं हुआ कि एक और अधिकारी ने ऐसी ही घटना को अंजाम देने की कोशिश की। शेखपुरा एसपी के द्वारा एक शराब व्यवसाई की बेरहमी से पिटाई और थर्ड डिग्री टॉर्चर तो मानों आम बात है, जब तक कि मामला हद से ज्यादा न गुजर जाए। इस तरह यह कहा जा सकता है कि प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनहीनता का शिकार तो आम जन अब तक होते ही रहे हैं, पर हैरान करने वाली बात इन बड़े अधिकारियों का रंगदारों की तरह करोड़ों की रकम की मांग के साथ झूठे मुकदमें फंसाने की धमकी है। सोचना होगा कि पुलिस प्रशासन की विफलता महज कुछ अधिकारियों का निकम्मापन होता या पूरी व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेवार है। यदि व्यवस्था की बात है तो उसमें किन बदलावों की जरूरत है। किस आधार पर हमारी पुलिस प्रजातांत्रिक समाज के लिए काम करना सीख सकती है, ताकि आने वाले समय को बेहतर बनाने की एक पहल की जा सके।

दरअसल हमारे देश का संविधान जब बना तब बहुत सारी बातों को  बिना बारीकी से परखे और उनके दूरगामी असर को समझे बगैर उन्हें  जस का तस उतार लिया गया। इन्हीं में न्यायिक व्यवस्था के साथ पुलिस और सेना दोनों की कार्यप्रणाली को भी अमूमन ज्यों का त्यों  अपना लिया गया। जबकि यह गुलाम भारत की व्यवस्था थी और इसे अंग्रेजों ने भारत पर औपनिवेशिक हुकूमत चलाने के लिए बनाया था। तब गुलाम देश पर कानून और हुकुमत को कुछ इस तरह से इस्तेमाल करना था ताकि कोई विरोध का स्वर न उठे, जबकि आज हमें अपने देश के लोगों को संभालने के लिये इसका इस्तेमाल करना है। दुर्भाग्य है कि हम आज भी उसी प्रणाली को ढोए जा रहे हैं। फिर किसी भी तरह से पुलिस से दोस्ताना व्यवहार और सहयोग की उम्मीद बेमानी है, जब तक कि इस अंग्रेजी विरासत की व्यवस्था में पूरी तरह पारंगत देश की पुलिस को प्रजातांत्रिक आदर्शों को समझने के योग्य न बनाया जाये।   इसके लिये हमें पुराने सिस्टम को पूर्णतया खतम करना होगा। सिर्फ कहने और नारों के साथ फ्रेंडली पुलिस नहीं हो सकती जब तक कि उनमें आदर्श, आजादी और समानता का समावेश न किया जाये। औऱ इसके लिये कुछ खास बातों पर बारीकी से अध्ययन कर शोध के साथ मानवीयता पर आधारित पुलिस का फिर से गठन करना होगा।

सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि पुलिस को यह समझ आये कि वह सिर्फ और सिर्फ देश की जनता के हित के लिये बनी है और हर नागरिक के भी मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी जरूरतों के लिये ही देश की पुलिस है। जब भी उन्हें इनकी सेवा की जरूरत हो वह बेझिझक और बेखौफ होकर इसका उपयोग कर सकते हैं। पुलिस के ही आला अधिकारियों की मानें तो लगभग सभी विकसित प्रजातांत्रिक देशों की पुलिस-व्यवस्था की आधारशिला ऐसी ही होती है और इसकी पहचान आम नागरिकों के बीच पुलिस व्यवस्था कम इमरजेंसी सेवा के रूप में ज्यादा है। भारत में भी आज ऐसी ही इमरजेंसी हेल्पफुल पुलिस की परिकल्पना की जरूरत आन पड़ी है। पुलिस की सेवा लेने के लिये 100  नंबर आज से काफी पहले घोषित किया जा चुका है पर उस के इस्तेमाल तक की कभी देश में जहमत नहीं उठाई जाती और कभी इसके इस्तेमाल पर जोर भी दिया जाता तो लोगों के बीच भय का माहौल होता है। इसे प्रभावी और सुविधाजनक बनाने के लिए जितनी भी   बाधाएं हैं उन्हें हटाने की जरूरत है। अपराधियों तक ही पुलिस की सेवा सीमित न रहे बल्कि इसे वृद्ध नागरिकों, लाचार बीमार, अपाहिज और खासकर महिलाओं के लिये भी सहज बनाने की आवश्यकता है। पुलिस व्यवस्था का न्यूनतम मानक तय कर समय समय पर उनके पालन    पर भी नजर रखी जाये। हर मामले में पुलिस का प्रयास शिकायतकर्ता की संतुष्टि और सही कानूनी प्रक्रिया के अमल पर ही हो। ऐसा नहीं होने की स्थिति से निपटने के लिये शिकायत के लिये भी आसान नंबर   उपलब्ध करवाया जाना चाहिए और जिन किसी भी अधिकारी के खिलाफ ज्यादा शिकायतें आयें उनपर सख्त कार्रवाई की जाए।

पुलिस व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए कि  बिना एफ आइ आर के भी     आपसी समझौते, चेतावनी या अच्छे व्यवहार के लिए उत्साहित कर लोगों की समस्याओं का निदान करे। कानून का राज बने इसके लिए न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता को भी समझना होगा और पुलिस की कार्यवाही में सबसे बड़ी बाधा बनती है संदेह के लाभ से अपराधियों का बेदाग छूटना और इसी के बिनाह पर प्राय: पुलिस अपने गवाह और गवाही के तरीके को लेकर भी कठघरे में खड़ी दिखती है।

बहरहाल किसी भी तरीके से पुलिस को फ्रेंडली बनाने का पुराना तरीका सिर्फ और सिर्फ एक कल्पना हो सकती, क्योंकि पुलिस के असीसित अधिकार और नगण्य कर्तव्य उनमें बदलाव की सबसे बड़ी बाधा हैं। साथ ही उनके कार्य अवधि और उनकी जरूरतों को भी समझना होगा। किसी भी पुलिस कर्मी की तकलीफों को भी मानवीय तरीके से सुलझाने की पहल होनी चाहिए। उनके काम के घंटे कम और संख्या को भी बढ़ाने की जरूरत है। अन्यथा ऐसे ही सरकारी लुटेरों की जमात के रूप में पहचानी जाती रहेगी पुलिस !

This entry was posted in रूट लेवल. Bookmark the permalink.

8 Responses to पुलिस के असीमित अधिकार और नगण्य कर्तव्य बदलाव में सबसे बड़ी बाधा!

  1. bipin says:

    achhi comment hai apni police per or apni police vaystha per . thankx.

  2. vijai mathur says:

    ‘पुलिस को मिली असीमित अधिकार और नगण्य कर्तव्य उनमें बदलाव की सबसे बड़ी बाधा हैं.’ यह निष्कर्ष ठीक ही है । पुलिस के आम जनता के प्रति ‘कर्तव्य’निर्धारित हो जाएँ तो पुलिस को ‘निष्पक्ष’ रहना पड़ेगा। यह भी देखना चाहिए कि जन-सेवकों की रक्षा तो पुलिस करती है और जनता उपेक्षित रहती है-इस प्रक्रिया को भी उलटना होगा। तभी जनता मे सुरक्षा की भावना तथा पुलिस का भी मान कायम हो सकेगा।

  3. anjali gautam says:

    where nice mom

  4. Manoj Upadhyay says:

    बहुत अच्छी स्टोरी…तथ्यपरक और रचनात्मक भी…

  5. rajesh verma says:

    u r great writer…

  6. pawan upadhyay Lucknow says:

    swasth jaankari di aap ne, behtar sujhav aur nishkarsh bhi

  7. अनीता जी, बेहद सामायिक रिपोर्ट के लिए धन्यवाद. दरअसल अपने देश की पुलिस को कभी पेशेवर बनाने की कोशिश ही नहीं की गयी. देश के हुक्मरानों ने इसकी जरूरत भी नही समझी. कारण यह समझ में आता है कि ऐसा करने से उनके अपने छुद्र हितों पर ही कुठराघात होगा. अपने मुल्क के खद्दरपोश भला यह क्यों होने देंगे. हाईस्कूल इंटर पास कोई छह फुट का जवान बिना समुचित संस्कार (ट्रेनिंग) के समाज का क्या भला कर सकता है, वह भी तब जबकि वह लाख दो लाख खर्च कर ही महकमे में दाखिल हो सकता है. मुझे लगता है कि महज कानून बनाने भर से कोई सुधार होने से रहा. जिस देश में दारू और अन्य नशों का प्रचलन अंधाधुंध तरीके से बढ़ रहा हो और मद्य निषेध विभाग के पास नशे के खिलाफ पैंफलेट छपवाने और कर्मचारियों को तनख्वाह देने तक के पैसे न हों, वहां का तो ऊपर वाला ही मालिक है. लाख तर्क कर लें, हालत तब तक नहीं सुधरेंगे, जब तक हम नहीं सुधरते, समाज नहीं सुधरता. और यह तब होगा जब सामाजिक प्रदूषण के सारे अवयवों का खत्मा सुनिश्चित किया जाए. गंदे लोगों का बहिष्कार सुनिश्चित हो, ऐसे लोगों को सत्ता में पहुँचने से भी रोका जाए. बड़ा सवाल यह भी है कि यह सब कैसे हो. सबके अपने अपने स्वार्थ हैं. जो जितना ही स्वर्थी है, अनापशनाप ढंग से दौलत लूट रहा है, वही महापुरुष बना हुआ है, देश को चलाने का सिद्धांत गढ़ता है. माहौल सचमुच भयावह है……………..

  8. AHIBARAN SINGH says:

    sahi baat he

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>